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kushan empire in hindi - कुषाण वंश

19. कुषाण
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www.indgk.com कुषाण वंशkushan vansh kushan empire in hindi
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➽पहल्व के बाद कुषाण आए, जो यूची एवं तोखरी भी कहलाते हैं।
➽यूची नामक एक कबीला पाँच कुलों में बैँट गया था, उन्हीं में एक कुल के थे कुषाण ।
➽कुषाण वंश के संस्थापक कुजुल कडफिसेस था।
➽इस वंश का सबसे प्रतापी राजा कनिष्क था।
➽इनकी राजधानी पुरुषपुर या पेशावर थी।
➽कुषाणों की द्वितीय राजधानी मथुरा थी।
➽कनिष्क ने 78 ई. (गद्दी पर बैठने के समय) में एक संवत् चलाया जो शक-संवत् कहलाता है जिसे भारत सरकार द्वारा प्रयोग में लाया जाता है।
➽बौद्ध धर्म की चौथी बौद्ध-संगीति कनिष्क के शासनकाल में कुण्डलवन (कश्मीर) में प्रसिद्ध बौद्ध विद्वान वसुमित्र की अध्यक्षता में हुई।
➽कनिष्क बौद्ध धर्म के महायान सम्प्रदाय का अनुयायी था।
➽आरम्भिक कुषाण शासकों ने भारी संख्या में स्वर्ण मुद्राएँ जारी कीं, जिनकी शुद्धता गुप्त काल की स्वर्ण मुद्राओं से उत्कृष्ट है।
➽कनिष्क का राजवैद्य आयुर्वेद का विख्यात विद्वान चरक था, जिसने चरकसंहिता की रचना की ।
महाविभाष के रचनाकार वसुमित्र हैं।
➽ इसे ही बौद्धधर्म का सूत्र विश्वकोश कहा जाता है।
➽कनिष्क के राजकवि अश्वघोष ने बौद्धों का रामायण 'बुद्धचरित' की रचना की ।
➽वसुमित्र, पाश्श्व, नागार्जुन, महाचेत और संघरक्ष भी कनिष्क के दरबार की विभूति थे।
➽भारत का आइन्सटीन नागार्जुन को कहा जाता है।
➽इनकी पुस्तक माध्यमिक सूत्र (इस पुस्तक में नागार्जुन ने सापेक्षता का सिद्धान्त प्रस्तुत किया था) है।
➽कनिष्क की मृत्यु 102 ई. में हो गयी।
➽कुषाण वंश का अंतिम शासक वासुदेव था।
➽नोट : कुषाण राजा देवपुत्र कहलाते थे।
➽यह उपाधि कुषाणों ने चीनियों से ली।
➽गांधार शैली एवं मथुरा शैली का विकास कनिष्क के शासनकाल में हुआ था।
➽रेशम मार्ग पर नियंत्रण रखने वाले शासकों में सबसे प्रसिद्ध कुषाण थे। 
➽कुषाण साम्राज्य में मार्गों पर सुरक्षा का प्रबंध था ।
➽नोट : रेशम बनाने की तकनीक का आविष्कार सबसे पहले चीन में हुआ था

➽'युइशि जाति', जिसे 'यूची क़बीला' के नाम से भी जाना जाता है, का मूल अभिजन तिब्बत के उत्तर-पश्चिम में 'तकला मक़ान' की मरुभूमि के सीमान्त क्षेत्र में था। 
हूणों के आक्रमण प्रारम्भ हो चुके थे युइशि लोगों के लिए यह सम्भव नहीं था कि वे बर्बर और प्रचण्ड हूण आक्रान्ताओं का मुक़ाबला कर सकते। 
वे अपने अभिजन को छोड़कर पश्चिम दक्षिण की ओर जाने के लिए विवश हुए।
उस समय सीर नदी की घाटी में शक जाति का निवास था। 
यूची क़बीले के लोगों ने कुषाण वंश प्रारम्भ किया।

➽युइशि लोगों के पाँच राज्यों में अन्यतम का कुएई-शुआंगा था।
25 . पू. के लगभग इस राज्य का स्वामी कुषाण नाम का वीर पुरुष हुआ, जिसके शासन में इस राज्य की बहुत उन्नति हुई। 
उसने धीरे-धीरे अन्य युइशि राज्यों को जीतकर अपने अधीन कर लिया। 
वह केवल युइशि राज्यों को जीतकर ही संतुष्ट नहीं हुआ, अपितु उसने समीप के पार्थियन और शक राज्यों पर भी आक्रमण किए। 
अनेक ऐतिहासिकों का मत है, कि कुषाण किसी व्यक्ति विशेष का नाम नहीं था। 
यह नाम युइशि जाति की उस शाखा का था, जिसने अन्य चारों युइशि राज्यों को जीतकर अपने अधीन कर लिया था। 
जिस राजा ने पाँचों युइशि राज्यों को मिलाकर अपनी शक्ति का उत्कर्ष किया, उसका अपना नाम कुजुल कडफ़ाइसिस था। 
पर्याप्त प्रमाण के अभाव में यह निश्चित कर सकना कठिन है कि जिस युइशि वीर ने अपनी जाति के विविध राज्यों को जीतकर एक सूत्र में संगठित किया, उसका वैयक्तिक नाम कुषाण था या कुजुल था। 
यह असंदिग्ध है, कि बाद के युइशि राजा भी कुषाण वंशी थे। 
राजा कुषाण के वंशज होने के कारण वे कुषाण कहलाए, या युइशि जाति की कुषाण शाखा में उत्पन्न होने के कारणयह निश्चित होने पर भी इसमें सन्देह नहीं कि ये राजा कुषाण कहलाते थे और इन्हीं के द्वारा स्थापित साम्राज्य को कुषाण साम्राज्य कहा जाता है।


➽कुषाण भी शकों की ही तरह मध्य एशिया से निकाले जाने पर क़ाबुल-कंधार की ओर यहाँ गये थे। 
➽उस काल में यहाँ के हिन्दी यूनानियों की शक्ति कम हो गई थी, उन्हें कुषाणों ने सरलता से पराजित कर दिया। 
➽उसके बाद उन्होंने क़ाबुल-कंधार पर अपना राज्याधिकार क़ायम किया। 
➽उनके प्रथम राजा का नाम कुजुल कडफ़ाइसिस था। 
➽उसने क़ाबुलकंधार के यवनों (हिन्दी यूनानियों) को हरा कर भारत की उत्तर-पश्चिमी सीमा पर बसे हुए पह्लवों को भी पराजित कर दिया। 
➽कुषाणों का शासन पश्चिमी पंजाब तक हो गया था। 
कुजुल के पश्चात् उसके पुत्र विम तक्षम ने कुषाण राज्य का और भी अधिक विस्तार किया। 
➽भारत की तत्कालीन राजनीतिक परिस्थिति का लाभ उठा कर ये लोग आगे बढ़े और उन्होंने हिंद यूनानी शासकों की शक्ति को कमज़ोर कर शुंग साम्राज्य के पश्चिमी भाग को अपने अधिकार में कर लिया। 
➽विजित प्रदेश का केन्द्र उन्होंने मथुरा को बनाया, जो उस समय उत्तर भारत के धर्म, कला तथा व्यापारिक यातायात का एक प्रमुख नगर था।

कुषाण वंश

➽कुषाण वंश (लगभग 30 . से लगभग 225 . तक) . सन् के आरंभ से शकों की कुषाण नामक एक शाखा का प्रारम्भ हुआ। 
➽विद्वानों ने इन्हें युइशि, तुरूश्क (तुखार) नाम दिया है  
➽युइशि जाति प्रारम्भ में मध्य एशिया में थी। 
वहाँ से निकाले जाने पर ये लोग कम्बोज-बाह्यीक में आकर बस गये और वहाँ की सभ्यता से प्रभावित रहे।हिंदुकुश को पार कर वे चितराल देश के पश्चिम से उत्तरी स्वात और हज़ारा के रास्ते आगे बढ़ते रहे।
तुखार प्रदेश की उनकी पाँच रियासतों पर उनका अधिकार हो गया। 
. पूर्व प्रथम शती में कुषाणों ने यहाँ की सभ्यता को अपनाया। 
कुषाण वंश के जो शासक थे उनके नाम इस प्रकार है-

➽कुजुल कडफ़ाइसिस: शासन काल (30 . से 80 तक लगभग)
➽विम तक्षम: शासन काल (80 . से 95 तक लगभग)
➽विम कडफ़ाइसिस: शासन काल (95 . से 127 तक लगभग)
➽कनिष्क प्रथम: शासन काल(127 . से 140-50 . लगभग)
➽वासिष्क प्रथम: शासन काल (140-50 . से 160 तक लगभग)
➽हुविष्क: शासन काल (160 . से 190 तक लगभग)
➽वासुदेव प्रथम
➽कनिष्क द्वितीय
➽वशिष्क
➽कनिष्क तृतीय
➽वासुदेव द्वितीय

➽इस सूची से अलग भी कुषाण राजा हुए हैं जिनका अधिक महत्त्व नहीं है और इतिहास भी स्पष्ट ज्ञात नहीं
➽कुजुल कडफ़ाइसिस
➽मुख्य लेख : कुजुल कडफ़ाइसिस
➽कुषाणों के एक सरदार का नाम कुजुल कडफ़ाइसिस था  
उसने क़ाबुल और कन्दहार पर अधिकार कर लिया  
पूर्व में यूनानी शासकों की शक्ति कमज़ोर हो गई थी, कुजुल ने इस का लाभ उठा कर अपना प्रभाव यहाँ बढ़ाना शुरू कर दिया  
पह्लवों को पराजित कर उसने अपने शासन का विस्तार पंजाब के पश्चिम तक स्थापित कर लिया। 
मथुरा में इस शासक के तांबे के कुछ सिक्के प्राप्त हुए है


➽विम तक्षम
➽विम तक्षम
➽मुख्य लेख : विम तक्षम
➽विम तक्षम लगभग 60 . से 105 . के समय में शासक हुआ होगा। 
विम बड़ा शक्तिशाली शासक था। 
अपने पिता कुजुल के द्वारा विजित राज्य के अतिरिक्त विम ने पूर्वी उत्तर प्रदेश तक अपने राज्य की सीमा स्थापित कर ली। 
विम ने राज्य की पूर्वी सीमा बनारस तक बढा ली। 
इस विस्तृत राज्य का प्रमुख केन्द्र मथुरा नगर बना। 
विम के बनाये सिक्के बनारस से लेकर पंजाब तक बहुत बड़ी मात्रा में मिले है।

कनिष्क

कनिष्क
मुख्य लेख : कनिष्क
➽कनिष्क कुषाण वंश का प्रमुख सम्राट कनिष्क भारतीय इतिहास में अपनी विजय, धार्मिक प्रवृत्ति, साहित्य तथा कला का प्रेमी होने के नाते विशेष स्थान रखता है। 
कुमारलात की कल्पनामंड टीका के अनुसार इसने भारतविजय के पश्चात् मध्य एशिया में खोतान जीता और वहीं पर राज्य करने लगा। 
इसके लेख पेशावर, माणिक्याल (रावलपिंडी), सुयीविहार (बहावलपुर), जेदा (रावलपिंडी), मथुरा, कौशांबी तथा सारनाथ में मिले हैं, और इसके सिक्के सिंध से लेकर बंगाल तक पाए गए हैं। 
कल्हण ने भी अपनी 'राजतरंगिणी' में कनिष्क, झुष्क और हुष्क द्वारा कश्मीर पर राज्य तथा वहाँ अपने नाम पर नगर बसाने का उल्लेख किया है। 
इनके आधार पर यह कहा जा सकता है कि सम्राट कनिष्क का राज्य कश्मीर से उत्तरी सिंध तथा पेशावर से सारनाथ के आगे तक फैला था।



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