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chalukya vansh ka Itihas in Hindi - चालुक्य वंश

➽चालुक्य वंश 

चालुक्यों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में निश्चयपूर्वक कुछ भी नहीं कहा जा सकता. वे अपने को ब्रह्मा या मनु अथवा चंद्रमा का वंश मानते हैं. वे ऐतिहासिक दृष्टि से स्वयं को बहुत प्राचीन जताने के लिए कहते हैं कि उनके पूर्वज अयोध्या में राज्य करते थे. वीसेंट स्मिथ जैसे प्रसिद्ध इतिहासकार उन्हें गुर्जर जाति का मानते हैं जो मूलतः सोंडियाना से आये हुए विदेशी थे और भारत में आने के बाद दक्षिण राजस्थान में रहते थे. स्मिथ के विचार से अब कोई भी सहमत नहीं है. अब अधिकांश इतिहासकार उन्हें क्षत्रिय वर्ण के स्थानीय लोग मानते हैं जो मूलतः उत्तर भारत के किसी स्थान से दक्षिण कर्नाटक में पहुँचे थे.

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➽चालुक्यों की उत्पत्ति का विषय अत्यंत ही विवादास्पद है।
➽वराहमिहिर की 'बृहत्संहिता' में इन्हें 'शूलिक' जाति का माना गया है, जबकि पृथ्वीराजरासो में इनकी उत्पति आबू पर्वत पर किये गये यज्ञ के अग्निकुण्ड से बतायी गयी है।
➽'विक्रमांकदेवचरित' में इस वंश की उत्पत्ति भगवान ब्रह्म के चुलुक से बताई गई है। इतिहासविद् 'विन्सेण्ट ए. स्मिथ' इन्हें विदेशी मानते हैं।
➽'एफ. फ्लीट' तथा 'के.ए. नीलकण्ठ शास्त्री' ने इस वंश का नाम 'चलक्य' बताया है।
➽'आर.जी. भण्डारकरे' ने इस वंश का प्रारम्भिक नाम 'चालुक्य' का उल्लेख किया है।
➽ह्वेनसांग ने चालुक्य नरेश पुलकेशी द्वितीय को क्षत्रिय कहा है।
➽इस प्रकार चालुक्य नरेशों की वंश एवं उत्पत्ति का कोई अभिलेखीय साक्ष्य नहीं मिलता है।


➽वंश शाखाएँ

➽दक्षिणपथ मौर्य साम्राज्य के अंतर्गत था।
➽जब मौर्य सम्राटों की शक्ति शिथिल हुई, और भारत में अनेक प्रदेश उनकी अधीनता से मुक्त होकर स्वतंत्र होने लगे, तो दक्षिणापथ में सातवाहन वंश ने अपने एक पृथक् राज्य की स्थापना की।
➽कालान्तर में इस सातवाहन वंश का बहुत ही उत्कर्ष हुआ, और इसने मगध पर भी अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया।
➽शकों के साथ निरन्तर संघर्ष के कारण जब इस राजवंश की शक्ति क्षीण हुई, तो दक्षिणापथ में अनेक नए राजवंशों का प्रादुर्भाव हुआ, जिसमें वाकाटक, कदम्ब और पल्लव वंश के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
➽इन्हीं वंशों में से वातापि या बादामी का चालुक्य वंश और कल्याणी का चालुक्य वंश भी एक था।

➽वातापी व बादामी का चालुक्य वंश

➽छठी शताब्दी के मध्य से लेकर आठवीं शताब्दी के मध्य तक दक्षिणापथ पर जिस चालुक्य वंश की शाखा का अधिपत्य रहा उसका उत्कर्ष स्थल बादामी या वातापी होने के कारण उसे बादामी या वातापी चालुक्य कहा जाता है।
➽इस शाखा को पूर्वकालीन पश्चिमी चालुक्य भी कहा जाता है।
➽ पुलकेशिन द्वितीय के एहोल अभिलेख से बादामी के चालुक्यों के बार में प्रमाणिक ज्ञान प्राप्त होता है।
➽ ऐहोल लेख की रचना रविकृत ने की थी।

➽वातापी का चालुक्य वंश

➽वाकाटक वंश के राजा बड़े प्रतापी थे और उन्होंने विदेशी कुषाणों की शक्ति का क्षय करने में बहुत अधिक कर्तृत्व प्रदर्शित किया था।
➽ इन राजाओं ने अपनी विजयों के उपलक्ष्य में अनेक अश्वमेध यज्ञों का भी अनुष्ठान किया।
➽पाँचवीं सदी के प्रारम्भ में गुप्तों के उत्कर्ष के कारण इस वंश के राज्य की स्वतंत्र सत्ता का अन्त हुआ।
➽ कदम्ब वंश का राज्य उत्तरी कनारा बेलगाँव और धारवाड़ के प्रदेशों में था।
➽प्रतापी गुप्त सम्राटों ने इसे भी गुप्त साम्राज्य की अधीनता में लाने में सफलता प्राप्त की थी।
➽पल्लव वंश की राजधानी कांची थी, और सम्राट समुद्रगुप्त ने उसकी भी विजय की थी।
➽गुप्त साम्राज्य के क्षीण होने पर उत्तरी भारत के समान दक्षिणापथ में भी अनेक राजवंशों ने स्वतंत्रतापूर्वक शासन करना प्रारम्भ किया।
➽दक्षिणापथ के इन राज्यों में चालुक्य और राष्ट्रकूट वंशों के द्वारा स्थापित राज्य प्रधान थे।
➽उनके अतिरिक्त देवगिरि के यादव, वारंगल के काकतीय, कोंकण के शिलाहार, बनवासी के कदम्ब, तलकाड़ के गंग और द्वारसमुद्र के होयसल वंशों ने भी इस युग में दक्षिणापथ के विविध प्रदेशों पर शासन किया।
➽जिस प्रकार उत्तरी भारत में विविध राजवंशों के प्रतापी व महत्त्वाकांक्षी राजा विजय यात्राएँ करने और अन्य राजाओं को जीतकर अपना उत्कर्ष करने के लिए तत्पर रहते थे, वही दशा दक्षिणापथ में भी थी।

➽वातापी के चालुक्य वंश का अन्त

➽विक्रमादित्य द्वितीय के बाद 744 ई. के लगभग कीर्तिवर्मा द्वितीय विशाल चालुक्य साम्राज्य का स्वामी बना।
➽पर वह अपने पूर्वजों द्वारा स्थापित साम्राज्य को क़ायम रखने में असमर्थ रहा।
➽दन्तिदुर्ग नामक राष्ट्रकूट नेता ने उसे परास्त कर महाराष्ट्र में एक नए राजवंश की नींव डाली, और धीरे-धीरे राष्ट्रकूटों का यह वंश इतना शक्तिशाली हो गया, कि चालुक्यों का अन्त कर दक्षिणापथ पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया।
➽चालुक्यों के राज्य का अन्त 753 ई. के लगभग हुआ।
➽वातापी के चालुक्य राजा न केवल वीर और विजेता थे, अपितु उन्होंने साहित्य, वास्तुकला आदि के संरक्षण व संवर्धन की ओर भी अपना ध्यान दिया।

वातापी के चालुक्य शासक
शासकशासनकाल
जयसिंह चालुक्य-
रणराग-
पुलकेशी प्रथम(550-566 ई.)
कीर्तिवर्मा प्रथम(566-567 ई.)
मंगलेश(597-98 से 609 ई.)
पुलकेशी द्वितीय(609-10 से 642-43 ई.)
विक्रमादित्य प्रथम(654-55 से 680 ई.)
विनयादित्य(680 से 696 ई.)
विजयादित्य(696 से 733 ई.)
विक्रमादित्य द्वितीय(733 से 745 ई.)
कीर्तिवर्मा द्वितीय(745 से 753 ई.)



➽जयसिंह

➽जयसिंह को चालुक्य साम्राज्य का प्रथम शासक माना जाता है। 
➽कैरा ताम्रपत्र अभिलेखीय साक्ष्य से यह प्रमाणित होता है कि, जयसिंह, चालुक्य राजवंश का प्रथम ऐतिहासिक शासक था।

➽रणराग

➽रणराग, वातापी के चालुक्य नरेश जयसिंह का पुत्र एवं उत्तराधिकारी था।
➽रणराग सम्भवतः 520 ई. में वातापी के राज्यसिंहासन पर बैठा।
➽गदा युद्ध में कुशल होने के कारण उसने 'रण रागसिंह' की उपाधि धारण की थी।

➽पुलकेशी प्रथम (550-566 ई.)

➽पुलकेशी प्रथम (550-566 ई.), चालुक्य नरेश रणराग का पुत्र था। पुलकेशी प्रथम को पुलकेशिन प्रथम के नाम से भी जाना जाता था।
➽यह चालुक्य वंश का सबसे प्रतापी राजा था।
➽पुलकेशी प्रथम दक्षिण में वातापी में चालुक्य वंश का प्रवर्तक था।
➽दक्षिणापथ में चालुक्य साम्राज्य के राज्य की स्थापना छठी सदी के मध्य भाग में हुई, जब कि गुप्त साम्राज्य का क्षय प्रारम्भ हो चुका था।
➽यह निश्चित है, कि 543 ई. तक पुलकेशी नामक चालुक्य राजा वातापी (बीजापुर ज़िले में, बादामी) को राजधानी बनाकर अपने पृथक् व स्वतंत्र राज्य की स्थापना कर चुका था।
➽महाराज मंगलेश के 'महाकूट अभिलेख' से प्रमाणित होता है कि, उसने 'हिरण्यगर्भ', 'अश्वमेध', 'अग्निष्टोम', 'अग्नि चयन', 'वाजपेय', 'बहुसुवर्ण', 'पुण्डरीक' यज्ञ करवाया था।
➽इसने 'रण विक्रम', 'सत्याश्रय', 'धर्म महाराज', 'पृथ्वीवल्लभराज' तथा 'राजसिंह' आदि की उपाधियाँ धारण की थीं।
➽उनका प्राचीन इतिहास अन्धकार में है, पर उसने वातापी के समीपवर्ती प्रदेशों को जीत कर अपनी शक्ति का विस्तार किया था, और उसी उपलक्ष्य में अश्वमेध यज्ञ भी किया था। 
➽इस यज्ञ के अनुष्ठान से सूचित होता है कि, वह अच्छा प्रबल और दिग्विजयी राजा था।

➽कीर्तिवर्मा प्रथम

➽कीर्तिवर्मा प्रथम बादामी के चालुक्य वंश के नरेश पुलकेशी प्रथम का पुत्र था। 
➽वह लगभग 566-67 ई. में सिंहासन पर बैठा था और चालुक्य राजा बना। 
➽कई दृष्टियों से उसे चालुक्यों की राजनीतिक शक्ति का संस्थापक कहा जा सकता है। 
➽यह माना जाता है कि कीर्तिवर्मा की विजयी सेना ने उत्तर में बिहार और बंगाल तक तथा दक्षिण में चोल और पांड्य क्षेत्रों तक प्रयाण किया था। किंतु कदाचित्‌ यह अत्युक्तिपूर्ण प्रशंसा हैं।
➽कीर्तिवर्मा अपने पिता के समान प्रतापी और विजेता था।
➽अभिलेखों में उसे मगध, अंग, बंग, कलिंग, मुद्रक, गंग, मषक, पाण्ड्य, चोल, द्रमिक, मौर्य, नल, कदम्ब आदि राज्यों का विजेता कहा गया है।
➽कदम्ब वंश का शासन वातापी के दक्षिण-पूर्व में था, और सम्भवतः मौर्य और नल वंशों के छोटे-छोटे राज्य भी दक्षिणापथ में विद्यमान थे।
➽कीर्तिवर्मा प्रथम ने सम्भवतः बनवासी के कदम्बों, वेलारी, कार्नूल एवं कोंकण के मौर्यों को युद्ध में हराया।
➽'महाकूट स्तम्भ' लेख से प्रमाणित होता है कि, उसने 'बहुसुवर्ण' एवं 'अग्निस्टोम' यज्ञ को सम्पन्न करवाया था।
➽कीर्तिवर्मा प्रथम ने 'पुरुरण पराक्रम', 'पृथ्वी वल्लभ' एवं 'सत्याश्रय' की उपाधि धारण की थी।
➽598 ई. के लगभग कीर्तिवर्मा प्रथम की मुत्यु हो गई। उसके बाद उसका भाई मंगलेश अगला चालुक्य शासक बना, चूंकि कीर्तिवर्मा के पुत्र अल्पवयस्क थे।

➽मंगलेश

➽मंगलेश ने गद्दी पर बैठने के उपरान्त कलचुरियों को पराजित किया था। कीर्तिवर्मा प्रथम के बाद उसके पुत्र पुलकेशी द्वितीय को राजा बनना चाहिए था।
➽उसके चाचा (कीर्तिवर्मा के भाई) मंगलेश (597-98 से 609 ई.) ने बल प्रयोग करके वातापी की गद्दी पर अधिकार कर लिया, और कुछ समय तक अपने अग्रज द्वारा स्थापित राज्य का उपभोग किया।
➽वल्लभी नरेश ने मंगलेश द्वारा आरम्भ किये गये विजय अभियान को रोकने का प्रयत्न किया, किंतु इस कार्य में वह अल्प सफलता ही प्राप्त कर सका।
➽मंगलेश ने कदम्बों को समूल से नष्ट कर दिया था।
➽ऐहोल अभिलेख के उल्लेख के आधार पर प्रतीत होता है कि, मंगलेश अपने पुत्र को अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहता था।
➽इस बीच में पुलकेशी द्वितीय भी शान्त नहीं बैठा था। 
➽उसने राज्य प्राप्त करने का प्रयत्न जारी रखा था।
अंत में गृह युद्ध द्वारा मंगलेश को मारकर पुलकेशी द्वितीय राजसिंहासन पर आरूढ़ हो गया।

➽पुलकेशी द्वितीय

कीर्तिवर्मन प्रथम का पुत्र पुलकेसिन द्वितीय लगभग 609-10 ई. में गद्दी में बैठा. उसने शीघ्र ही अपने को इस राजवंश का सबसे योग्य शासक प्रमाणित किया. 642 ई. में (नए पल्लव सम्राट) नरसिंह वर्मन ने अपने पिता (महेंद्रवर्मन) के अपमान का बदला लेने के लिए (श्रीलंका के राजकुमार मानव वर्मा के सहयोग से) चालुक्यों की राजधानी बादामी पर आक्रमण कर दिया. पुलकेसिन द्वितीय की पराजय तथा मृत्यु ने बादामी चालुक्यों के लिए इतना भयंकर संकट का समय पैदा कर दिया कि लगभग तेरह वर्ष (642 ई. से 655 ई.) तक चालुक्यों की गद्दी पर कोई मानी सम्राट ही नहीं रहा.
Pulakeshin second पुलकेसिन द्वितीय www.indgk.com

➽पुलकेशी द्वितीय, पुलकेशी प्रथम का पौत्र तथा चालुक्य वंश का चौथा राजा था, जिसने 609-642 ई. तक राज्य किया। 
➽वह महाराजाधिराज हर्षवर्धन का समसामयिक तथा प्रतिद्वन्द्वी था। 
➽उसने 620 ई. में दक्षिण पर हर्ष का आक्रमण विफल कर दिया।

➽प्रसिद्धि

➽वातापी के चालुक्य वंश में पुलकेशी द्वितीय सबसे अधिक शक्तिशाली और प्रसिद्ध हुआ है। 
➽मंगलेश और पुलकेशी के गृह-कलह के अवसर पर चालुक्य वंश की शक्ति बहुत ही क्षीण हो गई थी और कीर्तिवर्मा प्रथम द्वारा विजित अनेक प्रदेश फिर से स्वतंत्र हो गए थे। 
➽इतना ही नहीं, अनेक अन्य राजाओं ने भी चालुक्य साम्राज्य पर आक्रमण प्रारम्भ कर दिए थे। 
➽इस दशा में पुलेकशी द्वितीय ने बहुत धीरता और शक्ति का परिचय दिया। उसने न केवल विद्रोही प्रदेशों को फिर से विजय किया, अपितु अनेक नए प्रदेशों की भी विजय की।

➽अभिलेखीय प्रमाण

➽अभिलेखीय प्रमाण के आधार प्रतीत होता है कि पल्लवंशी शासक नरसिंहवर्मन प्रथम ने पुलकेशिन द्वितीय को परास्त कर उसकी राजधानी बादामी पर अधिकार कर लिया। 
➽सम्भवतः अपनी राजधानी की सुरक्षा करता हुआ ही पुलकेशिन द्वितीय पल्लव सेनानायक द्वारा युद्ध क्षेत्र में ही मार दिया गया। 
➽इस विजय के बाद ही नरसिंह वर्मन 'वातापिकोंड' की उपाधि धारण की।

➽विभिन्न वंशों से युद्ध

➽राजसिंहासन पर आरूढ़ होने के बाद पुलकेशी द्वितीय ने मैसूर के गंग राजा, उत्तर कोंकण के मौर्य राजा और मलाबार के अनूप राजा को परास्त किया। 
➽लाटदेश (दक्षिणी गुजरात), मालवा और गुर्जरों ने भी पुलकेशी द्वितीय के सम्मुख सिर झुकाया और इस प्रकार उत्तर दिशा में भी उसने अपनी शक्ति का विस्तार किया। 
➽इतना ही नहीं, उत्तर-पूर्व की ओर आगे बढ़कर उसने दक्षिण कौशल और कलिंग को भी परास्त किया। 
➽दक्षिण दिशा में विजय यात्रा करते हुए पुलकेशी द्वितीय ने वेंगी (कृष्णा और गोदावरी नदियों के बीच में स्थित) के राजा को जीता, और फिर पल्लव वंश के राजा को बुरी तरह परास्त कर वह कांची (काञ्जीवरम्) के समीप तक पहुँच गया। 
➽कावेरी नदी को पार कर इस प्रतापी चालुक्य राजा ने चोल, पांड्य और केरल राज्यों को अपनी अधीनता स्वीकृत करने के लिए विवश किया। 
➽इन विजयों के कारण पुलकेशी द्वितीय विन्ध्याचल के दक्षिण के सम्पूर्ण दक्षिणी भारत का अधिपति बन गया।
➽कन्नौज का सम्राट हर्षवर्धन, पुलकेशी द्वितीय का समकालीन था। 
➽वह भी उत्तरी भारत में अपने साम्राज्य की स्थापना में तत्पर था। नर्मदा नदी के उत्तर के सब प्रदेश उसकी अधीनता को स्वीकृत करते थे। 
➽वस्तुतः इस समय भारत में दो ही प्रधान राजशक्तियाँ थीं, उत्तर में हर्षवर्धन और दक्षिण में पुलकेशी द्वितीय।
➽यह स्वाभाविक था, कि उनमें संघर्ष होता। 
➽नर्मदा नदी के तट पर दक्षिणी और उत्तरी राजशक्तियों में घोर युद्ध हुआ जिसमें पुलकेशी द्वितीय, हर्षवर्धन को परास्त करने में सफल हुआ।
➽हर्षवर्धन के साथ संघर्ष में विजयी होकर पुलकेशी सुदूर दक्षिण की विजय के लिए प्रवृत्त हुआ था और उसने वेंगि और कांची का परास्त करते हुए चोल, पांड्य और केरल राज्यों को भी अपने अधीन किया था।
➽इस युग के अन्य भारतीय राजाओं के समान पुलकेशी द्वितीय भी किसी स्थायी साम्राज्य की नींव डाल सकने में असमर्थ रहा। 
➽पल्लव आदि शक्तिशाली राजवंशों के राजाओं को युद्ध में परास्त कर उन्हें वह अपना वशवर्ती बनाने में अवश्य सफल हुआ था, पर उसने उनका मूलोच्छेद नहीं किया था। 
➽इसीलिए जब पल्लवराज नरसिंह वर्मन प्रथम ने अपने राज्य की शक्ति को पुनः संगठित किया, तो वह न केवल चालुक्य राज्य की अधीनता से मुक्त हो गया, अपितु एक शक्तिशाली सेना को साथ लेकर असने चालुक्यों के राज्य पर भी आक्रमण किया और युद्ध में पुलकेशी को मारकर वातापी पर अधिकार कर लिया। 
➽इस युग की राजनीतिक दशा के स्पष्टीकरण के लिए इस घटना का महत्त्व बहुत अधिक है। 
➽जो पल्लव वंश शुरू में चालुक्यों के द्वारा बुरी तरह परास्त हुआ था, एक नये महत्त्वाकांक्षी राजा के नेतृत्व में वह इतना अधिक शक्तिशाली हो गया था कि, उसने चालुक्य राज्य को जड़ से हिला दिया था। 
➽इस काल में साम्राज्यों के निर्माण और विनाश सम्राट के वैयक्तिक शौर्य और योग्यता पर ही आश्रित थे।

➽उत्कर्ष काल

➽अपने उत्कर्ष काल में चालुक्य साम्राज्य इतना विस्तृत और शक्तिशाली था, कि पुलकेशी द्वितीय ने ईरान के शाह ख़ुसरू द्वितीय के पास अपने राजदूत भेजे थे। 
➽ये दूत 652 ई. में ईरान गए थे। 
➽बदले में ख़ुसरू द्वितीय ने भी अपने दूत पुलकेशी की सेवा में भेजे। 
➽अजन्ता के एक चित्र में एक ईरानी राजदूत के आगमन को अंकित भी किया गया है। 
➽पुलकेशी द्धितीय की कीर्ति सुदूरवर्ती फ़ारस देश तक पहुँच गयी थी। 
➽फ़ारस के शाह ख़ुसरो द्वितीय ने 625-26 ई. में पुलकेशी द्वितीय के द्वारा भेजे गये दूतमंडल से भेंट की थी। 
➽इसके बदले में उसने भी अपना दूतमंडल पुलकेशी द्वितीय की सेवा में भेजा। 
➽अजंता की गुफा संख्या 1 में एक भित्तिचित्र में फ़ारस के दूतमंडल को पुलकेशी द्वितीय के सम्मुख अपना परिचय पत्र प्रस्तुत करते हुए दिखाया गया है। 
➽चीनी यात्री ह्वेनसांग 641 ई. में उसके राज्य में आया था और उसके राज्य का भ्रमण किया था। 
➽उसने पुलकेशी द्वितीय के शौर्य और उसके सामंतों की स्वामिभक्ति की प्रशंसा की है। 
➽किन्तु 642 ई. में इस शक्तिशाली राजा को पल्लव राजा नरसिंह वर्मन प्रथम ने एक युद्ध में पराजित कर मार डाला। 
➽उसने उसकी राजधानी पर भी अधिकार कर लिया और कुछ समय के लिए उसके वंश का उच्छेद कर दिया।

➽उपधि

➽ऐहोल प्रशस्ति के अनुसार कीर्तिवर्मन प्रथम का पुत्र पुलकेशिन द्वितीय अपने चाचा मंगलेश की हत्या कर सिंहासन पर बैठा। 
➽उसने 'सत्याश्रय', 'श्री पृथ्वी वल्लभ महाराज' की उपाधि धारण की। 
➽उसने अपने सैन्य अभियान के अन्तर्गत कदम्बों की राजधानी बनवासी पर आक्रमण कर विजयी हुआ
➽ इसके अतिरिक्त पुलकेशिन द्वितीय ने गंग राज्य, कोंकण राज्य, लाट राज्य, मालवा राज्य एवं गुर्जन राज्य पर विजय उपधि धारण की।

➽विक्रमादित्य प्रथम 

➽विक्रमादित्य प्रथम पुलकेशी द्वितीय का पुत्र था, तथा पिता की मृत्यु के बाद राज्य का वास्तविक उत्तराधिकारी था। 
➽पुलकेशी द्वितीय की मृत्यु के बाद बादामी सहित कुछ अन्य दक्षिणी प्रान्तों की कमान पल्लवों के हाथों में रही। 
➽इस दौरान 642 से 655 ई. तक चालुक्यों की राजगद्दी ख़ाली रही। 
➽655 में विक्रमादित्य प्रथम राजगद्दी पर विराजित होने में कामयाब हुआ। 
➽उसने बादामी को पुन: हासिल किया और शत्रुओं द्वारा विजित कई अन्य क्षेत्रों को भी पुन: अपने साम्राज्य में जोड़ा। उसने 681 ई. तक शासन किया था।
➽पल्लवराज नरसिंह वर्मन प्रथम से युद्ध करते हुए पुलकेशी द्वितीय की मृत्यु हो गई थी और वातापी पर भी पल्लवों का अधिकार हो गया था।
➽संकट के इस समय में भी चालुक्यों की शक्ति का पूरी तरह से अन्त नहीं हुआ था।
➽विक्रमादित्य प्रथम अपने पिता के समान ही वीर और महात्वाकांक्षी था।
➽उसने लगभग 655 से 681 ई. में चालुक्य राजगद्दी प्राप्त की थी।
➽उसके सिंहासनारूढ़ होने के समय चोलों, पाण्ड्यों एवं केरलों ने अपने को स्वतंत्र घोषित कर दिया था।
➽विक्रमादित्य प्रथम ने न केवल वातापी को पल्लवों की अधीनता से मुक्त किया, अपितु तेरह वर्षों तक निरन्तर युद्ध करने के बाद पल्लवराज की शक्ति को बुरी तरह कुचलकर 654 ई. में कांची की भी विजय कर ली।
➽उसने पल्लवों के राज्य कांची पर अधिकार कर अपने पिता की पराजय का बदला लिया था।
➽उसने 'श्रीपृथ्वीवल्लभ', 'भट्टारक', 'महाराजाधिराज', 'परमेश्वर', 'रण रसिक' आदि उपाधियाँ धारण की।
➽विक्रमादित्य प्रथम सम्भवतः अपने शासन काल के अन्तिम दिनों में पल्लव नरेश परमेश्वर वर्मन प्रथम से पराजित हो गया था।
➽यह विजय संदिग्ध है, क्योंकि पल्लवकालीन अभिलेख परमेश्वर वर्मन की विजय तथा चालुक्यों के अभिलेख में विक्रमादित्य प्रथम की विजय का उल्लेख मिलता है।
➽वैसे निष्कर्षतः यही अनुमान लगाया जाता है कि, अन्तिम रूप से पल्लव ही विजयी रहे थे।

➽विनयादित्य (680 से 696 ई.)

➽विनयादित्य (680 से 696 ई.), विक्रमादित्य प्रथम का पुत्र और राजसिंहासन का उत्तराधिकारी था। 
➽उसके समय में चालुक्य साम्राज्य की शक्ति अक्षुण्ण बनी रही।
➽अभिलेखों में इसका उल्लेख 'त्रैराज्यपल्लवपति' के रूप में किया गया है।
➽'जेजुरी ताम्रपत्र' के अनुसार- विनयादित्य ने अपने शासन के ग्यारहवें एवं चौदहवें वर्ष में पल्लवों, कलभों, मालवों एवं चोलों पर विजय प्राप्त की थी।
➽मालवों कों जीतने के उपरान्त विनयादित्य ने 'सकलोत्तरपथनाथ' की उपाधि धारण की थी।
➽इसके अतिरिक्त उसने 'युद्धमल्ल', 'भट्टारक', 'महाराजाधिराज', 'राजाश्रय' आदि की उपाधियाँ धारण कीं।
➽'सिरसी लेख' में उसे 'सकलोन्तरापथनाथ', 'पलिध्वज', 'पंचमहाशब्द', 'पद्मरागमणि' आदि का प्राप्त कहा गया है।

➽विजयादित्य (696 से 733 ई.)

➽विजयादित्य (696 से 733 ई.), विनयादित्य का पुत्र एवं राजसिंहासन का उत्तराधिकारी था। उसके समय में चालुक्य साम्राज्य की शक्ति पुर्ण रूप से अक्षुण्ण बनी रही।
➽उसके शासनकाल के अब तक लगभग 40 अभिलेख प्राप्त हो चुके हैं।
➽अपने शासन के दौरान उसने लगभग चार प्रदेशों को जीता था, पर इसके विषय में स्पष्ट जानकारी का अभाव है।
➽विजयादित्य का शासन काल ब्राह्मण धर्म के पुनरुत्थान एवं स्थापत्य तथा ललित कलाओं के विकास का काल था।
➽उसने बीजापुर ज़िले के 'पट्टडकल' नामक स्थान में 'विजयेश्वर शिव मंदिर' का निर्माण कराया था।
➽उसकी बहन कुमकुम देवी ने 'लक्ष्मेश्वर' में 'आनेसेज्येयवसादि' नामक एक भव्य जैन मंदिर का निर्माण कराया।
➽विजयादित्य पिता की भांति उसने 'श्रीपृथ्वीवल्लभ', 'महाराजाधिराज', 'परमेश्वर', 'सत्याश्रम', 'भट्टारक', 'साहसरसिक' तथा 'समस्त भुवनाश्रय' आदि का विरुद्ध धारण किया था।

➽विक्रमादित्य द्वितीय (733 से 745 ई.)

➽विक्रमादित्य द्वितीय (733 से 745 ई.), विजयादित्य का पुत्र और राजसिंहासन का उत्तराधिकारी था। ➽विक्रमादित्य द्वितीय ने भी अपने समय में चालुक्य साम्राज्य की शक्ति को अक्षुण्ण बनाये रखा।
➽'नरवण', 'केन्दूर', 'वक्रकलेरि' एवं 'विक्रमादित्य' की रानी 'लोक महादेवी' के 'पट्टदकल' अभिलेख से यह प्रमाणित होता है कि, विक्रमादित्य द्वितीय ने पल्लव नरेश नंदि वर्मन द्वितीय को पराजित किया।
➽उसने कांची को भी विजित किया था और कांची को बिना क्षति पहुंचाये, वहां के 'राजसिंहेश्वर मंदिर' को अधिक आकर्षक बनाने के लिए रत्नादि भेंट किया।
➽इसने इस मंदिर की दीवार पर एक अभिलेख उत्कीर्ण करवाया और साथ ही पल्लवों की 'वातापीकोड' की तरह 'कांचिनकोड' की उपाधि धारण की थी।
➽सम्भवतः पल्लवों के राज्य कांची को विक्रमादित्य द्वितीय ने तीन बार विजित किया था।
➽विक्रमादित्य द्वितीय के शासनकाल में ही दक्कन पर अरबों ने आक्रमण किया था।
➽712 ई. में अरबों ने सिन्ध को जीतकर अपने अधीन कर लिया था, और स्वाभाविक रूप से उनकी यह इच्छा थी, कि भारत में और आगे अपनी शक्ति का विस्तार करें।
➽अरबों ने लाट देश (दक्षिणी गुजरात) पर आक्रमण किया, जो इस समय चालुक्य साम्राज्य के अंतर्गत था।
➽विक्रमादित्य द्वितीय के शौर्य के कारण अरबों को अपने प्रयत्न में सफलता नहीं मिली और यह प्रतापी चालुक्य राजा अरब आक्रमण से अपने साम्राज्य की रक्षा करने में समर्थ रहा।
➽सम्भवतः विक्रमादित्य ने पाण्ड्यों, चोलों, केरलों, एवं कलभ्रों को भी परास्त किया था।
➽प्रथम पत्नी 'लोक महादेवी' ने 'पट्टलक' में विशाल शिव मंदिर (विरुपाक्षमहादेव मंदिर) का निर्माण करवाया था, जो अब 'विरुपाक्ष महादेव मंदिर' के नाम से प्रसिद्ध है।
➽इस विशाल मंदिर के प्रभान शिल्पी 'आचार्य गुण्ड' थे, जिन्हें 'त्रिभुवनाचारि', 'आनिवारितचारि' तथा 'तेन्कणदिशासूत्रधारी' आदि उपाधियों से विभूषित किया गया था।
➽विक्रमादित्य द्वितीय के रचनात्मक व्यक्तित्व का विवरण 'लक्ष्मेश्वर' एवं 'ऐहोल' अभिलेखों से प्राप्त होता है।
➽विक्रमादित्य द्वितीय ने 'वल्लभदुर्येज', 'कांचियनकोंडु', 'महाराधिराज', 'श्रीपृथ्वीवल्लभ', 'परमेश्वर' आदि उपाधियां धारण की थीं।
➽विक्रमादित्य ने लगभग 745 ई. तक शासन किया।

➽कीर्तिवर्मा द्वितीय (745 से 753 ई.)

➽कीर्तिवर्मा द्वितीय (745 से 753 ई.), विक्रमादित्य द्वितीय का पुत्र एवं उत्तराधिकारी था।
➽अपने पिता की मृत्यु के बाद वह विशाल चालुक्य साम्राज्य का स्वामी बना।
➽इसने अपने युवराज काल में ही पल्लव नरेश नन्दि वर्मन को परास्त कर बहुमूल्य रत्न, हाथी एवं सुवर्ण प्राप्त किया था।
➽कीर्तिवर्मा द्वितीय ही सम्भवतः बादामी के चालुक्य शासकों की शृंखला का अंतिम शासक था।
➽उसने 'सार्वभौम', 'लक्ष्मी', 'पृथ्वी का प्रिय', 'राजाओं का राज' एवं 'महाराज' आदि की उपाधियाँ धारण की थीं।
➽चालुक्यों के सामंत दंतिदुर्ग (राष्टकूट) ने कीर्तिवर्मा द्वितीय को परास्त कर लगभग 753 ई. में अपने को स्वतंत्र शासक के रूप में स्थापित किया।
➽दंतिदुर्ग की इस विजय के विषय में 'समनगढ़' अभिलेख से जानकारी मिलती है।

➽कल्याणी का चालुक्य वंश

➽चालुक्यों की मुख्य शाखा का अन्तिम महत्त्वपूर्ण शासक सम्भवतः कीर्तिवर्मा द्वितीय था। 
➽चालुक्यों की कुछ छोटी शाखाओं ने भी कुछ दिन तक शासन किया। 
➽ऐसी ही एक शाखा कल्याणी के चालुक्यों की थी, जिसका महत्त्वपूर्ण शासक तैल अथवा तैलप द्वितीय था, आरम्भ में वह राष्ट्रकूटों का सामन्त था, परन्तु बाद में राष्ट्रकूटों की दुर्बलता का लाभ उठाकर वह एक स्वतंत्र शासक बन गया। 
➽उसने अन्तिम राष्ट्रकूट शासक कक्र को अपदस्त कर सत्ता पर अधिकार कर लिया। 
➽इसकी पत्नी 'जक्कल महादेवी' थी, जो राष्ट्रकूट शासक भामह की पुत्री थी। 
➽सत्तारूढ़ होने के बाद तैलप ने अपने राज्य की सीमाओं का विस्तार करना आरम्भ किया।
➽ उसके इस साम्राज्य विस्तारवादी नीति का प्रबल विरोधी गंग नरेश पांचाल देव था। 
➽दोनों के मध्य कई बार युद्ध हुआ। अन्त में वेल्लारी के सामन्त शासक गंगभूतिदेव की सहायता से तैलप ने पांचाल देव को पराजित कर मार दिया। 
➽इस महत्त्वपूर्ण विजय के उपलक्ष्य में तैलप द्वितीय ने 'पांचलमर्दनपंचानन' का विरुद्व धारण किया तथा अपने सहायक गंगभूतिदेव को तोरगाले का शासक बनाकर उसे 'आहवमल्ल' की उपाधि से अलंकृत किया।
➽ तैलप द्वितीय ने चेदि, उड़ीसा और कुंतल ने शासक उत्तम चोल तथा मालवा के परमार राजा मुंज को पराजित किया। 
➽ तैलप द्वितीय द्वारा मुंज के स्थान का उल्लेख आवन्तरकालीन ग्रन्थ आइना-ए-अकबरी तथा उज्जैन से प्राप्त अभिलेख में मिलता है। 
➽कन्नड़ कथाओं में तैलप द्वितीय को भगवान श्रीकृष्ण का अवतार कहा गया है। 
➽उसने 'भुनैकमल्ल', 'महासामन्तधिपति', 'आहमल्ल', 'महाराजाधिराज', 'परमेश्वर', 'परमभट्टारक', 'चालुक्यभरण', 'सत्याश्रम', 'कुलतिलक' तथा 'समस्तभुवनाश्रय' आदि उपाधियां धारण की थीं। 
➽पहले चालुक्य वंश की राजधानी वातापी थी, पर इस नये चालुक्य वंश ने कल्याणी को राजधानी बनाकर अपनी शक्ति का विस्तार किया। 
➽इसीलिए ये 'कल्याणी के चालुक्य' कहलाते हैं।

कल्याणी के चालुक्य शासक
शासकशासनकाल
तैलप-
सत्याश्रय(977 से 1008 ई.)
विक्रमादित्य पंचम(1008 ई.)
अच्चण द्वितीय-
जयसिंह जगदेकमल्ल(1015 से 1045 ई.)
सोमेश्वर प्रथम आहवमल्ल(1043 से 1068 ई.)
सोमेश्वर द्वितीय भुवनैकमल्ल(1068 से 1070 ई.)
विक्रमादित्य षष्ठ(1070 से 1126 ई.)
सोमेश्वर तृतीय(1126 से 1138 ई.)
जगदेकमल्ल द्वितीय(1138-1151 ई.)
तैलप तृतीय(1151-1156 ई.)
सोमेश्वर चतुर्थ(1181-1189 ई.)


➽तैल चालुक्य अथवा 'तैलप द्वितीय'

➽तैल चालुक्य अथवा 'तैलप द्वितीय' चालुक्य राजवंश का प्रतिष्ठापक था। 
➽उसकी राजधानी कल्याणी थी। 972 ई. के आसपास उसने अन्तिम राष्ट्रकूट राजा कर्क द्वितीय को परास्त किया था। 
➽तैल चालुक्य द्वारा प्रतिष्ठापित राजवंश ने 1119 ई. तक शासन किया।
➽कल्याणी के अपने सामन्त राज्य को राष्ट्रकूटों की अधीनता से मुक्त कर तैलप ने मान्यखेट पर आक्रमण किया।
➽ परमार राजा सीयक हर्ष राष्ट्रकूटों की इस राजधानी को तहस-नहस कर चुका था, पर उसने दक्षिणापथ में स्थायी रूप से शासन करने का प्रयत्न नहीं किया था। 
➽वह आँधी की तरह आया था, और मान्यखेट को उजाड़ कर आँधी की ही तरह वापस लौट गया था। 
➽अब जब तैलप ने उस पर आक्रमण किया, तो राष्ट्रकूट राजा कर्क (करक) उसका मुक़ाबला नहीं कर सका।
➽राष्ट्रकूट राज्य का अन्त हो गया, और तैलप के लिए दिग्विजय का मार्ग निष्कंटक हो गया।
➽विजय यात्रा करते हुए तैलप ने सबसे पूर्व लाट देश (दक्षिणी गुजरात) की विजय की, और फिर कन्नड़ देश को परास्त किया। 
➽कन्नड़ के बाद सुदूर दक्षिण में चोल राज्य पर चढ़ाई की गई। 
➽पर तैलप के सबसे महत्त्वपूर्ण युद्ध परमार राजा वाकपतिराज मुञ्ज के साथ हुए।
➽परमार वंश के महत्त्वाकांक्षी राजा दक्षिणापथ को अपनी विजयों का उपयुक्त क्षेत्र मानते थे।
➽सीयक हर्ष ने भी पहले मान्यखेट को ही अपनी महत्त्वाकांक्षाओं का शिकार बनाया था।
➽वाकपतिराज मुञ्ज ने छः बार चालुक्य राज्य पर चढ़ाई की, और छठी बार उसे बुरी तरह से परास्त किया था
➽ पर सातवीं बार जब उसने दक्षिणापथ में विजय यात्रा की, तो गोदावरी के तट पर घनघोर युद्ध हुआ, जिसमें मुञ्ज तैलप के हाथ पड़ गया, और चालुक्य राज ने उसका घात कर अपनी पुरानी पराजयों का प्रतिशोध लिया।
➽इस प्रकार अपने कुल के गौरव का पुनरुद्धार कर 24 वर्ष के शासन के बाद 967 ई. में तैलप की मृत्यु हो गई।

➽सत्याश्रय (977 से 1008 ई.)

➽सत्याश्रय (977 से 1008 ई.), तैलप द्वितीय की मृत्यु के बाद उसका उत्तराधिकारी बना। उसे 'सत्तिग' अथवा 'सत्तिम' नाम से भी सम्बोधित किया गया है।
➽सत्याश्रय का पहला सैनिक अभियान उत्तरी कोंकण प्रदेश के विरुद्ध था, इसमें वह सफल हुआ।
➽उसके शासन काल की मुख्य घटना चोल राज्य के अधिपति राजराज प्रथम की दिग्विजय है।
➽उसने गुर्जर देश के शासक चामुण्डराज को भी पराजित किया था।
➽सत्याश्रय के काल का सबसे भीषण युद्ध चोल शासक अरुमोलिवर्मन अथवा राजा रामप्रथम के साथ हुआ। 
➽इस युद्ध में सत्याश्रय पराजित हुआ।
➽उसने 'आकर्लक चरित्र', 'इरिवेंडंग' एवं 'आहवमल्ल' आदि अनेक विरुद्वों को धारण किया था।
➽सत्याश्रय व्यक्तिगत रूप से जैन धर्म का अनुयायी था।
➽इसका गुरु विमलचन्द्र जैन दर्शन का महान् विद्धान था।
➽सत्याश्रय विद्धानों का संरक्षक भी था। कन्नड़ कवि गदायुद्ध को इसका संरक्षण प्राप्त था।

➽विक्रमादित्य पंचम

➽विक्रमादित्य पंचम, सत्याश्रय के बाद कल्याणी के राजसिंहासन पर आरूढ़ हुआ।
➽इसने लगभग 1008 ई. में चालुक्य साम्राज्य की गद्दी को सम्भाला था।
➽उसके समय में मालवा के परमारों के साथ चालुक्यों का पुनः संघर्ष हुआ, और वाकपतिराज मुञ्ज की पराजय व हत्या का प्रतिशोध करने के लिए परमार राजा भोज ने चालुक्य राज्य पर आक्रमण कर उसे परास्त किया।
➽पर बाद में राजा भोज ने भी विक्रमादित्य पंचम से पराजय का मुँह देखा था।
➽विक्रमादित्य पंचम ने अपने पूर्वजों की नीतियों का अनुसरण करते हुए कई यु़द्ध लड़े, जिसमें उसे सफलता मिली।
➽इसकी और किसी उपलब्धियों के बारे में जानकारी नहीं मिली है।
➽अभिलेखों में इसके 'वल्लभवनरेन्द्र' तथा 'त्रिभुवनमल्ल' आदि विरुद्वों का उल्लेख मिलता है।
➽एक अभिलेख में उसकी बहन अनुष्कादेवी का उल्लेख मिलता है, जो 'किसकाड' राज्य की शासिका थी।
➽इसे 'लक्ष्मी का अवतार', 'दान देने वाली', 'बुद्धिमती', 'सत्य और सच्चरिता' कहा गया है।

➽अच्चण द्वितीय

➽अच्चण द्वितीय, विक्रमादित्य पंचम के बाद राजगद्दी पर बैठा। अच्चरण, विक्रमादित्य पंचम का भाई था। 
➽1015 ई. में उसके भाई जयसिंह द्वितीय ने उसे पदच्युत कर दिया।

➽जयसिंह जगदेकमल्ल (1015 से 1045 ई.)

➽जयसिंह जगदेकमल्ल (1015 से 1045 ई.) को 'जयसिंह द्वितीय' के नाम से भी जाना जाता है। 
➽अच्चण द्वितीय पश्चिमी चालुक्यों की बढ़ती हुई शक्ति व दबाव को रोकने में विफल रहा था। 
➽ऐसी स्थिति में उसका भाई 'जयसिंह जगदेकमल्ल' उसे गद्दी से हटाकर स्वयं सिंहासन पर बैठा। 
➽इसका विरुद्ध 'जगदेकमल्ल' था, जो इसकी वीरता का परिचायक था।
➽जयसिंह जगदेकमल्ल ने 1015 ई. में अपने पूर्वजों की रणरक्त नीति का अनुसरण करते हुए अपने राज्य की रक्षा की।
➽परमार राजा भोज कलचुरि राजा गंगेयदेव तथा चोल शासक राजेन्द्र चोल ने एक संघ बनाकर जयसिंह पर आक्रमण किए।
➽जयसिंह ने इनका सामना किया और इन्हें रोकने में पूरी तरह से सफल रहा।
➽'तिरुवांलगाडु अभिलेख' में राजेन्द्र चोल को तैलप वंश का उन्मूलक कहा गया है।
➽जयसिंह ने 'सिंगदे', 'जयदेक्कमल्ल', 'त्रैलोकमल्ल', 'मल्लिकामोद', 'विक्रमसिंह' आदि उपाधियाँ धारण की थीं।
➽26 वर्ष के शासन के बाद 1045 ई. में जयसिंह की मृत्यु हो गई।

➽सोमेश्वर प्रथम(1043 से 1068 ई.)

➽सोमेश्वर प्रथम (1043 से 1068 ई.) ने अपने शासनकाल में चालुक्य राजधानी मान्यखेट में स्थानान्तरित कर कल्याणी में शासन किया। 
➽यह कल्याणी के चालुक्य वंश का सबसे प्रतापी व शक्तिशाली राजा था। 
➽अपने विरुद 'आहवमल्ल' को सार्थक कर उसने दूर-दूर तक विजय यात्राएँ कीं, और चालुक्यों के राज्य को एक विशाल साम्राज्य के रूप में परिवर्तित कर दिया।

➽विभिन्न वंशों के साथ युद्ध

➽इस समय चालुक्यों के मुख्य प्रतिस्पर्धी मालवा के परमार और सुदूर दक्षिण के चोल राजा थे। सोमेश्वर ने इन दोनों शत्रुओं के साथ घनघोर युद्ध किए।
➽परमार राजा भोज को परास्त कर उसने परमार राज्य की राजधानी 'धार' पर अधिकार कर लिया, और भोज को उज्जयिनी में आश्रय लेने के लिए विवश कर दिया। 
➽पर चालुक्यों का मालवा पर यह *आधिपत्य देर तक स्थिर नहीं रह सका। 
➽कुछ समय बाद भोज ने एक बड़ी सेना को साथ लेकर धारा पर चढ़ाई की, और चालुक्यों के शासन का अन्त कर अपनी राजधानी में पुनः प्रवेश किया।
➽सुदूर दक्षिण के चोल राजा से भी सोमेश्वर के अनेक युद्ध हुए, और कुछ समय के लिए कांची पर भी चालुक्यों का आधिपत्य हो गया। 
➽केवल परमारों और चोलों के साथ हुए युद्धों में ही सोमेश्वर ने अपनी 'आहवमल्लता' का परिचय नहीं दिया
➽चोलों को परास्त कर उसने उत्तरी भारत की दिग्विजय के लिए प्रस्थान किया।
➽पल्लव वंश की यह पुरानी राजधानी इस समय चोल शक्ति की महत्त्वपूर्ण केन्द्र थी।
➽एक शक्तिशाली सेना को साथ लेकर उसने पहले जेजाकभुक्ति के चन्देल राजा को परास्त किया।
➽महमूद गज़नवी इस राज्य को भी जीतने में समर्थ हुआ था, पर उसके उत्तराधिकारी के शासन काल में ग्यारहवीं सदी के उत्तरार्ध में कीर्तिवर्मा नामक वीर चन्देल ने अपने पूर्वजों के स्वतंत्र राज्य का पुनरुद्धार कर लिया था।
➽सोमेश्वर के आक्रमण के समय सम्भवतः कीर्तिवर्मा ही चन्देल राज्य का स्वामी था। 
➽चन्देल राज्य को जीतकर सोमेश्वर ने कच्छपघातों को विजय किया, और फिर गंगा - यमुना के उन प्रदेशों पर आक्रमण किया, जो कन्नौज के राज्य के अंतर्गत थे।
➽अभी कन्नौज पर गहड़वाल वंश के प्रतापी राजाओं का आधिपत्य नहीं हुआ था, और वहाँ गुर्जर प्रतिहार वंश का ही शासन क़ायम था। 
➽जो कि इस समय तक बहुत निर्बल हो चुका था। 
➽कन्नौज का अधिपति चालुक्य राज सोमेश्वर के सम्मुख नहीं टिक सका, और उसने भागकर उत्तरी पर्वतों की शरण ली।
➽चेदि के कलचुरी राजा कर्णदेव (1063-1093) ने चालुक्य आक्रमण का मुक़ाबला करने में अधिक साहस दिखाया, पर उसे भी सोमेश्वर के सम्मुख परास्त होना पड़ा। 
➽जिस समय सोमेश्वर स्वयं उत्तरी भारत की विजय यात्रा में तत्पर था, उसका पुत्र विक्रमादित्य पूर्वी भारत में अंग, बंग, मगध और मिथिला के प्रदेशों की विजय कर रहा था।
➽विक्रमादित्य ने पूर्व में और आगे बढ़कर कामरूप (असम) पर भी आक्रमण किया, पर उसे जीतने में उसे सफलता प्राप्त नहीं हुई।
➽पर यह ध्यान में रखना चाहिए कि सोमेश्वर और विक्रमादित्य की विजय यात्राओं ने किसी स्थायी साम्राज्य की नींव नहीं डाली। 
➽वे आँधी की तरह सम्पूर्ण उत्तरी भारत पर छा गए, और वहाँ तहस-नहस मचाकर आँधी की तरह ही दक्षिणापथ लौट गए।
➽इन दिग्विजयों ने केवल देश में उथल-पुथल, अव्यवस्था और अराजकता ही उत्पन्न की। 
➽कोई स्थायी परिणाम उनका नहीं हुआ। 
➽उसमें सन्देह नहीं कि सोमेश्वर एक महान् विजेता था, और अनेक युद्धों में उसने अपने अनुपम शौर्य का प्रदर्शन किया था।     

➽सोमेश्वर द्वितीय भुवनैकमल्ल  

➽अपने पिता सोमेश्वर प्रथम आहवमल्ल की मृत्यु (1068 ई.) के बाद सोमेश्वर द्वितीय विशाल चालुक्य राज्य का स्वामी बना।
➽उत्तरी भारत की यात्राओं में जिस विक्रमादित्य ने अंग, बंग, मगध आदि की विजय कर अदभुत पराक्रम प्रदर्शित किया था, वह सोमेश्वर प्रथम का कनिष्क पुत्र था।
➽पिता की मृत्यु के समय वह सुदूर दक्षिण में चोल राज्य के साथ संघर्ष में व्याप्त था।
➽सोमेश्वर प्रथम की इच्छा थी कि, उसके बाद उसका सुयोग्य पुत्र विक्रमादित्य ही चालुक्य राज का स्वामी बने।
➽विक्रमादित्य की अनुपस्थिति से लाभ उठाकर सोमेश्वर द्वितीय ने कल्याणी की राजगद्दी पर क़ब्ज़ा कर लिया, और विक्रमादित्य ने भी उसे चालुक्य राज्य के न्याय्य राजा के रूप में स्वीकृत किया।
➽सोमेश्वर द्वितीय सर्वथा अयोग्य शासक था।
➽उसके असद्व्यवहार से जनता दुखी हो गई, और चालुक्यों की राजशक्ति क्षीण होने लगी।
➽इस स्थिति में 1076 ई. में विक्रमादित्य ने उसे राजगद्दी से उतारकर स्वयं कल्याणी के राजसिंहासन पर अधिकार कर लिया। 

➽विक्रमादित्य षष्ठ  

➽विक्रमादित्य षष्ठ (1076 से 1126 ई.) कल्याणी के चालुक्य शाखा का अन्तिम महान् शासक था। 
➽उसने 'विक्रमादित्य' की उपाधि धारण की थी। अपने पिता सोमेश्वर प्रथम के शासन काल में वह उसका सहयोगी रहा था, और उसकी विजय यात्राओं में उसने अदभुत शौर्य प्रदर्शित किया था। 
➽विक्रमादित्य षष्ठ ने राजा बनकर पूरी आधी सदी (1076-1126) तक योग्यतापूर्वक चालुक्य साम्राज्य का शासन किया। 
➽इसमें सन्देह नहीं, कि विक्रमादित्य बहुत ही योग्य व्यक्ति था।

➽विजय यात्राएँ

➽पिता सोमेश्वर प्रथम के समान विक्रमादित्य षष्ठ ने भी दूर-दूर तक विजय यात्राएँ कीं, और कलिंग, बंग, मरु (राजस्थान), मालवा, चेर (केरल) और चोल राज्यों को परास्त किया। 
➽उसके शासन काल में चालुक्य साम्राज्य दक्षिण में कन्याकुमारी से लेकर उत्तर में बंगाल तक विस्तृत था। 
➽उसने चोल राजा वीर राजेन्द्र तथा कदम्ब शासक की सहायता से चालुक्य राज्य के दक्षिणी भाग पर अधिकार कर लिया। 
➽अपने इसी राज्यारोहण के सम्बन्ध में उसने नवीन संवत 'चालुक्य-विक्रम-संवत' का प्रचलन किया था।

➽चोल-चालुक्य संघर्ष

➽विक्रमादित्य षष्ठ को आरम्भ में अपने भाई 'जगकेशी' के विद्रोह का सामना करना पड़ा, परन्तु इसे दबाने में वह सफल रहा। 
➽उसके समय में भी चोल-चालुक्य संघर्ष चलता रहा। उसने कांची पर आक्रमण कर वीर राजेन्द्र से आंध्र प्रदेश का कुछ भाग छीन लिया। 
➽इसी के परिणामस्वरूप उसका संघर्ष चोल शासक कुलोत्तुंग प्रथम से भी हुआ।

➽विद्धानों का संरक्षक

➽विक्रमादित्य षष्ठ एक वीर विजेता के साथ-साथ विद्धानों का संरक्षक भी था। 
➽विद्या एवं विद्या-व्यवसनी ब्राह्मणों के प्रति उसे बड़ा लगाव था। 
➽'नीरुगंद' के ताम्र लेख से ज्ञात होता है कि, अपने राज्य में विद्या तथा धर्म की अभिवृद्धि के लिए उसने 500 तमिल ब्राह्मणों को अपने राज्य में बसाया तथा उनके भरण पोषण के लिए नीरुगंद नामक गांव को अग्रहार दान के रूप में दिया। 
➽1015 ई. में नर्मदा नदी के तट पर उसने 'तुला-पुरुष-दान' तथा चन्द्रदेवी नदी के तट पर दान कर्म सम्पन्न करवाया।
➽विक्रमादित्य षष्ठ के कश्मीरी राजकवि विल्हण ने 'विक्रमांकदेवचरित' लिखकर इस प्रतापी राजा के नाम को अमर कर दिया। 
➽अन्य विद्धानों में 'विज्ञानेश्वर' थे, जिन्होंने 'याज्ञवल्क्य स्मृति' पर 'मीताक्षरा' नामक टीका लिखी। 
➽'मिताक्षरा' वर्तमान समय में प्रचलित हिन्दू क़ानून का मुख्य आधार है। 

➽सोमेश्वर तृतीय  

➽सोमेश्वर तृतीय (1126 से 1138 ई.) कल्याणी के विक्रमादित्य षष्ठ का पुत्र तथा उत्तराधिकरी था। 
➽वह एक शान्तिप्रिय शासक था। 
➽उसका राज्यारोहण 1126 ई. में हुआ था। 
➽इसके उपलक्ष्य में उसने 'भूलोकमल्ल वर्ष' नामक एकनवीन वर्ष का प्रचलन किया तथा 'भूलोकमल्ल' विरुद धारण किया।
➽सोमेश्वर तृतीय ने अपने कुल की शक्ति को बढ़ाकर नेपाल तक भी आक्रमण किए।
➽उसने उत्तरी भारत में विजय यात्राएँ कर मगध और नेपाल को अपना वशवर्त्ती बनाया। अंग, बंग, कलिंग पहले ही चालुक्य साम्राज्य की अधीनता को स्वीकार कर चुके थे। 
➽मगध भी पूर्ववर्त्ती चालुक्य विजेताओं के द्वारा आक्रान्त हो चुका था।
➽सोमेश्वर प्रथम के समय से ही उत्तरी भारत पर और विशेषतया अंग, बंग तथा कलिंग पर दक्षिणापथ की सेनाओं के जो निरन्तर आक्रमण होते रहे, उन्हीं के कारण बहुत से सैनिक व उनके सरदार उन प्रदेशों में स्थिर रूप से बस गए, और उन्हीं से बंगाल में सेन वंश एवं मिथिला में नान्यदेव वंश के राज्य स्थापित हुए। इसीलिए इन्हें 'कर्णाट' कहा गया है।
➽यह एक उच्चकोटि का विद्धान एवं शिल्पशास्त्र ग्रन्थ था।
➽वह राजशास्त्र, न्याय व्यवस्था, वैद्यक, ज्योतिष, रसायन तथा पिंगल सदृश विषयों पर अनेक ग्रंथों का रचयिता बताया जाता है।
➽उसने 'मानसोल्लास' नामक ग्रंथ की रचना की, जो एक शिल्पशास्त्र ग्रन्थ है।
➽अपनी विद्धता के कारण सोमेश्वर तृतीय 'सर्वज्ञभूप' के रूप में प्रसिद्ध था।
➽किन्तु उसकी बहुमुखी प्रतिभा एवं विद्वत्ता उसकी सैन्य संगठन शक्ति में सहायक न हो सकी।
➽उसके शासन काल में अधीनस्थ सामंतों ने चालुक्य साम्राज्य की प्रभुत्ता त्यागकर स्वतंत्र शासन करना आरम्भ कर दिया, फलस्वरूप चालुक्य शक्ति का ह्रास होने लगा।

➽जगदेकमल्ल द्वितीय  

➽जगदेकमल्ल द्वितीय (1138-1151 ई.), सोमेश्वर तृतीय के बाद अगला चालुक्य राजा था।

➽तैलप तृतीय  

➽तैलप तृतीय (1151-1156 ई.) चालुक्य सम्राट जगदेकमल्ल द्वितीय की मृत्यु के बाद राजा बना था।
➽सोमेश्वर तृतीय के बाद कल्याणी के चालुक्य वंश का क्षय शुरू हो गया।
➽1138 ई. में 'सोमेश्वर की मृत्यु' हो जाने पर उसका पुत्र जगदेकमल्ल द्वितीय राजा बना।
➽जगदेकमल्ल द्वितीय के शासन काल में चालुक्य साम्राज्य की शक्ति में निर्बलता आनी प्रारम्भ हो गई।
➽अन्हिलवाड़ कुमारपाल (1143-1172 ई.) के जगदेकमल्ल के साथ अनेक युद्ध हुए, जिनमें कुमारपाल विजयी हुआ।
➽1151 ई. में जगदेकमल्ल की मृत्यु के बाद तैलप तृतीय ने कल्याणी का राजसिंहासन प्राप्त किया। 
➽उसका मंत्री व सेनापति विज्जल था, जो कलचुरी वंश का था।
➽विज्जल इतना शक्तिशाली व्यक्ति था, कि उसने राजा तैलप को अपने हाथों में कठपुतली के समान बनाकर रखा था। 
➽बहुत से सामन्त उसके हाथों में थे। 
➽उनकी सहायता से 1156 ई. के लगभग विज्जल ने तैलप को राज्यच्युत कर स्वयं कल्याणी की राजगद्दी पर अपना अधिकार कर लिया, और वासव का अपना मंत्री नियुक्त किया। 

➽सोमेश्वर चतुर्थ  

➽भारत के धार्मिक इतिहास में वासव का बहुत अधिक महत्त्व है। 
➽वह लिंगायत सम्प्रदाय का प्रवर्तक था। 
➽जिसका दक्षिणी भारत में बहुत प्रचार हुआ।
➽विज्जल स्वयं जैन था, अतः राजा और मंत्री में विरोध उत्पन्न हो गया। 
➽इसके परिणामस्वरूप वासव ने विज्जल की हत्या कर दी।
➽विज्जल के बाद उसके पुत्र सोविदेव ने राज्य प्राप्त किया, और वासव की शक्ति को अपने क़ाबू में लाने में सफलता प्राप्त की।
➽धार्मिक विरोध के कारण विज्जल और सोविदेव के समय में जो अव्यवस्था उत्पन्न हो गई थी, चालुक्य राजा तैल के पुत्र 'सोमेश्वर चतुर्थ' ने उससे लाभ उठाया और 1183 ई. में सोविदेव को परास्त कर चालुक्य कुल के गौरव को फिर से स्थापित किया।
➽पर चालुक्यों की यह शक्ति देर तक स्थिर नहीं रह सकी।
➽विज्जल और सोविदेव के समय में कल्याणी के राज्य में जो अव्यवस्था उत्पन्न हो गई थी, उसके कारण बहुत से सामन्त व अधीनस्थ राजा स्वतंत्र हो गए, और अन्य अनेक राजवंशों के प्रतापी व महत्त्वकांक्षी राजाओं ने विजय यात्राएँ कर अपनी शक्ति का उत्कर्ष शुरू कर दिया।
➽1187 ई. में भिल्लम ने चालुक्य राजा सोमेश्वर चतुर्थ को परास्त कर कल्याणी पर अधिकार कर लिया, और इस प्रकार प्रतापी चालुक्य वंश का अन्त हुआ।

➽चालुक्य शक्ति में निर्बलता

➽सोमेश्वर तृतीय के बाद कल्याणी के चालुक्य वंश का क्षय शुरू हो गया। 
➽1138 ई. में सोमेश्वर तृतीय की मृत्यु हो जाने पर उसका पुत्र जगदेकमल्ल द्वितीय राजा बना। 
➽इस राजा के शासन काल में चालुक्यों में निर्बलता आ गई। 
➽अन्हिलवाड़ा कुमारपाल (1143-1172 ई.) के जगदेकमल्ल के साथ अनेक युद्ध हुए, जिनमें कुमारपाल विजयी हुआ। 
➽1151 ई. में जगदेकमल्ल की मृत्यु के बाद तैल ने कल्याणी का राजसिंहासन प्राप्त किया। 
➽उसका मंत्री व सेनापति विज्जल था, जो कलचुरी वंश का था। 
➽विज्जल इतना शक्तिशाली व्यक्ति था, कि उसने राजा तैल को अपने हाथों में कठपुतली के समान बना रखा था। बहुत से सामन्त उसके हाथों में थे। 
➽उनकी सहायता से 1156 ई. के लगभग विज्जल ने तैल को राज्यच्युत कर स्वयं कल्याणी की राजगद्दी पर अपना अधिकार कर लिया, और वासव को अपना मंत्री नियुक्त किया।

➽कल्याणी के चालुक्य वंश का अन्त

➽भारत के धार्मिक इतिहास में 'वासव' का बहुत अधिक महत्त्व है। 
➽वह लिंगायत सम्प्रदाय का प्रवर्तक था।
➽जिसका दक्षिणी भारत में बहुत प्रचार हुआ। 
➽विज्जल स्वयं जैन था, अतः राजा और मंत्री में विरोध उत्पन्न हो गया। 
➽इसके परिणामस्वरूप वासव ने विज्जल की हत्या कर दी। 
➽विज्जल के बाद उसके पुत्र 'सोविदेव' ने राज्य प्राप्त किया, और वासव की शक्ति को अपने क़ाबू में लाने में सफलता प्राप्त की। 
➽धार्मिक विरोध के कारण विज्जल और सोविदेव के समय में जो अव्यवस्था उत्पन्न हो गई थी, 
चालुक्य राजा तैल के पुत्र सोमेश्वर चतुर्थ ने उससे लाभ उठाया, और 1183 ई. में सोविदेव को परास्त कर चालुक्य कुल के गौरव को फिर से स्थापित किया। 
➽पर चालुक्यों की यह शक्ति देर तक स्थिर नहीं रह सकी। 
➽विज्जल और सोविदेव के समय में वातापी  के राज्य में जो अव्यवस्था उत्पन्न हो गई थी, उसके कारण बहुत से सामन्त व अधीनस्थ राजा स्वतंत्र हो गए, और अन्य अनेक राजवंशों के प्रतापी व महत्त्वकांक्षी राजाओं ने विजय यात्राएँ कर अपनी शक्ति का उत्कर्ष शुरू कर दिया। 
➽इन प्रतापी राजाओं में देवगिरि के यादव राजा भिल्लम का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। 
➽1187 ई. में भिल्लम ने चालुक्य राजा सोमेश्वर चतुर्थ को परास्त कर कल्याणी पर अधिकार कर लिया, और इस प्रकार प्रतापी चालुक्य वंश का अन्त हुआ।

➽वेंगि का चालुक्य वंश

➽प्राचीन समय में चालुक्यों के अनेक राजवंशों ने दक्षिणापथ व गुजरात में शासन किया था। 
➽इनमें से अन्हिलवाड़ (गुजरात) वातापी और कल्याणी को राजधानी बनाकर शासन करने वाले चालुक्य वंश थे। 
➽पर इन तीनों के अतिरिक्त चालुक्य का एक अन्य वंश भी था, जिसकी राजधानी वेंगि थी। 
➽यह इतिहास में 'पूर्वी चालुक्य' के नाम से विख्यात है, क्योंकि इसका राज्य चालुक्यों के मुख्य राजवंश (जिसने कल्याणी को राजधानी बनाकर शासन किया) के राज्य से पूर्व में स्थित था। 
➽इनसे पृथक्त्व प्रदर्शित करने के लिए कल्याणी के राजवंश को 'पश्चिमी चालुक्य राजवंश' भी कहा जाता है। ➽इतिहास में वेंगि के पूर्वी चालुक्य वंश का बहुत अधिक महत्त्व नहीं है, क्योंकि उसके राजाओं ने न किसी बड़े साम्राज्य के निर्माण में सफलता प्राप्त की, और न दूर-दूर तक विजय यात्राएँ कीं। 
➽पर क्योंकि कुछ समय तक उसके राजाओं ने भी स्वतंत्र रूप से राज्य किया, अतः उनके सम्बन्ध में भी संक्षिप्त विवरण प्राप्त होता है।
➽जिस समय वातापी के प्रसिद्ध चालुक्य सम्राट पुलकेशी द्वितीय ने (सातवीं सदी के पूर्वार्ध में) दक्षिणापथ में अपने विशाल साम्राज्य की स्थापना की, उसने अपने छोटे भाई 'कुब्ज विष्णुवर्धन' को वेंगि का शासन करने के लिए नियुक्त किया था। 
➽'विष्णुवर्धन' की स्थिति एक प्रान्तीय शासक के समान थी, और वह पुलकेशी द्वितीय की ओर से ही कृष्णा और गोदावरी नदियों के मध्यवर्ती प्रदेश का शासन करता था। 
➽पर उसका पुत्र 'जयसिंह प्रथम' पूर्णतया स्वतंत्र हो गया था, और इस प्रकार पूर्वी चालुक्य वंश का प्रादुर्भाव हुआ। 
➽इस वंश के स्वतंत्र राज्य का प्रारम्भकाल सातवीं सदी के मध्य भाग में था।
➽जब तक वातापी में मध्य चालुक्य वंश की शक्ति क़ायम रही, वेंगि के पूर्वी चालुक्यों को अपने उत्कर्ष का अवसर नहीं मिल सका। 
➽पर जब 753 ई. के लगभग राष्टकूट दन्तिदुर्ग द्वारा वातापी के चालुक्य राज्य का अन्त कर दिया गया, तो वेंगि के राजवंश में अनेक ऐसे प्रतापी राजा हुए, जिन्होंने राष्ट्रकूटों और अन्य पड़ोसी राजाओं पर आक्रमण करके उनके साथ युद्ध किया। 
➽इनमें 'विक्रमादित्य द्वितीय' (लगभग 799-843) और 'विजयादित्य तृतीय' (843-888) के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। 
➽इन दोनों राजाओं ने राष्टकूटों के मुक़ाबले में अपने राज्य की स्वतंत्र सत्ता क़ायम रखने में सफलता प्राप्त की। 
➽इनके उत्तराधिकारी चालुक्य राजा भी अपनी स्वतंत्रता की रक्षा करने में सफल रहे।
➽दसवीं सदी के अन्तिम भाग में वेंगि को एक नयी विपत्ति का सामना करना पड़ा। 
➽जो चोलराज राजराज प्रथम (985-1014) के रूप में थी।
➽ इस समय तक दक्षिणापथ में राष्टकूटों की शक्ति का अन्त हो चुका था, और कल्याणी को अपनी राजधानी बनाकर चालुक्य एक बार फिर दक्षिणापथपति बन गए थे। 
➽राजराज प्रथम ने न केवल कल्याणी के चालुक्य राजा सत्याश्रय को परास्त किया, अपितु वेंगि के चालुक्य राजा पर भी आक्रमण किया। 
➽इस समय वेंगि के राजसिंहासन पर 'शक्तिवर्मा' विराजमान था। 
➽उसने चोल आक्रान्ता का मुक़ाबला करने के लिए बहुत प्रयत्न किया, और अनेक युद्धों में उसे सफलता भी प्राप्त हुई, पर उसके उत्तराधिकारी 'विमलादित्य' (1011-1018) ने यही उचित समझा, कि शक्तिशाली चोल सम्राट की अधीनता स्वीकार कर ली जाए।
➽राजराज प्रथम ने विमलादित्य के साथ अपनी पुत्री का विवाह कर उसे अपना सम्बन्धी व परम सहायक बना लिया। 
➽विमलादित्य के बाद उसका पुत्र 'विष्णुवर्धन' पूर्वी चालुक्य राज्य का स्वामी बना। 
➽उसका विवाह भी चोलवंश की ही एक कुमारी के साथ हुआ था। 
➽उसका पुत्र 'राजेन्द्र' था, जो 'कुलोत्तुंग' के नाम से वेंगि का राजा बना। 
➽उसका विवाह भी एक चोल राजकुमारी के साथ हुआ, और विवाहों के कारण वेंगि के चालुक्य कुल और चोलराज का सम्बन्ध बहुत घनिष्ठ हो गया।
➽चोलराजा अधिराजेन्द्र के कोई सन्तान नहीं थी।
➽ वह 1070 ई. में चोल राज्य का स्वामी बना, और उसी साल उसकी मृत्यु भी हो गई। 
➽इस दशा में वेंगि के चालुक्य राजा राजेन्द्र कुलोत्तुंग ने चोल वंश का राज्य भी प्राप्त कर लिया, क्योंकि वह चोल राजकुमारी का पुत्र था। 
➽इस प्रकार चोल राज्य और वेंगि का पूर्वी चालुक्य राज्य परस्पर मिल कर एक हो गए, और 'राजेन्द्र कुलोत्तुंग' के वंशज इन दोनों राज्यों पर दो सदी के लगभग तक शासन करते रहे। 
➽1070 के बाद वेंगि के राजवंश की अपनी कोई पृथक् सत्ता नहीं रह गयी थी।
➽कल्याणी के चालुक्य वंश का दक्षिणापथ के बड़े भाग पर उनका आधिपत्य था, और अनेक प्रतापी चालुक्य राजाओं ने दक्षिण में चोल, पांड्य और केरल तक व उत्तर में बंग, मगध और नेपाल तक विजय यात्राएँ की थीं। 
➽पर जब बारहवीं सदी के अन्तिम भाग में चालुक्यों की शक्ति क्षीण हुई, तो उनके अनेक सामन्त राजा स्वतंत्र हो गए, और अपने-अपने क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से शासन करने लगे। 
➽जिस प्रकार उत्तरी भारत में गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य के ह्रास काल में अनेक छोटे-बड़े राजपूत राज्य क़ायम हुए, वैसे ही दक्षिणी भारत में कल्याणी के चालुक्यों की शक्ति क्षीण होने पर अनेक राजाओं ने स्वतंत्र होकर अपने पृथक् राज्यों की स्थापना की।

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