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Sindhu Ghati Sabhyata in Hindi - सिंधु घाटी सभ्यता

Sindhu Ghati Sabhyata in Hind     - दोस्तों आज indgk आप सब छात्रों के लिए भारतीय इतिहास सामान्य ज्ञान से संबंधित बहुत ही महत्वपूर्ण नोट्स “Sindhu Ghati Sabhyata in Hindi” शेयर कर रहा है. जो छात्र UPSC, IAS, SSC, Civil Services, SBI PO, Banking, Railway RRB, RPF या अन्य Competitive Exams की तैयारी कर रहे है उन्हें ‘Sindhu Ghati Civilization in Hindi’ अवश्य पढना चाहिए. 

Sindhu Ghati Sabhyata in Hindi - सिंधु घाटी सभ्यता


➽भारत का इतिहास सिंधु घाटी सभ्यता से प्रारंभ होता है जिसे हम हड़प्पा सभ्यता के नाम से भी जानते हैं।
➽ यह सभ्यता लगभग 2500 ईस्वी पूर्व दक्षिण एशिया के पश्चिमी भाग मैं फैली हुई थी,जो कि वर्तमान में पाकिस्तान तथा पश्चिमी भारत के नाम से जाना जाता है।
➽सिंधु घाटी सभ्यता मिस्र,मेसोपोटामिया,भारत और चीन की चार सबसे बड़ी प्राचीन नगरीय सभ्यताओं से भी अधिक उन्नत थी।
➽1920 में, भारतीय पुरातत्त्व विभाग द्वारा किये गए सिंधु घाटी के उत्खनन से प्राप्त अवशेषों से हड़प्पा तथा मोहनजोदडो जैसे दो प्राचीन नगरों की खोज हुई।

➽भारतीय पुरातत्त्व विभाग के तत्कालीन डायरेक्टर जनरल जॉन मार्शल ने सन 1924 में सिंधु घाटी में एक नई सभ्यता की खोज की घोषणा की।
➽सिंधु घाटी सभ्यता (अंग्रेज़ी:Indus Valley Civilization) विश्व की प्राचीन नदी घाटी सभ्यताओं में से एक प्रमुख सभ्यता थी। 
➽यह हड़प्पा सभ्यता और सिंधु-सरस्वती सभ्यता के नाम से भी जानी जाती है। 
➽आज से लगभग 80 वर्ष पूर्व पाकिस्तान के 'पश्चिमी पंजाब प्रांत' के 'माण्टगोमरी ज़िले' में स्थित 'हरियाणा' के निवासियों को शायद इस बात का किंचित्मात्र भी आभास नहीं था कि वे अपने आस-पास की ज़मीन में दबी जिन ईटों का प्रयोग इतने धड़ल्ले से अपने मकानों के निर्माण में कर रहे हैं, वह कोई साधारण ईटें नहीं, बल्कि लगभग 5,000 वर्ष पुरानी और पूरी तरह विकसित सभ्यता के अवशेष हैं। 




Sindhu Ghati Sabhyata Map

sindhu ghati sabhyata map
sindhu ghati sabhyata map


➽इसका आभास उन्हें तब हुआ जब 1856 ई. में 'जॉन विलियम ब्रन्टम' ने कराची से लाहौर तक रेलवे लाइन बिछवाने हेतु ईटों की आपूर्ति के इन खण्डहरों की खुदाई प्रारम्भ करवायी। 
➽खुदाई के दौरान ही इस सभ्यता के प्रथम अवशेष प्राप्त हुए, जिसे इस सभ्यता का नाम ‘हड़प्पा सभ्यता‘ का नाम दिया गया।

➽हड़प्पा सभ्यता के महत्त्वपूर्ण स्थल-



स्थल. खोजकर्त्ता अवस्थिति महत्त्वपूर्ण खोज
1.हड़प्पा दयाराम साहनी (1921) पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में मोंटगोमरी जिले में रावी नदी के तट पर स्थित है।
  • मनुष्य के शरीर की बलुआ पत्थर की बनी मूर्तियाँ
  • अन्नागार बैलगाड़ी
2.मोहनजोदड़ो (मृतकों का टीला) राखलदास बनर्जी (1922) पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के लरकाना जिले में सिंधु नदी के तट पर स्थित है।
  • विशाल स्नानागर
  • अन्नागार
  • कांस्य की नर्तकी की मूर्ति
  • पशुपति महादेव की मुहर
  • दाड़ी वाले मनुष्य की पत्थर की मूर्ति
  • बुने हुए कपडे
3सुत्कान्गेडोर. स्टीन (1929) पाकिस्तान के दक्षिण-पश्चिमी राज्य बलूचिस्तान में दाश्त नदी के किनारे पर स्थित है।
  • हड़प्पा और बेबीलोन के बीच व्यापार का केंद्र बिंदु था।
4.चन्हुदड़ो एन .जी. मजूमदार (1931) सिंधु नदी के तट पर सिंध प्रांत में।
  • मनके बनाने की दुकानें
  •  बिल्ली का पीछा करते हुए कुत्ते के पदचिन्ह
5.आमरी एन .जी . मजूमदार (1935) सिंधु नदी के तट पर।
  • हिरन के साक्ष्य
6.कालीबंगन घोष (1953) राजस्थान में घग्गर नदी के किनारे।
  • अग्नि वेदिकाएँ
  • ऊंट की हड्डियाँ
  • लकड़ी का हल
7.लोथल आर. राव (1953) गुजरात में कैम्बे की कड़ी के नजदीक भोगवा नदी के किनारे पर स्थित।
  • मानव निर्मित बंदरगाह गोदीवाडा चावल की भूसी
  • अग्नि वेदिकाएं
  • शतरंज का खेल
8.सुरकोतदा जे.पी. जोशी (1964) गुजरात।
  • घोड़े की हड्डियाँ
  • मनके
9.बनावली आर.एस. विष्ट (1974) हरियाणा के हिसार जिले में स्थित।
  • मनके
  • जौ
  • हड़प्पा पूर्व और हड़प्पा संस्कृतियों के साक्ष्य
10.धौलावीरा आर.एस.विष्ट (1985) गुजरात में कच्छ के रण में स्थित।
  • जल निकासी प्रबंधन
  • जल कुंड



➽सिंधु सभ्यता स्थल    

➽बलूचिस्तान

➽उत्तरी बलूचिस्तान में स्थित 'क्वेटा' तथा 'जांब' की धारियों में सैंधव सभ्यता से सम्बन्धित कोई भी स्थल नहीं है। 
➽किन्तु दक्षिणी बलूचिस्तान में सैंधव सभ्यता के कई पुरास्थल स्थित हैं जिसमें अति महत्त्वपूर्ण है 'मकरान तट'। 
➽मकरान तट प्रदेश पर मिलने वाले अनेक स्थलों में से पुरातात्विक दृष्टि से केवल 4 स्थल महत्त्वपूर्ण हैं-
  1. सुत्कागेनडोर (दश्क नदी के मुहाने पर)
  2. सुत्काकोह (शादीकौर के मुहाने पर)
  3. बालाकोट (विंदार नदी के मुहाने पर)
  4. डावरकोट (सोन मियानी खाड़ी के पूर्व में विदर नदी के मुहाने पर)

उत्तर पश्चिमी सीमांत

➽यहाँ सारी सामग्री, 'गोमल घाटी' में केन्द्रित प्रतीत होती है जो अफ़ग़ानिस्तान जाने का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण मार्ग है।
➽ 'गुमला' जैसे स्थलों पर सिंधु पूर्व सभ्यता के निक्षेपों के ऊपर सिंधु सभ्यता के अवशेष प्राप्त हुए हैं।


➽सिंधु

➽इनमें कुछ स्थल प्रसिद्ध हैं जैसे - 'मोहनजोदड़ों', 'चन्हूदड़ों', 'जूडीरोजोदड़ों', (कच्छी मैदान में जो कि सीबी और जैकोबाबाद के बीच सिंधु की बाढ़ की मिट्टी का विस्तार है) 'आमरी' (जिसमें सिंधु पूर्व सभ्यता के निक्षेप के ऊपर सिंधु सभ्यता के निक्षेप मिलते हैं) 'कोटदीजी', 'अलीमुराद', 'रहमानढेरी', 'राणाधुडई' इत्यादि।

➽हड़प्पा

➽हड़प्पा 6000-2600 ईसा पूर्व की एक सुव्यवस्थित नगरीय सभ्यता थी। 
➽मोहनजोदड़ो, मेहरगढ़ और लोथल की ही शृंखला में हड़प्पा में भी पुर्रात्तव उत्खनन किया गया। 
➽यहाँ मिस्र और मैसोपोटामिया जैसी ही प्राचीन सभ्यता के अवशेष मिले है। 
➽इसकी खोज 1920 में की गई। 
➽वर्तमान में यह पाकिस्तान के पंजाब प्रान्त में स्थित है। 
➽सन् 1857 में लाहौर मुल्तान रेलमार्ग बनाने में हड़प्पा नगर की ईटों का इस्तेमाल किया गया जिससे इसे बहुत नुक़सान पहुँचा।
➽पाकिस्तान के पंजाब प्रान्त में स्थित 'माण्टगोमरी ज़िले' में रावी नदी के बायें तट पर यह पुरास्थल है।
➽हड़प्पा में ध्वंशावशेषों के विषय में सबसे पहले जानकारी 1826 ई. में 'चार्ल्स मैन्सर्न' ने दी।
➽1856 ई. में 'ब्रण्टन बन्धुओं' ने हड़प्पा के पुरातात्विक महत्त्व को स्पष्ट किया।
➽ 'जॉन मार्शल' के निर्देशन में 1921 ई. में 'दयाराम' के पुरातात्विक महत्त्व को स्पष्ट किया। 
➽जॉन मार्शल के निर्देशन में 1921 ई. में 'दयाराम साहनी' ने इस स्थल को स्पष्ट किया। 
➽जॉन मार्शल के निर्देशन में 1921 ई. में दयाराम साहनी ने इस स्थल का उत्खनन कार्य प्रारम्भ करवाया।
➽1946 में मार्टीमर ह्वीलर ने हड़प्पा के पश्चिमी दुर्ग टीले की सुरक्षा का प्राचीर का स्वरूप ज्ञात करने के लिए यहाँ उत्खनन करवाया।
➽  इसी उत्खनन के आधार पर ह्वीलर ने रक्षा प्राचीन एवं समाधि क्षेत्र के पारस्परिक सम्बन्धों को निर्धारित किया है।


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➽ यह नगर क़रीब 5 कि.मी. के क्षेत्र में बसा हुआ है।

➽ हड़प्पा से प्राप्त दो टीलों में पूर्वी टीले को 'नगर टीला' तथा पश्चिमी टीले को 'दुर्ग टीला' के नाम से सम्बोधित किया गया।
➽ हड़प्पा का दुर्ग क्षेत्र सुरक्षा- प्राचीर से घिरा हुआ था।
➽ दुर्ग का आकार समलम्ब चतुर्भुज की तरह था। दुर्ग का उत्तर से दक्षिण से लम्बाई 420 मी. तथा पूर्व से पश्चिम चौड़ाई 196 मी. है। 
➽उत्खननकर्ताओं ने दुर्ग के टीले को माउण्ट 'AB' नाम दिया है।
➽ दुर्ग का मुख्य प्रवेश द्वार उत्तर-दिशा में तथा दूसरा प्रवेश द्वार दक्षिण दिशा में था।
➽ रक्षा-प्राचीर लगभग 12 मीटर ऊंची थी जिसमें स्थान-स्थान पर तोरण अथवा बुर्ज बने हुए थे। 
➽हड़प्पा के दुर्ग के बाहर उत्तर दिशा में स्थित लगभग 6 मीटर ऊंचे टीले को ‘एफ‘ नाम दिया है गया है जिस पर अन्नागार, अनाज कूटने की वृत्ताकार चबूतरे और श्रमिक आवास के साक्ष्य मिले हैं।
➽ पडरी हड़प्पाई नगर, हड़प्पा पूर्व व विकसित हड़प्पा काल के दो सांस्कृतिक चरणों को स्पष्ट करता है।
➽यहाँ पर 6:6 की दो पंक्तियों में निर्मित कुल बारह कक्षों वाले एक अन्नागार का अवशेष प्राप्त हुआ हैं,
जिनमें प्रत्येक का आकार 50x20 मी. का है, जिनका कुल क्षेत्रफल 2,745 वर्ग मीटर से अधिक है।
➽हड़प्पा से प्रान्त अन्नागार नगरमढ़ी के बाहर रावी नदी के निकट स्थित थे। 
➽हड़प्पा के ‘एफ‘ टीले में पकी हुई ईटों से निर्मित 18 वृत्ताकार चबूतरे मिले हैं। 
➽इन चबूतरों में ईटों को खड़े रूप में जोड़ा गया है। 
➽प्रत्येक चबूतरे का व्यास 3.20 मी. है। हर चबूतरे में सम्भवतः ओखली लगाने के लिए छेद था।
➽ इन चबूतरों के छेदों में राख, जले हुए गेहूँ तथा जौं के दाने एवं भूसा के तिनके मिले है।
➽ 'मार्टीमर ह्रीलर' का अनुमान है कि इन चबूतरों का उपयोग अनाज पीसने के लिए किया जाता रहा होगा।
➽ श्रमिक आवास के रूप में विकसित 15 मकानों की दो पंक्तियां मिली हैं जिनमें उत्तरी पंक्ति में सात एवं दक्षिणी पंक्ति में 8 मकानों के अवशेष प्राप्त हुए, प्रत्येक मकान का आकार लगभग 17x7.5 मी. का है।
➽ प्रत्येक गृह में कमरे तथा आंगन होते थे।
➽ इनमें मोहनजोदाड़ो के ग्रहों की भांति कुएं नहीं मिले हैं।
➽ श्रमिक आवास के नज़दीक ही क़रीब 14 भट्टों और धातु बनाने की एक मूषा (Crucible) के अवशेष मिले हैं। 
➽इसके अतिरिक्त यहाँ से प्राप्त कुछ महत्त्वपूर्ण अवशेष- एक बर्तन पर बना मछुआरे का चित्र, शंख का बना बैल, पीतल का बना इक्का, ईटों के वृत्ताकार चबूतरे जिनका उपयोग संभवतः फ़सल को दाबने में किया जाता था, साथ ही गेहूँ तथा जौ के दानों के अवशेष भी मिले हैं।
➽हड़प्पा के सामान्य आवास क्षेत्र के दक्षिण में एक ऐसा क़ब्रिस्तान स्थित है जिसे ‘समाधि आर-37‘ नाम दिया गया है।
➽ यहाँ पर प्रारम्भ में 'माधोस्वरूप वत्स' ने उत्खनन कराया था, बाद में 1946 में ह्वीलर ने भी यहाँ पर उत्खनन कराया था।
➽ यहाँ पर खुदाई से कुल 57 शवाधान पाए गए हैं।
➽ शव प्रायः उत्तर-दक्षिण दिशा में दफ़नाए जाते थे जिनमें सिर उत्तर की ओर होता था।
➽ एक क़ब्र में लकड़ी के ताबूत में लाश को रखकर यहाँ दफनाया गया था।
➽ 12 शवाधानों से 'कांस्य दर्पण' भी पाए गए हैं। एक सुरमा लगाने की सलाई, एक से सीपी की चम्मच एवं कुछ अन्यय से पत्थर के फलक (ब्लेड) पाए गए हैं।
➽ हड़प्पा में सन् 1934 में एक अन्य समाधि मिली थी जिसे समाधि 'एच' नाम दिया गया था।
➽ इसका सम्बंध सिन्धु सभ्यता के बाद के काल से था।

➽महत्त्वपूर्ण तथ्य 

➽सिंधु घाटी सभ्यता की खुदाई में पकी हुई मिट्टी के दीपक प्राप्त हुए हैं और 3500 ईसा वर्ष पूर्व की मोहनजोदड़ो सभ्यता की खुदाई में प्राप्त भवनों में दीपकों को रखने हेतु ताख बनाए गए थे व मुख्य द्वार को प्रकाशित करने हेतु आलों की शृंखला थी।
➽मोहनजोदड़ो सभ्यता के प्राप्त अवशेषों में मिट्टी की एक मूर्ति के अनुसार उस समय भी दीपावली मनाई जाती थी।
➽ उस मूर्ति में मातृ-देवी के दोनों ओर दीप जलते दिखाई देते हैं।
➽ इससे यह सिद्ध स्वत: ही हो जाता है कि यह सभ्यता हिन्दू सभ्यता थी।
➽हड़प्पा और मोहनजोदड़ो से कपड़ों के टुकड़े के अवशेष, चांदी के एक फूलदान के ढक्कन तथा कुछ अन्य तांबें की वस्तुएं मिले हैं।
➽यहां के लोग शतरंज का खेल भी जानते थे और वे लोहे का उपयोग करते थे। 
➽इसका मतलब यह कि वे लोहे के बारे में भी जानते थे।
➽यहां से प्राप्त मुहरों को सर्वोत्तम कलाकृतियों का दर्जा प्राप्त है।
➽ हड़प्पा नगर के उत्खनन से तांबे की मुहरें प्राप्त हुई हैं।
➽ इस क्षेत्र की भाषा की लिपि चित्रात्मक थी।
➽मोहनजोदड़ो से प्राप्त पशुपति की मुहर पर हाथी, गैंडा, बाघ और बैल अंकित हैं।
➽हड़प्पा के मिट्टी के बर्तन पर सामान्यतः लाल रंग का उपयोग हुआ है।
➽मोहनजोदड़ों से प्राप्त विशाल स्नानागार में जल के रिसाव को रोकने के लिए ईंटों के ऊपर जिप्सम के गारे के ऊपर चारकोल की परत चढ़ाई गई थी, जिससे पता चलता है कि वे चारकोल के संबंध में भी जानते थे।

➽मोहनजोदड़ो

➽मोहन जोदड़ो, जिसका कि अर्थ मुर्दो का टीला है 2600 ईसा पूर्व की एक सुव्यवस्थित नगरीय सभ्यता थी।
➽हड़प्पा, मेहरगढ़ और लोथल की ही शृंखला में मोहन जोदड़ो में भी पुर्रात्तव उत्खनन किया गया।
➽यहाँ मिस्र और मैसोपोटामिया जैसी ही प्राचीन सभ्यता के अवशेष मिले है।
➽इस सभ्यता के ध्वंसावशेष पाकिस्तान के सिन्ध प्रान्त के 'लरकाना ज़िले' में सिंधु नदी के दाहिने किनारे पर प्राप्त हुए हैं। 
➽यह नगर क़रीब 5 कि.मी. के क्षेत्र में फैला हुआ है। 
➽मोहनजोदड़ों के टीलो का 1922 ई. में खोजने का श्रेय 'राखालदास बनर्जी' को प्राप्त हुआ।

➽चन्हूदड़ों

➽मोहनजोदाड़ो के दक्षिण में स्थित चन्हूदड़ों नामक स्थान पर मुहर एवं गुड़ियों के निर्माण के साथ-साथ हड्डियों से भी अनेक वस्तुओं का निर्माण होता था।
➽ इस नगर की खोज सर्वप्रथम 1931 में 'एन.गोपाल मजूमदार' ने किया तथा 1943 ई. में 'मैके' द्वारा यहाँ उत्खनन करवाया गया। 
➽सबसे निचले स्तर से 'सैंधव संस्कृति' के साक्ष्य मिलते हैं।
➽मोहनजोदड़ो से 80 मील दक्षिण मे स्थित है।
इसकी खोज 1931 में एन. जी. मजूमदार के द्वारा की गई ।
➽यहाँ प्राक हड़प्पा संस्कृति (झूकर, झागर) के अवशेष मिले है यहाँ के निवासी कुशल कारीगर थे।
➽इस सभ्यता से मनके, सीप, अस्थि तथा मुद्रा मिली यहाँ दुर्ग नहीं मिले।

➽अलंकृत हाथी, खिलौने, कुत्ते, द्वारा बिल्ली का पीछा करते पद्म चिन्ह, लिपस्टिक , वक्राकार ईटे मनके बनाने का कारखाना के अवशेष प्राप्त हुए हैं

➽कोटदीजि


➽पाकिस्तान के सिंघ प्रान्त में स्थित पूर्व हड़प्पाकालीन नगर, इसकी खोज 1935 में धुर्य ने की थी जबकि उत्खनन का कार्य फजल अहमद खान के दिशा-निर्देश में की गई।

➽अलीमुराद 


➽पाकिस्तान के सिंध प्रान्त में स्थित इस स्थल से बैल की लघु मृणमूर्तियाँ, कांसे की कुल्हाड़ी प्राप्त हुई है।

➽पश्चिमी पंजाब

➽इस क्षेत्र में बहुत ज़्यादा स्थल नहीं है।
➽ इसका कारण समझ में नहीं आता।
➽हो सकता है पंजाब की नदियों ने अपना मार्ग बदलते-बदलते कुछ स्थलों का नष्ट कर दिया हो।
➽ इसके अतिरिक्त 'डेरा इस्माइलखाना', 'जलीलपुर', 'रहमानढेरी', 'गुमला', 'चक-पुरवानस्याल' आदि महत्त्वपूर्ण पुरास्थल है।

➽बहावलपुर

➽यहाँ के स्थल सूखी हुई सरस्वती नदी के मार्ग पर स्थित हैं।
➽इस मार्ग का स्थानीय नाम का ‘हकरा‘ है ।
➽ 'घग्घर हमरा' अर्थात सरस्वती दृशद्वती नदियों की घाटियों में हड़प्पा संस्कृति के स्थलों का सर्वाधिक संकेन्द्रण (सर्वाधिक स्थल) प्राप्त हुआ है।
➽ किन्तु इस क्षेत्र में अभी तक किसी स्थल का उत्खनन नहीं हुआ है।
➽ इस स्थल का नाम 'कुडावाला थेर' है जो प्रकटतः बहुत बड़ा है।

➽राजस्थान

➽यहाँ के स्थल 'बहाबलपुर' के स्थलों के निरंतर क्रम में हैं जो प्राचीन सरस्वती नदी के सूखे हुए मार्ग पर स्थित है।
➽इस क्षेत्र में सरस्वती नदी को 'घघ्घर' कहा जाता है।
➽ कुछ प्राचीन दृषद्वती नदी के सूखे हुए मार्ग के साथ- साथ भी है जिसे अब 'चैतग नदी' कहा जाता है।
➽ इस क्षेत्र का सबसे महत्त्वपूर्ण स्थल 'कालीबंगा' है।
➽ कालीबंगा नामक पुरास्थल पर भी पश्चिमी से गढ़ी और पूर्व में नगर के दो टीले, हड़प्पा तथा मोहनजोदड़ों, की भांति विद्यमान है।
➽ राजस्थान के समस्त सिंधु सभ्यता के स्थल आधुनिक गंगानगर ज़िले में आते हैं।

➽हरियाणा

➽हरियाणा का महत्त्वपूर्ण सिंधु सभ्यता स्थल हिसार ज़िले में स्थित 'बनवाली' है।
➽इसके अतिरिक्त 'मिथातल', 'सिसवल', 'वणावली', 'राखीगढ़', 'वाड़ा तथा 'वालू' नामक स्थलों का भी उत्खनन किया जा चुका है।

➽पूर्वी पंजाब

➽इस क्षेत्र के महत्त्वपूर्ण स्थल 'रोपड़ संधोल' है।
➽हाल ही में चंडीगढ़ नगर में भी हड़प्पा संस्कृति के निक्षेप पाये गये हैं।
➽ इसके अतिरिक्त 'कोटलानिहंग ख़ान', 'चक 86 वाड़ा', 'ढेर-मजरा' आदि पुरास्थलों से सैंधव सभ्यता से सम्बद्ध पुरावशेष प्राप्त हुए है।
➽गंगा-यमुना दोआब
➽यहाँ के स्थल मेरठ ज़िले के 'आलमगीर' तक फैले हुए हैं।
➽एक अन्य स्थल सहारनपुर ज़िले में स्थित 'हुलास' तथा 'बाड़गांव' है।
➽ हुलास तथा बाड़गांव की गणना पश्वर्ती सिन्धु सभ्यता के पुरास्थलों में की जाती है।

➽जम्मू

➽इस क्षेत्र के मात्र एक स्थल का पता लगा है, जो 'अखनूर' के निकट 'भांडा' में है।
➽ यह स्थल भी सिन्धु सभ्यता के परवर्ती चरण से सम्बन्घित है।

➽मांडा

➽जम्मू कश्मीर में पीर पंजाल श्रेणी में चेनाब नदी किनारे स्थित हड़प्पा का उत्तरी नगर, इस स्थान से हड़प्पा से संबंधित त्रिस्तरीय क्रम प्राप्त हुआ हैं।

➽गुजरात

➽1947 के बाद गुजरात में सैंधव स्थलों की खोज के लिए व्यापक स्तर पर उत्खनन किया गया।
➽गुजरात के 'कच्छ', 'सौराष्ट्र' तथा गुजरात के मैदानी भागों में सैंधव सभ्यता से सम्बन्घित 22 पुरास्थल है, जिसमें से 14 कच्छ क्षेत्र में तथा शेष अन्य भागों में स्थित है।
➽ गुजरात प्रदेश में ये पाए गए प्रमुख पुरास्थलों में 'रंगपुर', 'लापेथल', 'पाडरी', 'प्रभास-पाटन', 'राझदी', 'देशलपुर', 'मेघम', 'वेतेलोद', 'भगवतराव', 'सुरकोटदा', 'नागेश्वर', 'कुन्तासी', 'शिकारपुर' तथा 'धौलावीरा' आदि है।

➽धौलावीरा

➽धौलावीरा का शाब्दिक अर्थ सफेद कुआ होता है। 
➽गुजरात में कच्छ जिले में स्थित नवीनतम सिन्धु नगर, इसका उत्खनन आर.एस बिष्ट द्वारा 1990-91 में किया गया जबकि इसकी खोज 1967-68 में जगपति जोशी ने की 
➽ नगर 3 खण्डों में विभक्त हैं। 
आवासीय नगर
दुर्गनगर और 
मध्य नगर,

➽यह सिंधू सभ्यता का एकमात्र नगर है जो तीन भागों मे विभाजित है।
➽धौलावीरा के मध्य या केन्द्र में स्थित प्राचीर युक्त क्षेत्र जिसे मध्यमा नाम दिया गया है।
➽धौलावीरा मैं जल संग्रहण के उत्तम व्यवस्था के साक्ष्य मिले हैं। 
➽एक विशाल भवन मिला है जो संभवतः स्टेडियम के रूप में उपयोग में लाया गया होगा ।
➽ एक सफेद पत्थर का स्तम्भ ।

➽धौलावीरा भारत में खोजा गया दूसरा सबसे बड़ा हड़प्पा कालीन नगर है, और सम्पूर्ण सिंधू सभ्यंता का चौथा सबसे बड़ा नगर है।

➽सुरकोटडा

➽गुजरात मे कच्छ जिले में स्थित हड़प्पा कालीन नगर की खोज 1980 ई.में जगपति जोशी के द्वारा की गई।
➽दुर्गपीली कटी मिट्टी से निर्मित चबूतरे पर बनाया गया है। 
➽प्राचीर में पत्थर का उपयोग, हड़प्पा कालीन नगरों में एकमात्र नगर है जिसमें पत्थर का उपयोग किया गया है।

➽यह एक मात्र स्थल जहाँ से घोड़े की हड्डी प्राप्त हुई है।

➽रोजडी

➽गुजरात में भादर नदी के किनारें स्थित हैं।
➽यहाँ कच्ची ईटों के बने चबुतरे व नालियों के अवशेष सहित, गोमेद पत्थर के बने बाट, मनके, ताँबे की वस्तुएँ के अवशेष मिले हैं।

➽अभिलिखित मिट्टी के बर्तनों के टुकड़े आदि।

➽रंगपुर


➽गुजरात के अहमदाबाद जिले में स्थित इसकी खोज 1931 में माधोस्वरूप  वत्स के द्वारा की गई और एस.आर. राव द्वारा 1953 में उत्खनन करवाया गया।
➽सैंधव संस्कृति के उतरावस्था के अवशेष प्राप्त हुए हैं कच्ची ईंटो का दुर्ग के साक्ष्यमातृ देवी की मूर्तियाँ, मुद्रा, मुहरो के कोई अवशेष प्राप्त नहीं हुऐ है।

➽जल निकास प्रणाली के साक्ष्य मिलते हैं। 
धान की भूसी का ढेर प्राप्त हुआ है।

➽आलमगीरपुर

➽उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में हिन्डन नदी के किनारे स्थित हड़प्पा कालीन सुदूर पूर्वी नगर इसकी खोज 1958 में की गई थी। 
➽सैंधव सभ्यता का पूर्वी छोर निर्धारित हड़प्पा संस्कृति की अंतिम अवस्था

➽यहाँ से एक भी मुहर प्राप्त नहीं हुई।

➽महाराष्ट्र

➽प्रदेश के 'दायमाबाद' नामक पुरास्थल से मिट्टी के ठीकरे प्राप्त हुए है जिन पर चिरपरिचित सैंधव लिपि में कुछ लिखा मिला है, किन्तु पर्याप्त साक्ष्य के अभाव में सैंधव सभ्यता का विस्तार महाराष्ट्र तक नहीं माना जा सकता है।
➽ताम्र मूर्तियों का एक निधान, जिसे प्रायः हडप्पा संस्कृति से सम्बद्ध किया जाता है, वह महाराष्ट्र और दायमादाबद नामक स्थान से प्राप्त हुआ है - इसमें 'रथ चलाते मनुष्य', 'सांड', 'गैंडा', और 'हाथी' की आकृति प्रमुख है।
➽यह सभी ठोस धातु की है और वजन कई किलो है, इसकी तिथि के विषय में विद्धानों में मतभेद है।

➽अफ़ग़ानिस्तान

➽हिन्दुकश के उत्तर में अफ़ग़ानिस्तान में स्थित 'मुंडीगाक' और 'सोर्तगोई' दो पुरास्थल है।
➽ मुंडीगाक का उत्खनन 'जे.एम. कैसल' द्वारा किया गया था तथा सोर्तगोई की खोज एवं उत्खनन 'हेनरी फ्रैंकफर्ट' द्वारा कराया गया था। 
➽सोर्तगोई लाजवर्द की प्राप्ति के लिए बसायी गयी व्यापारिक बस्ती थी।

➽खोज

➽इस अज्ञात सभ्यता की खोज का श्रेय 'रायबहादुर दयाराम साहनी' को जाता है। 
➽उन्होंने ही पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग के महानिदेशक 'सर जॉन मार्शल' के निर्देशन में 1921 में इस स्थान की खुदाई करवायी। 
➽लगभग एक वर्ष बाद 1922 में 'श्री राखल दास बनर्जी' के नेतृत्व में पाकिस्तान के सिंध प्रान्त के 'लरकाना' ज़िले के मोहनजोदाड़ो में स्थित एक बौद्ध स्तूप की खुदाई के समय एक और स्थान का पता चला। 
➽इस नवीनतम स्थान के प्रकाश में आने क उपरान्त यह मान लिया गया कि संभवतः यह सभ्यता सिंधु नदी की घाटी तक ही सीमित है, अतः इस सभ्यता का नाम ‘सिधु घाटी की सभ्यता‘ (Indus Valley Civilization) रखा गया। 
➽सबसे पहले 1927 में 'हड़प्पा' नामक स्थल पर उत्खनन होने के कारण 'सिन्धु सभ्यता' का नाम 'हड़प्पा सभ्यता' पड़ा। 
➽पर कालान्तर में 'पिग्गट' ने हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ों को ‘एक विस्तृत साम्राज्य की जुड़वा राजधानियां‘ बतलाया।
➽कुल 6 नगर
➽अब तक भारतीय उपमहाद्वीप में इस सभ्यता के लगभग 1000 स्थानों का पता चला है जिनमें कुछ ही परिपक्व अवस्था में प्राप्त हुए हैं। 
➽इन स्थानों के केवल 6 को ही नगर की संज्ञा दी जाती है। ये हैं -
  1. हड़प्पा
  2. मोहनजोदाड़ो
  3. चन्हूदड़ों
  4. लोथल
  5. कालीबंगा
  6. हिसार
  7. बणावली

➽हड़प्पा

➽पाकिस्तान के पंजाब प्रान्त में स्थित 'माण्टगोमरी ज़िले' में रावी नदी के बायें तट पर यह पुरास्थल है।

➽हड़प्पा में ध्वंशावशेषों के विषय में सबसे पहले जानकारी 1826 ई. में 'चार्ल्स मैन्सर्न' ने दी।
➽1856 ई. में 'ब्रण्टन बन्धुओं' ने हड़प्पा के पुरातात्विक महत्त्व को स्पष्ट किया।
➽ 'जॉन मार्शल' के निर्देशन में 1921 ई. में 'दयाराम' के पुरातात्विक महत्त्व को स्पष्ट किया। 
➽जॉन मार्शल के निर्देशन में 1921 ई. में 'दयाराम साहनी' ने इस स्थल को स्पष्ट किया। 
➽जॉन मार्शल के निर्देशन में 1921 ई. में दयाराम साहनी ने इस स्थल का उत्खनन कार्य प्रारम्भ करवाया।
➽1946 में मार्टीमर ह्वीलर ने हड़प्पा के पश्चिमी दुर्ग टीले की सुरक्षा का प्राचीर का स्वरूप ज्ञात करने के लिए यहाँ उत्खनन करवाया।
➽ इसी उत्खनन के आधार पर ह्वीलर ने रक्षा प्राचीन एवं समाधि क्षेत्र के पारस्परिक सम्बन्धों को निर्धारित किया है।
➽ यह नगर क़रीब 5 कि.मी. के क्षेत्र में बसा हुआ है।
➽ हड़प्पा से प्राप्त दो टीलों में पूर्वी टीले को 'नगर टीला' तथा पश्चिमी टीले को 'दुर्ग टीला' के नाम से सम्बोधित किया गया।
➽ हड़प्पा का दुर्ग क्षेत्र सुरक्षा- प्राचीर से घिरा हुआ था।
➽ दुर्ग का आकार समलम्ब चतुर्भुज की तरह था। दुर्ग का उत्तर से दक्षिण से लम्बाई 420 मी. तथा पूर्व से पश्चिम चौड़ाई 196 मी. है। 
➽उत्खननकर्ताओं ने दुर्ग के टीले को माउण्ट 'AB' नाम दिया है।
➽ दुर्ग का मुख्य प्रवेश द्वार उत्तर-दिशा में तथा दूसरा प्रवेश द्वार दक्षिण दिशा में था।
➽ रक्षा-प्राचीर लगभग 12 मीटर ऊंची थी जिसमें स्थान-स्थान पर तोरण अथवा बुर्ज बने हुए थे। 
➽हड़प्पा के दुर्ग के बाहर उत्तर दिशा में स्थित लगभग 6 मीटर ऊंचे टीले को ‘एफ‘ नाम दिया है गया है जिस पर अन्नागार, अनाज कूटने की वृत्ताकार चबूतरे और श्रमिक आवास के साक्ष्य मिले हैं।
➽ पडरी हड़प्पाई नगर, हड़प्पा पूर्व व विकसित हड़प्पा काल के दो सांस्कृतिक चरणों को स्पष्ट करता है।
➽यहाँ पर 6:6 की दो पंक्तियों में निर्मित कुल बारह कक्षों वाले एक अन्नागार का अवशेष प्राप्त हुआ हैं, जिनमें प्रत्येक का आकार 50x20 मी. का है, जिनका कुल क्षेत्रफल 2,745 वर्ग मीटर से अधिक है।
 ➽हड़प्पा से प्रान्त अन्नागार नगरमढ़ी के बाहर रावी नदी के निकट स्थित थे। 
➽हड़प्पा के ‘एफ‘ टीले में पकी हुई ईटों से निर्मित 18 वृत्ताकार चबूतरे मिले हैं। 
➽इन चबूतरों में ईटों को खड़े रूप में जोड़ा गया है। 
➽प्रत्येक चबूतरे का व्यास 3.20 मी. है। हर चबूतरे में सम्भवतः ओखली लगाने के लिए छेद था।
➽ इन चबूतरों के छेदों में राख, जले हुए गेहूँ तथा जौं के दाने एवं भूसा के तिनके मिले है।
➽ 'मार्टीमर ह्रीलर' का अनुमान है कि इन चबूतरों का उपयोग अनाज पीसने के लिए किया जाता रहा होगा। ➽श्रमिक आवास के रूप में विकसित 15 मकानों की दो पंक्तियां मिली हैं जिनमें उत्तरी पंक्ति में सात एवं दक्षिणी पंक्ति में 8 मकानों के अवशेष प्राप्त हुए, प्रत्येक मकान का आकार लगभग 17x7.5 मी. का है।
➽ प्रत्येक गृह में कमरे तथा आंगन होते थे।
➽ इनमें मोहनजोदाड़ो के ग्रहों की भांति कुएं नहीं मिले हैं।
➽ श्रमिक आवास के नज़दीक ही क़रीब 14 भट्टों और धातु बनाने की एक मूषा (Crucible) के अवशेष मिले हैं।
➽इसके अतिरिक्त यहाँ से प्राप्त कुछ महत्त्वपूर्ण अवशेष- एक बर्तन पर बना मछुआरे का चित्र, शंख का बना बैल, पीतल का बना इक्का, ईटों के वृत्ताकार चबूतरे जिनका उपयोग संभवतः फ़सल को दाबने में किया जाता था, साथ ही गेहूँ तथा जौ के दानों के अवशेष भी मिले हैं।
➽हड़प्पा के सामान्य आवास क्षेत्र के दक्षिण में एक ऐसा क़ब्रिस्तान स्थित है जिसे ‘समाधि आर-37‘ नाम दिया गया है।
➽ यहाँ पर प्रारम्भ में 'माधोस्वरूप वत्स' ने उत्खनन कराया था, बाद में 1946 में ह्वीलर ने भी यहाँ पर उत्खनन कराया था।
➽ यहाँ पर खुदाई से कुल 57 शवाधान पाए गए हैं।
➽ शव प्रायः उत्तर-दक्षिण दिशा में दफ़नाए जाते थे जिनमें सिर उत्तर की ओर होता था।
➽ एक क़ब्र में लकड़ी के ताबूत में लाश को रखकर यहाँ दफनाया गया था।
➽ 12 शवाधानों से 'कांस्य दर्पण' भी पाए गए हैं। एक सुरमा लगाने की सलाई, एक से सीपी की चम्मच एवं कुछ अन्यय से पत्थर के फलक (ब्लेड) पाए गए हैं।
➽ हड़प्पा में सन् 1934 में एक अन्य समाधि मिली थी जिसे समाधि 'एच' नाम दिया गया था।
➽ इसका सम्बंध सिन्धु सभ्यता के बाद के काल से था।

➽महत्त्वपूर्ण तथ्य

➽सिंधु घाटी सभ्यता की खुदाई में पकी हुई मिट्टी के दीपक प्राप्त हुए हैं और 3500 ईसा वर्ष पूर्व की मोहनजोदड़ो सभ्यता की खुदाई में प्राप्त भवनों में दीपकों को रखने हेतु ताख बनाए गए थे व मुख्य द्वार को प्रकाशित करने हेतु आलों की शृंखला थी।
➽मोहनजोदड़ो सभ्यता के प्राप्त अवशेषों में मिट्टी की एक मूर्ति के अनुसार उस समय भी दीपावली मनाई जाती थी।
➽ उस मूर्ति में मातृ-देवी के दोनों ओर दीप जलते दिखाई देते हैं।
➽ इससे यह सिद्ध स्वत: ही हो जाता है कि यह सभ्यता हिन्दू सभ्यता थी।
➽हड़प्पा और मोहनजोदड़ो से कपड़ों के टुकड़े के अवशेष, चांदी के एक फूलदान के ढक्कन तथा कुछ अन्य तांबें की वस्तुएं मिले हैं।
➽यहां के लोग शतरंज का खेल भी जानते थे और वे लोहे का उपयोग करते थे। 
➽इसका मतलब यह कि वे लोहे के बारे में भी जानते थे।
➽यहां से प्राप्त मुहरों को सर्वोत्तम कलाकृतियों का दर्जा प्राप्त है।
➽ हड़प्पा नगर के उत्खनन से तांबे की मुहरें प्राप्त हुई हैं।
➽ इस क्षेत्र की भाषा की लिपि चित्रात्मक थी।

➽मोहनजोदाड़ो

➽मुअन जो दड़ो / मोहनजोदाड़ो जिसका अर्थ 'मुर्दों का टीला है' 2600 ईसा पूर्व की एक सुव्यवस्थित नगरीय सभ्यता थी। 
➽हड़प्पा, मेहरगढ़ और लोथल की ही शृंखला में मोहनजोदाड़ो में भी पुरातत्त्व उत्खनन किया गया।
➽ यहाँ मिस्र और मेसोपोटामिया जैसी ही प्राचीन सभ्यता के अवशेष मिले है।

➽इतिहास

➽इस सभ्यता के ध्वंसावशेष पाकिस्तान के सिन्ध प्रान्त के 'लरकाना ज़िले' में सिंधु नदी के दाहिने किनारे पर प्राप्त हुए हैं।
 यह नगर क़रीब 5 किमी के क्षेत्र में फैला हुआ है।
➽ मोहनजोदाड़ो के टीलों का 1922 ई. में खोजने का श्रेय 'राखालदास बनर्जी' को प्राप्त हुआ। 
➽यहाँ पूर्व और पश्चिम (नगर के) दिशा में प्राप्त दो टीलों के अतिरिक्त सार्वजनिक स्थलों में एक 'विशाल स्नागार' एवं महत्त्वपूर्ण भवनों में एक विशाल 'अन्नागार' (जिसका आकार 150x75 मी. है) के अवशेष मिले हैं, सम्भवतः यह 'अन्नागार' मोहनजोदाड़ो के बृहद भवनों में से एक है। 
➽हड़प्पा सभ्यता के बने हुए विभिन्न आकार-प्रकार के 27 प्रकोष्ठ मिले हैं। 
➽इनके अतिरिक्त सभी भवन एवं पुरोहित आवास के ध्वंसावशेष भी सार्वजनिक स्थलों की श्रेणी में आते हैं। 
➽पुराहित आवास वृहत्स्नानागार के उत्तर-पूर्व में स्थित था।

➽दुर्ग टीला

➽मोहनजोदाड़ो के पश्चिमी भाग में स्थित दुर्ग टीले को 'स्तूप टीला' भी कहा जाता है। 
➽क्योंकि यहाँ पर कुषाण शासकों ने एक स्तूप का निर्माण करवाया था। 
➽मोहनजोदाड़ो से प्राप्त अन्य अवशेषों में, कुम्भकारों के 6 'भट्टों के अवशेष', 'सूती कपड़ा', 'हाथी का कपाल खण्ड', गले हुए 'तांबें' के ढेर, 'सीपी की बनी हुई पटरी' एवं 'कांसे की नृत्यरत नारी' की मूर्ति के अवशेष मिले हैं।
➽ 'राना थुण्डई' के निम्न स्तरीय धरातल की खुदाई से 'घोड़े के दांत' के अवशेष मिले हैं जो संभवतः सभ्यता एवं संस्कृति से अनेक शताब्दी पूर्व के प्रतीत होते हैं। 
➽मोहनजोदाड़ो नगर के 'एच आर' क्षेत्र से जो मानव प्रस्तर मूर्तियां मिले हैं, उसमें से -
➽दाढ़ी युक्त सिर विशेष उल्लेखनीय हैं।
➽मोहनजोदाड़ो के अन्तिम चरण से नगर क्षेत्र के अन्दर मकानों तथा सार्वजनिक मार्गो पर 42 कंकाल अस्त-व्यस्त दशा में पड़े हुए मिले हैं।
➽इसके अतिरिक्त मोहनजोदाड़ो से लगभग 1398 मुहरें (मुद्राएँ) प्राप्त हुई हैं जो कुल लेखन सामग्री का 56.67 प्रतिशत अंश है।
➽पत्थर के बने मूर्तियों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण शैलखड़ी से बना 19 सेमी. लम्बा 'पुरोहित' का धड़ है।
➽चूना पत्थर का बना एक पुरुष का सिर (14 सेमी.),
➽शैलखड़ी से बनी एक मूर्ति विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
➽इसके अतिरिक्त अन्य अवशेषो में- सूती व ऊनी कपड़े का साक्ष्य, 'प्रोटो-आस्ट्रोलायड' या 'काकेशियन' जाति के तीन सिर मिले हैं। 
➽कुबड़वाले बैल की आकृति युक्त मुहरे, बर्तन पकाने के छः भट्टे, एक बर्तन पर नाव का बना चित्र था, जालीदार अलंकरण युक्त मिट्टी का बर्त, गीली मिट्टी पर कपड़े का साक्ष्य, पशुपति शिव की मूर्ति, ध्यान की आकृति वाली मुद्रा उल्लेखनीय हैं।
➽मोहनजोदाड़ो की एक मुद्रा पर एक आकृति है जिसमें आधा भाग 'मानव' का है आधा भाग 'बाघ' का है। 
➽एक सिलबट्टा तथा मिट्टी का तराजू भी मिला है।
➽मोहनजोदाड़ो से प्राप्त पशुपति की मुहर पर बैल का चित्र अंकित नहीं है।
➽मोहनजोदाड़ो से अभी तक समाधि क्षेत्र (अगर कोई था) के विषय में जानकारी नहीं है।
➽मोहनजोदाड़ो के नगर के अन्दर शव विसर्जन के दो प्रकार के साक्ष्य मिले हैं-
  1. आंशिक शवाधान और
  2. पूर्ण समाधीकरण (दफ़नाना)।

➽बृहत्स्नानागार, मुअन जो दड़ो

➽इस सभ्यता का सर्वाधिक उल्लेखनीय स्मारक बृहत्स्नानागार है।
➽ इसका विस्तार पूर्व से पश्चिम की ओर 32.9 मीटर तथा उत्तर से दक्षिण की ओर 54.86 मीटर है। 
➽इसके मध्य में स्थित स्नानकुण्ड 11.89 मीटर लम्बा, 7.01 मीटर चौड़ा एवं 2.44 मीटर गहरा है।
➽इस जलकुंड के अन्दर प्रवेश करने के लिए दक्षिणी और उत्तरी सिरों पर 2.43 मीटर चौड़ी सीढ़ियां बनाई गई थी। 
➽फर्श पक्की ईटों का बना हुआ था। 
➽स्नानागार के फर्श की ढाल दक्षिण से पश्चिम की ओर है। 
➽कुण्ड के चारों ओर बरामदे एवं इनके पीछे अनेक छोटे-छोटे कमरे निर्मित थे। 
➽कमरे संभवतः दुमंजिले थे, क्योंकि ऊपर जाने के लिए सीढ़ियां भी मिली हैं।
➽ 'मैके' महोदय का विचार था कि इन कमरों में पुरोहित रहते थे। 
➽कुण्ड के पूर्व में स्थित एक कमरे से ईटों की दोहरी पंक्ति से बने एक कूप का उल्लेख मिला है जो सम्भवतः स्नानागार हेतु जल की आपूर्ति करता था।
➽ 'मैके' ने इस 'बृहतस्नानागार का निर्माण धार्मिक अवसरों पर जनता के स्नान हेतु किया गया' बताया।
➽ 'मार्शल' ने इस निर्माण को तत्कालीन विश्व का एक 'आश्चर्यजनक निर्माण' बताया।

 ➽अन्नागार

➽स्नानागार के पश्चिम में स्थित अन्नागार सम्भवतः मोहनजोदड़ों की सबसे बड़ी इमारत थी। 
➽ यह सम्पूर्ण हड़प्पा संस्कृति माला में निर्मित पकी ईटों की विशालतम संरचना है।
➽ अन्नागार 45.72 मीटर लम्बा एवं 22.86 मीटर चौड़ा है। 
➽ इसमें हवा के संचरण की भी व्यवस्था थी।
➽ इसका मुख्य प्रवेश द्वार नदी की तरफ था, जिससे अनाज को लाकर रखने में सुविधा होती होगी।
➽ 'ह्वीलर' ने इसे अन्नागार की संज्ञा दी। 
➽ कुछ इतिहासकारों ने इसे 'राजकीय भण्डार' कहा।

➽सभा भवन

➽दुर्ग के दक्षिण में 27.43 मीटर वर्गाकार का एक विशाल सभा भवन के ध्वंसावशेष मिले है जिसकी छतें 20 स्तम्भों पर रूकी हैं।
➽सम्भवतः धार्मिक सभाओं हेतु इसका उपयोग किया जाता था।
➽ 'मार्शल' ने इसकी तुलना 'बौद्ध गुफा मंदिर' से की।
➽ 'मैके' ने इसका उपयोग 'बाज़ार' के लिए बतालाया ।
➽भारतीय इतिहासकार 'दीक्षित' ने इसका प्रयोग धर्म चर्चा के लिए बतलाया।
➽ स्नानागार के उत्तर-पूर्व में से 70.01x23.77 मीटर आकार एक विशाल भवन का अवशेष मिला है 
➽ जिसमें 10 मीटर वर्गाकार का एक आंगन एवं अनेक कमरे निर्मित हैं।
➽ यह भवन सम्भवतः 'पुरोहित आवास' एवं अन्य महत्त्वपूर्ण अधिकारियों का निवास स्थान था।
➽ 'मैके' ने इसे 'पुरोहित' जैसे विशिष्ट लोगों के निवास हेतु निर्मित बताया है।

➽चन्हूदड़ों  

➽मोहनजोदाड़ो के दक्षिण में स्थित चन्हूदड़ों नामक स्थान पर मुहर एवं गुड़ियों के निर्माण के साथ-साथ हड्डियों से भी अनेक वस्तुओं का निर्माण होता था। 
➽इस नगर की खोज सर्वप्रथम 1931 में 'एन.गोपाल मजूमदार' ने किया तथा 1943 ई. में 'मैके' द्वारा यहाँ उत्खनन करवाया गया। 
➽सबसे निचले स्तर से सैंधव संस्कृति के साक्ष्य मिलते हैं। 
➽यहाँ पर गुरिया निर्माण हेतु एक कारखाने का अवशेष मिला है। 
➽यहाँ पर सैन्धवकालीन संस्कृति के अतिरिक्त 'प्राक् हड़प्पा संस्कृति', 'झूकर संस्कृति' एवं 'झांगर संस्कृति' के भी अवशेष मिले हैं।
➽चन्हूदड़ों से किलेबन्दी के साक्ष्य नहीं मिले है।
➽यहाँ से प्राप्त अन्य अवशेषों में अलंकृत हाथी एवं कुत्ते द्वारा बिल्ली का पीछा करते हुए पदचिह्न प्राप्त हुए हैं। 
➽सौन्दर्य प्रसाधनों में प्रयुक्त लिपिस्टिक के अवशेष भी यहाँ से मिले हैं। 
➽तांबे और कांसे के औज़ार और सांचों के भण्डार मिले हैं जिससे यह स्पष्ट होता कि मनके बनाने, हड्डियों की वस्तुएं, मुद्राएं बनाने आदि की दस्तकारियाँ यहाँ प्रचलित थी। 
➽वस्तुए निर्मित व अर्द्धनिर्मित दोनों रूप में पाई गईं जिससे यह आभास होता था कि यहाँ पर मुख्यतः दस्तकार और कारीगर लोग रहते थे।
➽वस्तुंए जिस प्रकार चारों और फैली पड़ी थी, उससे यहाँ के निवासियों के मकान छोड़कर सहसा भागने के साक्ष्य मिलते हैं। 
➽इसके अतिरिक्त चन्हूदड़ों से जला हुआ एक कपाल मिला है। 
➽चार पहियों वाली गाड़ी भी मिली है। 
➽चन्हूदड़ों की एक मिट्टी की मुद्रा पर तीन घड़ियालों तथा दो मछलियों का अंकन मिला है। 
➽यहाँ से एक वर्गाकार मुद्रा की छाप पर दो नग्न नारियो, जो हाथ में एक-एक ध्वज पकड़े है तथा ध्वजों के बीच से पीपल की पंक्तियां निकल रही हैं।
➽ यहाँ से मिली एक ईंट पर कुत्ते और बिल्ली के पंजों के निशान मिले हैं।
➽ साथ ही मिट्टी के मोर की एक आकृति भी मिली है।
➽चन्हूदड़ों एक मात्र पुरास्थल है जहां से वक्रकार ईटें मिली हैं।
➽चन्हूदड़ों में किसी दुर्ग का अस्तित्व नहीं मिला है।


➽लोथल  

➽लोथल बस्ती और नगर का प्रसिद्ध जल संसाधन तंत्र, परिकल्पित चित्र
➽गुजरात में अहमदाबाद के पास भौगवा नदी के किनारे स्थित हड़प्पाकालीन औद्योगिक, बंदरगाह नगर इसकी खोज 1957 ई में रंगनाथ राव  द्वारा की गई।
➽खुदाई 1954-55 ई. में 'रंगनाथ राव' के नेतृत्व में की गई।
➽इस स्थल से समकालीन सभ्यता के पांच स्तर पाए गए हैं।
➽यहाँ पर दो भिन्न-भिन्न टीले नहीं मिले हैं, बल्कि पूरी बस्ती एक ही दीवार से घिरी थी। 
➽यह छः खण्डों में विभक्त था।
➽लोथल बंदरगाहि से पश्चिमी एशिया, मेसापोटामिया, फारस से समुद्री मार्ग के द्वारा व्यापार होता था । ➽बंदरगाह का आकार 214x36x3.30 मी है।
➽यह एक औद्योगिक नगर था। 
➽जहाँ आवासीय नगर और दुर्ग नगर एक ही दीवार से घिरे है।
➽मृदभाण्ड, मुहरें बाट माप और उपकरण फारस की एक मुहर जो फारस के साथ व्यापारीक सम्बन्ध की और संकेत करती है।
➽मकानों के दरवाजें मुख्य सड़क पर न खुलकर गली की तरफ खुलते थे।
➽चावल, बाजरा के अवशेष, तीन युगल समाधियाँ, घोड़े की मिट्टी की मूर्ति आदि पुरातात्विक अवशेष प्राप्त हुए है ।

➽सर्वाधिक प्रसिद्ध उपलब्धि - हड़प्पा कालीन बंदरगाह।

➽नगर दुर्ग

➽लोथल का ऊपरी नगर था नगर दुर्ग विषय चतुर्भुजाकार था जो पूर्व से पश्चिम 117 मी. और उत्तर से दक्षिण की ओर 136 मी. तक फैला हुआ था।

➽बाज़ार और औद्योगिक क्षेत्र

➽लोथल नगर के उत्तर में एक बाज़ार और दक्षिण में एक औद्योगिक क्षेत्र था। 
➽ मनके बनाने वालों, तांबे तथा सोने का काम करने वाले शिल्पियों की उद्योगशालाएं भी प्रकाश में आई हैं
➽ यहाँ से एक घर के सोने के दाने, सेलखड़ी की चार मुहरें, सींप एवं तांबे की बनी चूड़ियों और बहुत ढंग से रंगा हुआ एक मिट्टी का जार मिला है। 
➽लोथल से शंख के कार्य करने वाले दस्तकारों और ताम्रकर्मियों के कारखाने भी मिले हैं। 
➽लोथल नगर में जल पुनर्शोधित कर काम में लाया जाता था एक बूंद जल व्यर्थ नहीं जाता था
नगर दुर्ग के पश्चिम की ओर विभिन्न आकार के 11 कमरें बने थे, जिनका प्रयोग मनके या दाना बनाने वाले फैक्ट्री के रूप में किया जाता था। 
➽लोथल नगर क्षेत्र के बाहरी उत्तरी-पश्चिमी किनारे पर समाधि क्षेत्र का, जहां से बीस समाधियां मिली हैं। 
➽यहाँ की सर्वाधिक प्रसिद्व उपलब्धि हड़प्पाकालीन बन्दरगाह के अतिरिक्त विशिष्ट मृदभांड, उपकरण, मुहरें, बांट तथा माप एवं पाषाण उपकरण है। 
➽यहाँ तीन युग्मित समाधि के भी उदाहरण मिले हैं। 
➽स्त्री-पुरुष शवाधान के साक्ष्य भी लोथल से ही मिले है। 
➽लोथल की अधिकांश क़ब्रों में कंकाल के सिर उत्तर की ओर और पैर दक्षिण की ओर था। 
➽केवल अपवाद स्वरूप एक कंकाल का दिशा पूर्व-पश्चिम की ओर मिला है।

➽बन्दरगाह अथवा गोदी बाड़ा(Dock Yard)

➽बन्दरगाह लोथल की महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों में से है। 
➽इस बन्दरगाह पर मिस्र तथा मेसोपोटामिया से जहाज़ आते जाते थे। 
➽इसका औसत आकार 214x36 मीटर एवं गहराई 3.3 मीटर है।
➽इसके उत्तर में 12 मीटर चौड़ा एक प्रवेश द्वार निर्मित था। 
➽जिससे होकर जहाज़ आते-जाते थे और दक्षिण दीवार में अतिरिक्त जल के लिए निकास द्वार था।

➽लोथल के पुरातत्त्व स्थल

➽लोथल में गढ़ी और नगर दोनों एक ही रक्षा प्राचीर से घिरे हैं।
➽अन्य अवशेषों में धान (चावल), फ़ारस की मुहरों एवं घोड़ों की लघु मृण्मूर्तियों के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
➽इसके अतिरिक्त अन्य अवशेषों में लोथल से प्राप्त एक मृदभांड पर एक विशेष चित्र उकेरा गया है जिस पर एक कौआ तथा एक लोमड़ी उत्कीर्ण है।
➽ इससे इसका साम्य पंचतंत्र की कथा चालाक लोमड़ी से किया गया है।
➽यहाँ से उत्तर अवस्था की एक अग्निवेदी मिली है। 
➽नाव के आकार की दो मुहरें तथा लकड़ी का अन्नागार मिला है। 
➽अन्न पीसने की चक्की, हाथी दांत तथा पीस का पैमाना मिला है। 
➽यहाँ से एक छोटा सा दिशा मापक यंत्र भी मिला है। 
➽तांबे का पक्षी, बैल, खरगोश व कुत्ते की आकृतियां मिली है, जिसमें तांबे का कुत्ता उल्लेखनीय है।
➽यहाँ बटन के आकार की एक मुद्रा मिली है। 
➽लोथल से 'मोसोपोटामिया' मूल की तीन बेलनाकार मुहरे मिली है। 
➽आटा पीसने के दो पाट मिले है जो पूरे सिन्धु का एक मात्र उदाहरण है।
➽उत्खननों से लोथल की जो नगर-योजना और अन्य भौतिक वस्तुए प्रकाश में आई है उनसे लोथल एक लघु हड़प्पा या मोहनजोदाड़ो नगर प्रतीत होता है। 
➽सम्भवतः समुद्र के तट पर स्थित सिंधु-सभ्यता का यह स्थल पश्चिम एशिया के साथ व्यापार के दृष्टिकोण से सर्वात्तम स्थल था।

➽कालीबंगा

➽कालीबंगा (कालेरंग की चूडियाँ)
➽राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में घग्घर नदी के किनारे स्थित राजस्थान में एक मात्र सिंधू कालीन नगर
इसकी खोज 1952-53 में अमलानंद घोष के द्वारा की गयी और 1961-1969 की अवधि में बी.बी लाल एवं बी.के थापर के द्वारा किया गया कालीबंगा हड़प्पा पूर्व और परिपक्क नगर हैं
➽यहाँ पर प्राक् हड़प्पा एवं हड़प्पाकालीन संस्कृति के अवशेष मिले हैं।
➽यह प्राचीन समय में चूडियों के लिए प्रसिद्ध था। ये चूडियाँ पत्‍थरों की बनी होती थी।
➽इस स्थान से पूर्व हड़प्पाकालीन जूते हुए खेत के अवशेष मिले है। 
➽इस नगर से कोई पाँच स्तर प्राप्त हुए है।
➽अग्नि वेदियों से युक्त दो चबूतरे मिले, युगल सवाधान, मकानों में कच्ची ईटो का प्रयोग, मोहनजोदड़ो व हड़प्पा के समान नगर योजना, हड़प्पाई युक्त शेलखड़ी की मुहरें। 
➽अलंकृत इंटो के अवशेष घरों में निजी कुऐ जल निकास प्रणाली के साक्ष्य  मिले है।

➽बेलनाकार मुहर ऐसी मुहर मेसोपोटामिया में भी प्रचलित थी. सेलखड़ी की एक मुद्रा, सेकड़ों शवाधि स्थान, शवों को अंडाकार गड्ढों में दफनाया जाता था। 
➽और मानवीय शवधान के नीचे एक कुत्ते का शवाधान का साक्ष्य।

➽सिन्धु-पूर्व सभ्यता

➽हड़प्पा एवं मोहनजोदाड़ो की भांति यहाँ पर सुरक्षा दीवार से घिरे दो टीले पाए गए हैं। 
➽कुछ विद्धानों का मानना है कि यह सैंधव सभ्यता की तीसरी राजधानी रही होगी। 
➽पूर्वी टीले की सभ्यता प्राक्-हड़प्पाकालीन थी। 
➽कालीबंगा में सिन्धु-पूर्व सभ्यता की यह बस्ती कच्ची ईंटों की किलेबन्दी से घिरी थी। 
➽किलेबन्दी के उत्तरी भाग में प्रवेश मार्ग था। 
➽जिससे सरस्वती नदी तक पहुँच सकते थे। 
➽मिट्टी के खिलौनों, पहियों तथा मवेशियों की हड्डियाँ के अंवेषण से बैलगाड़ी के अस्तित्व का अप्रत्यक्ष साक्ष्य प्राप्त होता है।

➽साक्ष्य

➽कालीबंगा के दुर्ग टीले के दक्षिण भाग में मिट्टी और कच्चे ईटों के बने हुए पाँच चबूतरे मिले हैं, जिसके शिखर पर हवन कुण्डों के होने के साक्ष्य मिले हैं।

➽दुर्ग

➽अन्य हड़प्पा कालीन नगरों की भांति कालीबंगा दो भागों नगर दुर्ग (या गढ़ी) और नीचे दुर्ग में विभाजित था। 
➽नगर दुर्ग समनान्तर चतुर्भुजाकार था। 
➽यहाँ पर भवनों के अवशेष से स्पष्ट होता है कि यहाँ भवन कच्ची ईटों के बने थे।

➽खेती

➽कालीबंगा में 'प्राक् सैंधव संस्कृति' की सबसे महत्त्वपूर्ण उपलब्धि एक जुते हुए खेत का साक्ष्य है जिसके कुंडों के बीच का फासला पूर्व में पश्चिम की ओर 30 से.मी. है और उत्तर से दक्षिण 1.10 मीटर है। 
➽कम दूरी के खांचों में चना एवं अधिक दूरी के खाचों में सरसों बोई जाती थी।

➽लघु पाषाण उपकरण

➽यहाँ पर लघु पाषाण उपकरण, मणिक्य एवं मिट्टी के मनके, शंख, कांच एवं मिट्टी की चूड़ियां, खिलौना गाड़ी के पहिए, सांड की खण्डित मृण्मूर्ति, सिलबट्टे आदि पुरावशेष मिले हैं। 
➽यहाँ से प्राप्त शैलखड़ी की मुहरें (सीलें) और मिट्टी की छोटी मुहरे (सीले) महत्त्वपूर्ण अभिलिखित वस्तुएं थी।
➽ मिट्टी की मुहरों पर सरकण्डे के छाप या निशान से यह लगता है कि इनका प्रयोग पैकिंग के लिए किया जाता रहा होगा।

➽प्राप्त मुहरें व ईटें

➽एक सील पर किसी अराध्य देव की आकृति है। 
➽यहाँ से प्राप्त मुहरें 'मेसोपोटामियाई' मुहरों के समकक्ष थी। 
➽कालीबंगा की प्राक्-सैंधव बस्तियों में प्रयुक्त होने वाली कच्ची ईटें 30x20x10 से.मी. आकार की होती थी। 
➽यहाँ से मिले मकानों के अवशेषों से पता चलता है कि सभी मकान कच्ची ईटों से बनाये गये थे, पर नाली और कुओं में पक्की ईटों का प्रयोग किया गया था। 
➽यहाँ पर कुछ ईटें अलंकृत पायी गयी हैं।
➽ कालीबंगा का एक फर्श पूरे हड़प्पा का एक मात्र उदाहरण है जहाँ अलंकृत ईटों का प्रयोग किया गया है। 
➽इस पर प्रतिच्छेदी वृत का अलंकरण हैं।

➽प्राप्त क़ब्रिस्तान

➽कालीबंगा के दक्षिण-पश्चिम में क़ब्रिस्तान स्थित था। 
➽यहाँ से शव विसर्जन के 37 उदाहरण मिले हैं। 
➽यहाँ अन्त्येष्टि संस्कार की तीन विधियां प्रचलित थी -
  1. पूर्व समाधीकरण
  2. आंशिक समाधिकरण
  3. दाह संस्कार
➽यहाँ पर बच्चे की खोपड़ी मिले है जिसमें 6 छेद हैं, इसे 'जल कपाली' या 'मस्तिष्क शोध' की बीमारी का पता चलता है। 
➽यहाँ से एक कंकाल मिला है जिसके बाएं घुटने पर किसी धारदार कुल्हाड़ी से काटने का निशान है।

➽भूकम्प के साक्ष्य

➽यहाँ से भूकम्प के प्राचीनतम साक्ष्य के प्रमाण मिलते हैं। 
➽सम्भवतः घग्घर नदी के सूख जाने से कालीबंगा का विनाश हो गया।

➽पहला टीला

➽इस सिन्धु-पूर्व सभ्यता मैं सामान्यता मकान में एक आँगन होता था और उसके किनारे पर कुछ कमरे बने होते थे आँगन में खाना पकाने का साक्ष्य भी प्राप्त होता है, क्योंकि वहाँ भूमि के ऊपर और नीचे दोनों प्रकार के तन्दूर मिले हैं। 
➽हल के प्रयोग का साक्ष्य मिला है, क्योंकि इस स्तर पर हराई के निशान पाये गये हैं।
➽ हल चलाने के ढंग से संकेत मिलता है कि एक ओर के खाँचे पूर्व-पश्चिम की दिशा में बनाये जाते थे और दूसरी ओर के उत्तर-दक्षिण दिशा में।
➽ इस युग में पत्थर और ताँबे दोनों प्रकार के उपकरण प्रचलित थे परंतु पत्थर के उपकरणों का प्रयोग अधिक होता था।
➽ यहाँ से दैनिक जीवन प्रयुक्त होने वाली वस्तुएँ प्राप्त हुई हैं। 
➽ऐसा प्रतीत होता है कि कालीबंगा के इस चरण का जीवन 3000 ई.पू. के आस-पास रहा होगा।

➽दूसरा टीला

➽दूसरे बड़े टीले से जो वस्तुएँ मिली हैं, वे हड़प्पा सभ्यता के समानुरुप हैं। 
➽कालीबंगा के इस टीले में कुछ अग्नि कुण्ड भी मिले हैं। 
➽कालीबंगा से मिट्टी के बर्तनों के कुछ ऐसे टुकड़े मिले हैं, जिनसे यह निश्चय होता है कि सिन्धु सभ्यता की लिपि दाहिनी ओर से बायीं ओर लिखी जाती थी। 
➽कालीबंगा में मोहनजोदड़ो जैसी उच्च-स्तर की जल निकास व्यवस्था का आभास नहीं होता है। 
➽भवनों का निर्माण कच्ची ईंटों से किया जाता था, किंतु नालियों, कुओं तथा स्नानागारों में पकाई ईंटों प्रयुक्त की गई हैं।

➽बणावली (हरियाणा)  

➽बणावली हरियाणा के हिसार ज़िले में स्थित यहाँ से दो सांस्कृतिक अवस्थाओं के अवषेश मिले हैं।
➽हड़प्पा पूर्व एवं हड़प्पाकालीन इस स्थल की खुदाई 1973-74 ई. में 'रवीन्द्र सिंह विष्ट' के नेतृत्व में की गयी।
➽यहाँ से संस्कृति के तीन स्तर प्रकाश में आए हैं।-
  1. प्राक् सैंधव
  2. विकसित सैंधव
  3. उत्तर सैंधव
➽यहाँ दुर्ग तथा निचला नगर अलग-अलग न होकर एक ही प्राचीर से घिरे थे।
➽एक मकान से धावन पात्र के साक्ष्य मिले हैं जो किसी धनी सौदागार के आवास की ओर संकेत करता है।
➽एक दूसरे बड़े मकान से सोने, लजावर्द, कार्नेनियन के मनके, छोटे बटखरे मिले हैं, जिससे यह ज्ञात होता है कि यह किसी जौहरी का मक़ान रहा होगा।
➽इसके अतिरिक्त मिट्टी के बर्तन, गोलियाँ, मनके, तांबे के बाण्राग, हल की आकृति के खिलौने आदि मिले हैं।
➽बनवाली में जल निकास प्रणाली का अभाव दिखाई देता है।
➽बणावली की नगर योजना- शतरंज के बिसात या जाल के आकार की बनायी गयी थी।
➽सड़कें न तो सीधी मिलती थी न तो एक दूसरे को समकोण पर काटती थी।


➽सिंधु घाटी सभ्यता के चरण

➽सिंधु घाटी सभ्यता के तीन चरण हैं-

  1. प्रारंभिक हड़प्पाई सभ्यता (3300ई.पू.-2600ई.पू. तक) 
  2. परिपक्व हड़प्पाई सभ्यता (2600ई.पू-1900ई.पू. तक) 
  3. उत्तर हड़प्पाई सभ्यता (1900ई.पु.-1300ई.पू. तक)

➽प्रारंभिक हड़प्पाई चरण ‘हाकरा चरण’ से संबंधित है, जिसे घग्गर- हाकरा नदी घाटी में चिह्नित किया गया है।

➽हड़प्पाई लिपि का प्रथम उदाहरण लगभग 3000 ई.पू के समय का मिलता है।

➽इस चरण की विशेषताएं एक केंद्रीय इकाई का होना तथा बढते हुए नगरीय गुण थे।

➽व्यापार क्षेत्र विकसित हो चुका था और खेती के साक्ष्य भी मिले हैं। 

➽उस समय मटर, तिल, खजूर , रुई आदि की खेती होती थी।

➽कोटदीजी नामक स्थान परिपक्व हड़प्पाई सभ्यता के चरण को प्रदर्शित करता है।

➽2600 ई.पू. तक सिंधु घाटी सभ्यता अपनी परिपक्व अवस्था में प्रवेश कर चुकी थी।

➽परिपक्व हड़प्पाई सभ्यता के आने तक प्रारंभिक हड़प्पाई सभ्यता बड़े- बड़े नगरीय केंद्रों में परिवर्तित हो चुकी थी। 

➽जैसे- हड़प्पा और मोहनजोदड़ो वर्तमान पाकिस्तान में तथा लोथल जो कि वर्तमान में भारत के गुजरात राज्य में स्थित है।

➽सिंधु घाटी सभ्यता के क्रमिक पतन का आरंभ 1800 ई.पू. से माना जाता है,1700 ई.पू. तक आते-आते हड़प्पा सभ्यता के कई शहर समाप्त हो चुके थे ।

➽परंतु प्राचीन सिंधु घाटी सभ्यता के बाद की संस्कृतियों में भी इसके तत्व देखे जा सकते हैं।

➽कुछ पुरातात्त्विक आँकड़ों के अनुसार उत्तर हड़प्पा काल का अंतिम समय 1000 ई.पू. - 900 ई. पू. तक बताया गया है।


Sindhu Ghati Sabhyata ki Lipi-सिन्धु घाटी  सभ्यता की लिपि


➽सिन्धु घाटी की सभ्यता से संबंधित छोटे-छोटे संकेतों के समूह को सिन्धु लिपि कहते हैं। 

➽इसे सिन्धु-सरस्वती लिपि और हड़प्पा लिपि भी कहते हैं।

➽हड़प्पा लिपि (सिन्धु लिपि) का सर्वाधिक पुराना नमूना 1853 ई. में मिला था पर स्पष्टतः यह लिपि 1923 तक प्रकाश में आई। 

➽सिंधु लिपि में लगभग 64 मूल चिह्न एवं 205 से 400 तक अक्षर हैं जो सेलखड़ी की आयताकार मुहरों, तांबे की गुटिकाओं आदि पर मिलते हैं। 
➽यह लिपि चित्रात्मक थी। 
➽यह लिपि अभी तक गढ़ी नहीं जा सकी है। 
➽इस लिपि में प्राप्त सबसे बड़े लेख में क़रीब 17 चिह्न हैं।
➽कालीबंगा के उत्खनन से प्राप्त मिट्टी के ठीकरों पर उत्कीर्ण चिह्न अपने पार्श्ववर्ती दाहिने चिह्न को काटते हैं। 
➽इसी आधार पर 'ब्रजवासी लाल' ने यह निष्कर्ष निकाला है - 'सैंधव लिपि दाहिनी ओर से बायीं ओर को लिखी जाती थी।' 
➽अभी हाल में 'के.एन. वर्मा' एवं 'प्रो. एस.आर. राव' ने इस लिपि के कुछ चिह्नों को पढ़ने की बात कही है
➽सिन्धु लिपि के बारे में भी पुरालिपिविदों ने नाना प्रकार की कल्पनाएँ प्रस्तुत की हैं।
➽ सबसे पहले 1925 में एल.ए. वाडेल ने इस लिपि को पढ़ने का प्रयास किया था। 
➽उनकी मान्यता थी कि सुमेरी लोग तथा वैदिक आर्य एक ही वंश के थे। 
➽उन्होंने सिन्धु लिपि को सुमेरी लेखों के आधार पर पढ़ने का प्रयास किया और इस लिपि में कुछ वैदिक देवताओं को भी खोज निकाला। 
➽वाडेल का अनुकरण करते हुए डा. प्राणनाथ ने सिन्धु संस्कृति को आर्य संस्कृति तो माना, परन्तु उसकी भाषा को उन्होंने आद्य-संस्कृत या आद्य-प्राकृत का नाम दिया। 
➽उन्होंने काफ़ी बाद की ब्राह्मी लिपि के ध्वनिमानों को सिन्धु लिपि के संकेतों पर लागू करने का प्रयत्न किया। 
➽डा. प्राणनाथ का यह भी सुझाव था कि तांत्रिक प्रतीकों के आधार पर सिन्धु लिपि के संकेतों का अध्ययन किया जाना चाहिए।
➽ इस सुझाव का अनुकरण करते हुए शंकरानंद तथा बेनी माधव बरुआ ने सिन्धु लिपि को पढ़ने का यत्न किया।
➽ इन दोनों सज्जनों ने इस लिपि को वर्णमालात्मक ही माना। 
➽मुम्बई के सेंट जेवियर्स कॉलेज के भारत-पुराविद फ़ादर हेरास ने कल्पना की कि सिन्धु सभ्यता के लोग द्रविड़ जाति के थे, इसीलिए उनकी भाषा भी द्रविड़ परिवार की-प्राक-तमिल-होनी चाहिए।
➽ प्रसिद्ध मिस्र-पुराविद फ़्लिंडर्स पेट्री ने मिस्री लिपि के साम्य के आधार पर सिन्धु लिपि में केवल भावचित्रों की ही कल्पना की। 
➽पेट्री का मत था कि सिन्धु सभ्यता की इन मुहरों पर केवल अफ़सरों की पदवियाँ अंकित हैं।
➽सिन्धु लिपि में कोई द्रविड़ भाषा खोजता है, कोई वैदिक भाषा। 
➽यह बात भी नज़रअंदाज नहीं करनी चाहिए कि सिन्धु लिपि में इन दोनों के अलावा कोई तीसरी भाषा निहित हो सकती है। 
➽इसीलिए इस लिपि के अन्वेषण का सर्वोत्तम तरीक़ा यही है कि क्रीट की रैखिक-ब लिपि की तरह इसका
अध्ययन इसके अतिरिक्त व्याकरणात्मक विश्लेषण से आरम्भ किया जाए।

➽नगरीय योजना और विन्यास-


➽हड़प्पाई सभ्यता अपनी नगरीय योजना प्रणाली के लिये जानी जाती है।

➽मोहनजोदड़ो और हड़प्पा के नगरों में अपने- अपने दुर्ग थे जो नगर से कुछ ऊँचाई पर स्थित होते थे जिसमें अनुमानतः उच्च वर्ग के लोग निवास करते थे ।

➽दुर्ग से नीचे सामान्यतः ईंटों से निर्मित नगर होते थे,जिनमें सामान्य लोग निवास करते थे।

➽हड़प्पा सभ्यता की एक ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि इस सभ्यता में ग्रिड प्रणाली मौजूद थी जिसके अंतर्गत सडकें एक दूसरे को समकोण पर काटती थीं ।

➽अन्न भंडारों का निर्माण हड़प्पा सभ्यता के नगरों की प्रमुख विशेषता थी।
➽जली हुई ईंटों का प्रयोग हड़प्पा सभ्यता की एक प्रमुख विशेषता थी क्योंकि समकालीन मिस्र में मकानों के निर्माण के लिये शुष्क ईंटों का प्रयोग होता था।
➽हड़प्पा सभ्यता में जल निकासी प्रणाली बहुत प्रभावी थी।
➽हर छोटे और बड़े घर के अंदर स्वंय का स्नानघर और आँगन होता था।
➽कालीबंगा के बहुत से घरों में कुएँ नही पाए जाते थे।
➽कुछ स्थान जैसे लोथल और धौलावीरा में संपूर्ण विन्यास मज़बूत और नगर दीवारों द्वारा भागों में विभाजित थे।

➽कृषि-

➽हड़प्पाई गाँव मुख्यतः प्लावन मैदानों के पास स्थित थे,जो पर्याप्त मात्रा में अनाज का उत्पादन करते थे।
➽गेहूँ, जौ, सरसों, तिल, मसूर आदि का उत्पादन होता था। 
➽गुजरात के कुछ स्थानों से बाजरा उत्पादन के संकेत भी मिले हैं,जबकि यहाँ चावल के प्रयोग के संकेत तुलनात्मक रूप से बहुत ही दुर्लभ मिलते हैं।
➽सिंधु सभ्यता के मनुष्यों ने सर्वप्रथम कपास की खेती प्रारंभ की थी।
➽वास्तविक कृषि परंपराओं को पुनर्निर्मित करना कठिन होता है क्योंकि कृषि की प्रधानता का मापन इसके अनाज उत्पादन क्षमता के आधार पर किया जाता है।
➽मुहरों और टेराकोटा की मूर्तियों पर सांड के चित्र मिले हैं तथा पुरातात्त्विक खुदाई से बैलों से जुते हुए खेत के साक्ष्य मिले हैं।
➽हड़प्पा सभ्यता के अधिकतम स्थान अर्द्ध शुष्क क्षेत्रों में मिले हैं,जहाँ खेती के लिये सिंचाई की आवश्यकता होती है।
➽नहरों के अवशेष हड़प्पाई स्थल शोर्तुगई अफगानिस्तान में पाए गए हैं ,लेकिन पंजाब और सिंध में नहीं।
➽हड़प्पाई लोग कृषि के साथ -साथ बड़े पैमाने पर पशुपालन भी करते थे ।
➽घोड़े के साक्ष्य सूक्ष्म रूप में मोहनजोदड़ो और लोथल की एक संशययुक्त टेराकोटा की मूर्ति से मिले हैं।
➽हड़प्पाई संस्कृति किसी भी स्थिति में अश्व केंद्रित नहीं थी।

➽अर्थव्यवस्था-

➽अनगिनत संख्या में मिली मुहरें ,एकसमान लिपि,वजन और मापन की विधियों से सिंधु घाटी सभ्यता के लोगों के जीवन में व्यापार के महत्त्व के बारे में पता चलता है।
➽हड़प्पाई लोग पत्थर ,धातुओं, सीप या शंख का व्यापर करते थे।
➽धातु मुद्रा का प्रयोग नहीं होता था। 
➽व्यापार की वस्तु विनिमय प्रणाली मौजूद थी।
➽अरब सागर के तट पर उनके पास कुशल नौवहन प्रणाली भी मौजूद थी।
➽उन्होंने उत्तरी अफगानिस्तान में अपनी व्यापारिक बस्तियाँ स्थापित की थीं जहाँ से प्रमाणिक रूप से मध्य एशिया से सुगम व्यापार होता था।
➽दजला -फरात नदियों की भूमि वाले क्षेत्र से हड़प्पा वासियों के वाणिज्यिक संबंध थे।
➽हड़प्पाई प्राचीन ‘लैपिस लाजुली’ मार्ग से व्यापार करते थे जो संभवतः उच्च लोगों की सामाजिक पृष्ठभूमि से संबधित था ।


➽दुर्ग


➽नगर की पश्चिमी टीले पर सम्भवतः सुरक्षा हेतु एक 'दुर्ग' का निर्माण हुआ था जिसकी उत्तर से दक्षिण की ओर लम्बाई 460 गज एवं पूर्व से पश्चिम की ओर लम्बाई 215 गज थी। 
➽ह्वीलर द्वारा इस टीले को 'माउन्ट ए-बी' नाम प्रदान किया गया है। 
➽दुर्ग के चारों ओर क़रीब 45 फीट चौड़ी एक सुरक्षा प्राचीर का निर्माण किया गया था जिसमें जगह-जगह पर फाटकों एव रक्षक गृहों का निर्माण किया गया था। 
➽दुर्ग का मुख्य प्रवेश मार्ग उत्तर एवं दक्षिण दिशा में था। 
➽दुर्ग के बाहर उत्तर की ओर 6 मीटर ऊंचे 'एफ' नामक टीले पर पकी ईटों से निर्मित अठारह वृत्ताकार चबूतरे मिले हैं जिसमें प्रत्येक चबूतरे का व्यास क़रीब 3.2 मीटर है चबूतरे के मध्य में एक बड़ा छेद हैं, जिसमें लकड़ी की ओखली लगी थी, इन छेदों से जौ, जले गेहूँ एवं भूसी के अवशेष मिलते हैं। 
➽इस क्षेत्र में श्रमिक आवास के रूप में पन्द्रह मकानों की दो पंक्तियां मिली हैं जिनमें सात मकान उत्तरी पंक्ति आठ मकान दक्षिणी पंक्ति में मिले हैं। 
➽प्रत्येक मकान में एक आंगन एवं क़रीब दो कमरे अवशेष प्राप्त हुए हैं। 
➽ये मकान आकार में 17x7.5 मीटर के थे। चबूतरों के उत्तर की ओर निर्मित अन्नागारों को दो पंक्तियां मिली हैं, जिनमें प्रत्येक पंक्ति में 6-6 कमरे निर्मित हैं, दोनों पंक्तियों के मध्य क़रीब 7 मीटर चौड़ा एक रास्ता बना था। 
➽प्रत्येक अन्नागार क़रीब 15.24 मीटर लम्बा एवं 6.10 मीटर चौड़ा है।

➽विशेष इमारतें

➽सिंधु घाटी प्रदेश में हुई खुदाई कुछ महत्त्वपूर्ण ध्वंसावशेषों के प्रमाण मिले हैं। 
➽हड़प्पा की खुदाई में मिले अवशेषों में महत्त्वपूर्ण थे -

दुर्ग
रक्षा-प्राचीर
निवासगृह
चबूतरे
अन्नागार आदि ।

➽शिल्पकला -

➽हड़प्पाई कांस्य की वस्तुएँ निर्मित करने की विधि ,उसके उपयोग से भली भाँति परिचित थे।
➽तांबा राजस्थान की खेतड़ी खान से प्राप्त किया जाता था और टिन अनुमानतः अफगानिस्तान से लाया जाता था ।
➽बुनाई उद्योग में प्रयोग किये जाने वाले ठप्पे बहुत सी वस्तुओं पर पाए गए हैं।
➽बड़ी -बड़ी ईंट निर्मित संरचनाओं से राजगीरी जैसे महत्त्वपूर्ण शिल्प के साथ साथ राजमिस्त्री वर्ग के अस्तित्व का पता चलता है।
➽हड़प्पाई नाव बनाने की विधि,मनका बनाने की विधि,मुहरें बनाने की विधि से भली- भाँति परिचित थे। 
➽टेराकोटा की मूर्तियों का निर्माण हड़प्पा सभ्यता की महत्त्वपूर्ण शिल्प विशेषता थी।
➽जौहरी वर्ग सोने ,चांदी और कीमती पत्थरों से आभूषणों का निर्माण करते थे ।
➽मिट्टी के बर्तन बनाने की विधि पूर्णतः प्रचलन में थी,हड़प्पा वासियों की स्वयं की विशेष बर्तन बनाने की विधियाँ थीं, हड़प्पाई लोग चमकदार बर्तनों का निर्माण करते थे ।

➽संस्थाएँ-

➽सिंधु घाटी सभ्यता से बहुत कम मात्रा में लिखित साक्ष्य मिले हैं ,जिन्हें अभी तक पुरातत्त्वविदों तथा शोधार्थियों द्वारा पढ़ा नहीं जा सका है।
➽एक परिणाम के अनुसार, सिंधु घाटी सभ्यता में राज्य और संस्थाओं की प्रकृति समझना काफी कठिनाई का कार्य है ।
➽हड़प्पाई स्थलों पर किसी मंदिर के प्रमाण नहीं मिले हैं। 
➽अतः हड़प्पा सभ्यता में पुजारियों के प्रुभुत्व या विद्यमानता को नकारा जा सकता है।
➽हड़प्पा सभ्यता अनुमानतः व्यापारी वर्ग द्वारा शासित थी।
➽अगर हम हड़प्पा सभ्यता में शक्तियों के केंद्रण की बात करें तो पुरातत्त्वीय अभिलेखों द्वारा कोई ठोस जानकारी नहीं मिलती है।
➽कुछ पुरातत्त्वविदों की राय में हड़प्पा सभ्यता में कोई शासक वर्ग नहीं था तथा समाज के हर व्यक्ति को समान दर्जा प्राप्त था ।
➽कुछ पुरातत्त्वविदों की राय में हड़प्पा सभ्यता में कई शासक वर्ग मौजूद थे ,जो विभिन्न हड़प्पाई शहरों में शासन करते थे ।

➽धर्म-

➽टेराकोटा की लघुमूर्तियों पर एक महिला का चित्र पाया गया है, इनमें से एक लघुमूर्ति में महिला के गर्भ से उगते हुए पौधे को दर्शाया गया है।
➽हड़प्पाई पृथ्वी को उर्वरता की देवी मानते थे और पृथ्वी की पूजा उसी तरह करते थे, जिस प्रकार मिस्र के लोग नील नदी की पूजा देवी के रूप में करते थे ।
➽पुरुष देवता के रूप में मुहरों पर तीन शृंगी चित्र पाए गए हैं जो कि योगी की मुद्रा में बैठे हुए हैं ।
➽देवता के एक तरफ हाथी, एक तरफ बाघ, एक तरफ गैंडा तथा उनके सिंहासन के पीछे भैंसा का चित्र बनाया गया है। 
➽उनके पैरों के पास दो हिरनों के चित्र है। 
➽चित्रित भगवान की मूर्ति को पशुपतिनाथ महादेव की संज्ञा दी गई है।
➽अनेक पत्थरों पर लिंग तथा स्त्री जनन अंगों के चित्र पाए गए हैं।
➽सिंधु घाटी सभ्यता के लोग वृक्षों तथा पशुओं की पूजा किया करते थे।
➽सिंधु घाटी सभ्यता में सबसे महत्त्वपूर्ण पशु एक सींग वाला गैंडा था तथा दूसरा महत्त्वपूर्ण पशु कूबड़ वाला सांड था।
➽अत्यधिक मात्रा में ताबीज भी प्राप्त किये गए हैं।

➽सभ्यता का विस्तार

➽अब तक इस सभ्यता के अवशेष पाकिस्तान और भारत के पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान, गुजरात, राजस्थान, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, जम्मू-कश्मीर के भागों में पाये जा चुके हैं। 
➽इस सभ्यता का फैलाव उत्तर में 'जम्मू' के 'मांदा' से लेकर दक्षिण में नर्मदा के मुहाने 'भगतराव' तक और पश्चिमी में 'मकरान' समुद्र तट पर 'सुत्कागेनडोर' से लेकर पूर्व में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मेरठ तक है। 
➽इस सभ्यता का सर्वाधिक पश्चिमी पुरास्थल 'सुत्कागेनडोर', पूर्वी पुरास्थल 'आलमगीर', उत्तरी पुरास्थल 'मांडा' तथा दक्षिणी पुरास्थल 'दायमाबाद' है। 
➽लगभग त्रिभुजाकार वाला यह भाग कुल क़रीब 12,99,600 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है। 
➽सिन्धु सभ्यता का विस्तार का पूर्व से पश्चिमी तक 1600 किलोमीटर तथा उत्तर से दक्षिण तक 1400 किलोमीटर था। 
➽इस प्रकार सिंधु सभ्यता समकालीन मिस्र या 'सुमेरियन सभ्यता' से अधिक विस्तृत क्षेत्र में फैली थी।

➽सिंधु घाटी सभ्यता का पतन-

➽सिंधु घाटी सभ्यता का लगभग 1800 ई.पू. में पतन हो गया था, परंतु उसके पतन के कारण अभी भी विवादित हैं।
➽एक सिद्धांत यह कहता है कि इंडो -यूरोपियन जनजातियों जैसे- आर्यों ने सिंधु घाटी सभ्यता पर आक्रमण कर दिया तथा उसे हरा दिया ।
➽सिंधु घटी सभ्यता के बाद की संस्कृतियों में ऐसे कई तत्त्व पाए गए जिनसे यह सिद्ध होता है कि यह सभ्यता आक्रमण के कारण एकदम विलुप्त नहीं हुई थी ।
➽दूसरी तरफ से बहुत से पुरातत्त्वविद सिंधु घाटी सभ्यता के पतन का कारण प्रकृति जन्य मानते हैं।
➽प्राकृतिक कारण भूगर्भीय और जलवायु संबंधी हो सकते हैं।
➽यह भी कहा जाता है कि सिंधु घाटी सभ्यता के क्षेत्र में अत्यधिक विवर्तिनिकी विक्षोभों की उत्पत्ति हुई जिसके कारण अत्यधिक मात्रा में भूकंपों की उत्पत्ति हुई।
➽एक प्राकृतिक कारण वर्षण प्रतिमान का बदलाव भी हो सकता है।
➽एक अन्य कारण यह भी हो सकता है कि नदियों द्वारा अपना मार्ग बदलने के कारण खाद्य उत्पादन क्षेत्रों में बाढ़आ गई हो ।
➽इन प्राकृतिक आपदाओं को सिंधु घाटी सभ्यता के पतन का मंद गति से हुआ, परंतु निश्चित कारण माना गया है।

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हड़प्पा सभ्यता किस नाम से प्रसिद्ध है:
सिंधु घाटी की सभ्यता
सर्वप्रथम घोड़े के अवशेष सिंधु घाटी सभ्यता में कहाँ से मिले है
सुरकोटदा
सर्वप्रथम हड़प्पा सभ्यता की खोज किसने की थी?

दयाराम साहनी

किस वर्ष में हड़प्पा सभ्यता की खोज हुई थी ?



1921 ई.

मोहनजोदड़ो को और किस नाम से जाना जाता है?



मृतकों का टीला

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सिन्धु-सरस्वती लिपि और हड़प्पा लिपि

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