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Vaidik Sabhyata-वैदिक सभ्यता

Vaidik Sabhyata    - दोस्तों आज indgk आप सब छात्रों के लिए भारतीय इतिहास सामान्य ज्ञान से संबंधित बहुत ही महत्वपूर्ण नोट्स “Vaidik Sabhyata in Hindi” शेयर कर रहा है. जो छात्र UPSC, IAS, SSC, Civil Services, SBI PO, Banking, Railway RRB, RPF या अन्य Competitive Exams की तैयारी कर रहे है उन्हें ‘Vaidik Sabhyata’ अवश्य पढना चाहिए. 

सिंधु घाटी सभ्यता (Indus Valley Civilization) के पश्चात भारत में जिस नवीन सभ्यता का विकास हुआ उसे ही आर्य(Aryan) अथवा वैदिक सभ्यता(Vedic Civilization) के नाम से जाना जाता है।www.indgk.com


 vaidik sabhyata-वैदिक सभ्यता


सिंधु सभ्यता के पतन के बाद जो नवीन संस्कृति प्रकाश में आयी उसके विषय में हमें सम्पूर्ण जानकारी वेदों से मिलती है। इसलिए इस काल को हम 'वैदिक काल' अथवा वैदिक सभ्यता के नाम से जानते हैं। चूँकि इस संस्कृति के प्रवर्तक आर्य लोग थे इसलिए कभी-कभी आर्य सभ्यता का नाम भी दिया जाता है। यहाँ आर्य शब्द का अर्थ- श्रेष्ठ, उदात्त, अभिजात्य, कुलीन, उत्कृष्ट, स्वतंत्र आदि हैं। यह काल 1500 ई.पू. से 600 ई.पू. तक अस्तित्व में रहा।

जानकारी के स्रोत

➽भारत में आर्यो(Aryans) के आरम्भिक इतिहास के संबंध में जानकारी का प्रमुख स्रोत वैदिक साहित्य है।
➽इस साहित्य के आलावा, वैदिक युग(Vedic Age) के बारे में जानकारी का एक अन्य स्रोत पुराताविवक साक्ष्य(Archaeological Evidances) है, लेकिन ये अपनी कतिपय त्रुटियों के कारण किसी स्वतंत्र अथवा निर्विवाद जानकारी का स्रोत न होकर साहितियक श्रोतो के आधार पर किये गए विश्लेषण की पुष्टि मात्र करते है।

➽साहितियक स्रोत (Literary Sources): ऋग्वेद संहिता(Rigveda-Samhita) ऋग्वैदिक काल की एकमात्र रचना है।
➽इसमें 10 मंडल (Division) तथा 1028 सूक्त (Hymns) है। इसकी रचना 1500 ई,पु. से 1000 ई.पु. के मध्य हुई।
➽इसके कुल 10 मंडलो में से दूसरे से सातवें तक के मंडल सबसे प्राचीन माने जाते है, जबकि प्रथम तथा दसवां मंडल परवर्ती काल के माने गए है।
➽ऋग्वेद के दूसरे से सातवें मंडल को गोत्र मंडल (Clan Divison) के नाम से भी जाना जाता है क्योकि इन मंडलो की रचना किसी गोत्र (Clan) विशेष से संबंधित एक ही ऋषि (Saga) के परिवार ने की थी।
➽ऋग्वेद की अनेक बातें फ़ारसी भाषा के प्राचीनतम ग्रन्थ अवेस्ता (Avesha) से भी मिलती है।
➽गौरतलब है कि इन दोनों धर्म में ग्रंथो में बहुत से देवी-देवताओ और सामजिक वर्गो के नाम भी मिलते-जुलते है।

➽पुरातात्विक स्रोत 


1. कस्सी अभिलेख (1600 .पु.): इन अभिलेख से यह जानकारी मिलती है कि ईरानी आर्यो (Iranian Aryans) की एक शाखा का भारत आगमन हुआ।

2. बोगजकोई (मितन्नी) अभिलेख (1400 .पु.): इन अभिलेखों में हित्ती राजा सुबिवलिम और मितन्नी राजा मतिउअजा के मध्य हुई संधि के साक्षी के रूप में वैदिक देवताओं - इंद्र, वरुण, मित्र, नासत्य आदि का उल्लेख है।

3. चित्रित घूसर मृदभांड (Painted Grey Wares – P.G.W.)

4. उत्तर भारत में हरियाणा के पास भगवानपुरा में हुई खुदाई में एक 13 कमरों का मकान तथा पंजाब में तीन ऐसे स्थान मिले है जिनका संबंध त्रिग्वेदकाल से माना जाता है।


➽ऋग्वैदिक काल के भौगोलिक विस्तार तथा बस्तियों की स्थापना के संबंध में जानकारी के लिए मूल रूप से ऋग्वेद  (Rigveda) पर ही निर्भर रहना पड़ता है, क्योकि पुरातात्विक साक्ष्यों में प्रमाणिकता का नितांत अभाव है।
➽त्रिग्वेद में आर्य निवास-स्थल के लिए सप्तसैंधव क्षेत्र का उल्लेख मिलता है, जिसका अर्थ है-सात नदियों का क्षेत्र।
➽इन सात नदियों की पहचान के संदर्भ में विद्वानों में मतभेद है, फिर भी यह माना जा सकता है कि आधुनिक पंजाब के विस्तृत भूखंड को 'सप्तसैंधव' कहा गया है।
➽त्रिग्वेद से प्राप्त जानकारी के अनुसार आर्यो का विस्तार अफगानिस्तान, पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक था।
➽सतलुज से यमुना नदी तक का क्षेत्र 'ब्रहावर्त' कहलाता था जिसे ऋग्वैदिक सभ्यता का केंद्र माना जाता था।
➽ऋग्वैदिक आर्यो की पूर्वी सीमा हिमालय और तिब्बत, उत्तर में वर्तमान तुर्कमेनिस्तान, पश्चिम में अफगानिस्तान तथा दक्षिण में अरावली तक विस्तृत थी।
➽ वैदिक काल को ऋग्वैदिक या पूर्व वैदिक काल (1500 -1000 ई.पु.) तथा उत्तर वैदिक काल (1000 - 600 ई.पु.) में बांटा गया है।
➽वैदिक काल, या वैदिक समय (c. 1500 - c.500 ईसा पूर्व), शहरी सिंधु घाटी सभ्यता के अंत और उत्तरी मध्य-गंगा में शुरू होने वाले एक दूसरे शहरीकरण के बीच उत्तरी भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास में अवधि है।
➽सादा c. 600 ई.पू. इसका नाम वेदों से मिलता है, जो इस अवधि के दौरान जीवन का विवरण देने वाले प्रख्यात ग्रंथ हैं जिन्हें ऐतिहासिक माना गया है और अवधि को समझने के लिए प्राथमिक स्रोतों का गठन किया गया है।
➽संबंधित पुरातात्विक रिकॉर्ड के साथ ये दस्तावेज वैदिक संस्कृति के विकास का पता लगाने और अनुमान लगाने की अनुमति देते हैं।
➽वेदों की रचना और मौखिक रूप से एक पुरानी इंडो-आर्यन भाषा बोलने वालों द्वारा सटीक रूप से प्रेषित की गई थी, जो इस अवधि के शुरू में भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों में चले गए थे।
➽वैदिक समाज पितृसत्तात्मक और पितृसत्तात्मक था।
➽आरंभिक वैदिक आर्य पंजाब में केंद्रित एक कांस्य युग के समाज थे, जो कि राज्यों के बजाय जनजातियों में संगठित थे, और मुख्य रूप से जीवन का एक देहाती तरीका था।
➽चारों ओर सी। 1200–1000 ई.पू., वैदिक आर्य पूर्व में उपजाऊ पश्चिमी गंगा के मैदान में फैल गए और उन्होंने लोहे के उपकरण अपना लिए, जो जंगल को साफ करने और अधिक व्यवस्थित, कृषि जीवन को अपनाने की अनुमति देते थे।
➽वैदिक काल के उत्तरार्ध में भारत, और कुरु साम्राज्य के रूढ़िवादी यज्ञ अनुष्ठान के लिए एक जटिल सामाजिक विभेदीकरण, शहरों, राज्यों और एक जटिल सामाजिक भेदभाव के उद्भव की विशेषता थी।
➽इस समय के दौरान, केंद्रीय गंगा मैदान एक संबंधित लेकिन गैर-वैदिक इंडो-आर्यन संस्कृति का प्रभुत्व था। ➽वैदिक काल के अंत में सच्चे शहरों और बड़े राज्यों (महाजनपद कहा जाता है) के उदय के साथ-साथ asramaśa आंदोलनों (जैन धर्म और बौद्ध धर्म सहित) में वृद्धि हुई, जिसने वैदिक रूढ़िवाद को चुनौती दी।
➽वैदिक काल में सामाजिक वर्गों के वर्णानुक्रम का उदय हुआ जो प्रभावशाली रहेगा।
➽वैदिक धर्म यज्ञ परक था तथा इस काल की वर्ण व्यवस्था कार्यानुसार थी।
➽वैदिक सामग्री संस्कृति के चरणों से पहचानी जाने वाली पुरातात्विक संस्कृतियों में गेरू की कब्र संस्कृति, काले और लाल वेयर संस्कृति और चित्रित ग्रे वेयर संस्कृति में गेरू रंग की बर्तनों की संस्कृति शामिल है।

➽वेदों के अतिरिक्त संस्कृत के अन्य कई ग्रंथो की रचना भी 4-5 ई.पू काल में हुई थी।
➽वेदांगसूत्रौं की रचना मन्त्र ब्राह्मणग्रंथ और उपनिषद इन वैदिकग्रन्थौं को व्यवस्थित करने मे हुआ है। 
➽ अनन्तर रामायण, महाभारत,और पुराणौंकी रचना हुआ जो इस काल के ज्ञानप्रदायी स्रोत मानागया हैं। अनन्तर चार्वाक , तान्त्रिकौं ,बौद्ध और जैन धर्म का उदय भी हुआ।

➽इतिहासकारों का मानना है कि आर्य मुख्यतः उत्तरी भारत के मैदानी इलाकों में रहते थे इस कारण आर्य सभ्यता का केन्द्र मुख्यतः उत्तरी भारत था।
➽इस काल में उत्तरी भारत (आधुनिक पाकिस्तान, बांग्लादेश तथा नेपाल समेत) कई महाजनपदों में बंटा था। आर्यों का आगमन मध्य एशिया से हुआ।


➽नाम और देशकाल

➽वैदिक सभ्यता का नाम ऐसा इस लिए पड़ा कि वेद उस काल की जानकारी का प्रमुख स्रोत हैं। 
➽वेद चार है - ऋग्वेद, सामवेद, अथर्ववेद और यजुर्वेद। 
➽इनमें से ऋग्वेद की रचना सबसे पहले हुई थी। 
➽ऋग्वेद में ही गायत्री मन्त्र है जो सविता(सूर्य) को समर्पित है।

➽ऋग्वेद के काल निर्धारण में विद्वान एकमत नहीं है। 
➽सबसे पहले मैक्स मूलर ने वेदों के काल निर्धारण का प्रयास किया। 
➽उसने बौद्ध धर्म (550 ईसा पूर्व) से पीछे की ओर चलते हुए वैदिक साहित्य के तीन ग्रंथों की रचना को मनमाने ढंग से 200-200 वर्षों का समय दिया और इस तरह ऋग्वेद के रचना काल को 1200 ईसा पूर्व के करीब मान लिया पर निश्चित रूप से उसके आंकलन का कोई आधार नहीं था।

➽वैदिक काल को मुख्यतः दो भागों में बांटा जा सकता है- ऋग्वैदिक काल और उत्तर वैदिक काल। 
➽ऋग्वैदिक काल आर्यों के आगमन के तुरंत बाद का काल था जिसमें कर्मकांड गौण थे पर उत्तरवैदिक काल में हिन्दू धर्म में कर्मकांडों की प्रमुखता बढ़ गई।

➽ऋग्वैदिक काल -(1500-1000 ई.पू.)


➽इस काल की तिथि निर्धारण जितनी विवादास्पद रही है उतनी ही इस काल के लोगों के बारे में सटीक जानकारी। 
➽इसका एक प्रमुख कारण यह भी है कि इस समय तक केवल इसी ग्रंथ (ऋग्वेद) की रचना हुई थी। 
➽मैक्स मूलर के अनुसार आर्य का मूल निवास मध्य ऐशिया है।
➽आर्यो द्वारा निर्मित सभ्यता वैदिक काल कहलाई। 
➽आर्यो द्वारा विकसित सभ्य्ता ग्रामीण सभ्यता कहलायी। 
➽आर्यों की भाषा संस्कृत थी।

➽मैक्स मूलर ने जब अटकलबाजी करते हुए इसे 1200 ईसा पूर्व से आरंभ होता बताया था (लेख का आरंभ देखें) उसके समकालीन विद्वान डब्ल्यू. डी. ह्विटनी ने इसकी आलोचना की थी। 
➽उसके बाद मैक्स मूलर ने स्वीकार किया था कि " पृथ्वी पर कोई ऐसी शक्ति नहीं है जो निश्चित रूप से बता सके कि वैदिक मंत्रों की रचना 1000 ईसा पूर्व में हुई थी या कि 1500 ईसापूर्व में या 2000 या 3000 "
➽ऐसा माना जाता है कि आर्यों का एक समूह भारत के अतिरिक्त ईरान (फ़ारस) और यूरोप की तरफ़ भी गया था। 
➽ईरानी भाषा के प्राचीनतम ग्रंथ अवेस्ता की सूक्तियां ऋग्वेद से मिलती जुलती हैं। 
➽अगर इस भाषिक समरूपता को देखें तो ऋग्वेद का रचनाकाल 1000 ईसापूर्व आता है। 
➽लेकिन बोगाज-कोई (एशिया माईनर) में पाए गए 1400 ईसा पूर्व के अभिलेख में हिंदू देवताओं इंद, मित्रावरुण, नासत्य इत्यादि को देखते हुए इसका काल और पीछे माना जा सकता है।



➽आर्यो का आगमन काल

➽आर्यो के आगमन के विषय में विद्धानों में मतभेद है। 
➽विक्टरनित्ज ने आर्यो के आगमन की तिथि के 2500 ई. निर्धारित की है जबकि बालगंगाधर तिलक ने इसकी तिथि 6000 ई.पू. निर्धारित की है। 
➽मैक्समूलर के अनुसार इनके आगमन की तिथि 1500 ई.पू. है। 
➽आर्यो के मूल निवास के सन्दर्भ में सर्वाधिक प्रमाणिक मत आल्पस पर्व के पूर्वी भाग में स्थित यूरेशिया का है। 
➽वर्तमान समय में मैक्सूमूलन ने मत स्वीकार्य हैं।

बाल गंगाधर तिलक ने ज्योतिषीय गणना करके इसका काल 6000 ई.पू. माना था। हरमौन जैकोबी ने जहाँ इसे 4500 ईसापूर्व से 2500 ईसापूर्व के बीच आंका था वहीं सुप्रसिद्ध संस्कृत विद्वान विंटरनित्ज़ ने इसे 3000 ईसापूर्व का बताया था।

➽आर्यो के क़बीले

➽डॉ. जैकोबी के अनुसार आर्यो ने भारत में कई बार आक्रमण किया और उनकी एक से अधिक शाखाएं भारत में आयी। 
➽सबसे महत्त्वपूर्ण कबीला भारत था। इसके शासक वर्ग का नाम त्रित्सु था। 
➽संभवतः सृजन और क्रीवी कबीले भी उनसे सम्बद्ध थे। 
➽ऋग्वेद में आर्यो के जिन पांच कबीलों का उल्लेख है उनमें- पुरु, यदु, तुर्वश, अनु, द्रुह्म प्रमुख थे। 
➽ये पंचयन के नाम से जाने जाते थे। 
➽चदु और तुर्वस को दास कहा जाता था। 
➽यदु और तुर्वश के विषय में ऐसा माना जाता था कि इन्द्र उन्हे बाद में लाए थे। 
➽यह ज्ञात होता है कि सरस्वती दृषद्वती एवं आपया नदी के किनारे भरत कबीले ने अग्नि की पूजा की।


➽आर्यो का भौगोलिक क्षेत्र

➽भारत में आर्यो का आगमन 1500 ई.पू. से कुछ पहले हुआ। 
➽भारत में उन्होंने सर्वप्रथम सप्त सैन्धव प्रदेश में बसना प्रारम्भ किया। 
➽इस प्रदेश में बहने वाली सात नदियों का ज़िक्र हमें ऋग्वेद से मिलता है। 
➽ये हैं सिंधु, सरस्वती, शतुद्रि (सतलुज) विपशा (व्यास), परुष्णी (रावी), वितस्ता (झेलम), अस्किनी (चिनाब) आदि।
➽कुछ अफ़ग़ानिस्तान की नदियों का ज़िक्र भी हमें ऋग्वेद से मिलता है। 
➽ये हैं- कुभा (काबुल नदी), क्रुभु (कुर्रम), गोमती (गोमल) एवं सुवास्तु (स्वात) आदि। 
➽इससे यह पता चलता है कि अफ़ग़ानिस्तान भी उस समय भारत का ही एक अंग था। 
➽हिमालय पर्वत का स्पष्ट उल्लेख हुआ है। 
➽हिमालय की एक चोटी को मूजदन्त कहा गया है जो सोम के लिए प्रसिद्व थी। 
➽इस प्रकार आर्य हिमालय से परिचत थे। 
➽आर्यों ने अगले पड़ाव के रूप में कुरूक्षेत्र के निकट के प्रदेशों पर क़ब्ज़ा कर उस क्षेत्र का नाम 'ब्रह्मवर्त' (आर्यावर्त) रखा। 
➽ब्रह्मवर्त से आगे बढ़कर आर्यो ने गंगा-यमुना के दोआब क्षेत्र एवं उसके नजदीक के क्षेत्रों पर क़ब्ज़ा कर उस क्षेत्र का नाम ब्रह्मर्षि देश रखा। 
➽इसके बाद हिमालय एवं विन्ध्यांचल पर्वतों के बीच के क्षेत्र पर क़ब्ज़ा कर उस क्षेत्र का नाम 'मध्य प्रदेश' रखा। 
➽अन्त में बंगाल एवं बिहार के दक्षिण एवं पूर्वी भागों पर क़ब्ज़ा कर समूचे उत्तर भारत पर अधिकार कर लिया, कालान्तर में इस क्षेत्र का नाम 'आर्यावत' रखा गया। 
➽मनुस्मृति में सरस्वती और दृषद्वती नदियों के बीच के प्रदेश को ब्रह्मवर्त पुकारा गया।

➽समुद्र-


ऋग्वेद में समुद्र की चर्चा हुई है और भुज्य की नौका दुर्घटना वाली कहानी में जलयात्रा पर प्रकाश पड़ता है। वैदिक तौल की ईकाई मन एवं वेबीलोन की इकाई मन में समानता से भी समुद्र यात्रा पर पड़ता है। ऋग्वेद के दो मन्त्रों (9वें ओर 10वें मण्डल के) में चार समुद्रों का उल्लेख है।

➽पर्वत

 ऋग्वैदिक आर्य हिमालय पहाड़ से परिचित थे। परन्तु विन्ध्य या सतपुड़ा से परिचित नहीं थें। कुछ महत्त्वपूर्ण चोटियों की चर्चा है, यथा जैसे हिमवंत, मंजदंत, शर्पणावन्, आर्जीक तथा सुषोम।

➽मरुस्थल

 ऋग्वेद में मरुस्थल के लिए धन्व शब्द आया है। आर्यो को सम्भवतः मरुस्थल का ज्ञात था, क्योंकि इस बात की चर्चा की जाती है कि पर्जन्य ने मरुस्थल को पर करने योग्य बनाया।

➽क्षेत्र

प्रारम्भिक वैदिक साहित्य में केवल एक क्षेत्र 'गांधारि' की चर्चा है। इसकी पहचान आधुनिक पेशावर एवं रावलपिण्डी ज़िलों से की गई है।


vaidik sabhyata kis nadi ke kinare -ऋग्वेद में नदियों का उल्लेख


➽ऋग्वेद में 25 नदियों का उल्लेख है, जिसमें सबसे महत्त्वपूर्ण नदी सिन्धु नदी है, जिसका वर्णन कई बार आया है। 
➽यह सप्त सैन्धव क्षेत्र की पश्चिमी सीमा थी। 
➽क्रुमु (कुरुम),गोमती (गोमल), कुभा (काबुल) और सुवास्तु (स्वात) नामक नदियां पश्चिम किनारे में सिन्धु की सहायक नदी थीं। 
➽पूर्वी किनारे पर सिन्धु की सहायक नदियों में वितास्ता (झेलम) आस्किनी (चेनाब), परुष्णी (रावी), शतुद्र (सतलज), विपासा (व्यास) प्रमुख थी। 
➽विपास (व्यास) नदी के तट पर ही इन्द्र ने उषा को पराजित किया और उसके रथ को टुकड़े-टुकड़े कर दिया। सिन्धु नदी को उसके आर्थिक महत्व के कारण हिरण्यनी कहा गया है। 
➽सिन्धु नदी द्वार ऊनी वस्त्रों के व्यवसाय होने का कारण इसे सुवासा और ऊर्पावर्ती भी कहा गया है। 
➽ऋग्वेद में सिन्धु नदी की चर्चा सर्वाधिक बार हुई है।

vaidik sabhyata river-वैदिक सभ्यता नदी-

नदी
प्राचीननाम
सिन्ध
सिन्धु
व्यास
विपाशा
झेलम
वितस्ता
चेनाब
आस्किनी
घग्गर
दृशदती
रावी
परुष्णी
सतलज
शतुद्री
गोमल
गोमती
काबुल
कुम्भ
गंडक
सदानीरा
कुर्रम
क्रुमु

➽प्रशासनिक इकाई

➽प्रशासन की सबसे छोटी इकाई कुल थी। 
➽एक कुल में एक घर में एक छत के नीचे रहने वाले लोग शामिल थे। 
➽परिवार के मुखिया को कुलुप कहा जाता था। 
➽एक ग्राम कई कुलों से मिलकर बना होता था। 
➽ग्रामों का संगठन विश् कहलाता था और विशों का संगठन जन। 
➽कई जन मिलकर राष्ट्र बनाते थे। 
➽ग्राम के मुखिया को ग्रामिणी, विश का प्रधान विशपति ,

➽जन का शासक राजन् (राजा) तथा राष्ट्र के प्रधान को सम्राट कहते थे। 
➽आर्यों की प्रशासनिक संस्थाएं काफी सशक्त अवस्था में थी। 
➽प्रारंभ में राजा का चुनाव जनता के द्वारा किया जाता था बाद में उसका पद धीरे-धीरे पैतृक होता चला गया परंतु राजा निरंकुश नहीं होता था वह जनता की सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी लेता था इस सुरक्षा व्यवस्था के बदले में लोग राजा को स्वैच्छिक कर देते थे जिसे बलि कहा जाता था। 
➽ऋग्वैदिक आर्यों की दो महत्वपूर्ण राजनैतिक संस्थाएं थीं जिन्हें सभा और समिति कहा जाता था

"सभा-" इसे उच्च सदन भी कहा जा सकता है यह समाज से आए हुए बुद्धिमान और अनुभवी व्यक्तियों की संस्था थी। सभा के सदस्यों को सभेय अथवा सभासद कहा जाता था और सभा का अध्यक्ष सभापति कहा जाता था सभा के सदस्यों को पितर कहा जाता था जिससे पता लगता है कि ये बुजुर्ग और अनुभवी लोग थे।


"समिति-" समिति आम जनमानस की संस्था थी उसके सदस्य समस्त नागरिक होते थे इसमें सामान्य विषयों पर चर्चा होती थी उसके अध्यक्ष को ईशान कहा जाता था। प्रारंभ में समिति में स्त्रियां भी आती थी और उसमें आकर ऋक नामक गान किया करती थी। आर्यों की सबसे प्राचीन संस्था को जनसभा थी उसे "विदथ" कहा जाता था।
ऋग्वैदिक काल में प्रशासन की सबसे छोटी इकाई कुल या गृह था। उसके ऊपर ग्राम था। 
➽उसके ऊपर विश था। सबसे ऊपर जन होता था। 
➽ऋग्वेद में जन शब्द का उल्लेख 275 बार हुआ है, जबकि जनपथ शब्द का उल्लेख एक बार भी नहीं हुआ है। विश शब्द का उल्लेख 170 बार हुआ है।
➽ऋग्वैदिक भारत का राजनीतिक ढाँचा आरोही क्रम में- कुल > ग्राम > विशस > जन > राष्ट्र

➽धर्म

➽ऋग्वैदिक काल में प्राकृतिक शक्तियों की ही पूजा की जाती थी और कर्मकांडों की प्रमुखता नहीं थी। 
➽ ऋग्वैदिक काल धर्म की॑ अन्य विशेषताएं • क्रत्या, निऋति, यातुधान, ससरपरी आदि के रूप मे अपकरी शक्तियो अर्थात, राछसों, पिशाच एवं अप्सराओ का जिक्र दिखाई पडता है। 
➽इस समय में मूर्ति पूजन नहीं होता था और ना ही मंत्रोचार किया जाता था। 
➽कर्मकांड जैसे पूजा-पाठ, व्रत,यज्ञ आदि इस काल में नहीं होते थे।
➽वैदिक धर्म पूर्णतः प्रतिमार्गी हैं वैदिक देवताओं में पुरुष भाव की प्रधानता है। 
➽अधिकांश देवताओं की अराधना मानव के रूप में की जाती थी किन्तु कुछ देवताओं की अराधना पशु के रुप में की जाती थी। 
➽अज एकपाद और अहितर्बुध्न्य दोनों देवताओं परिकल्पना पशु के रूप में की गई है। 
➽मरुतों की माता की परिकल्पना चितकबरी गाय के रूप में की गई है। 
➽इन्द्र की गाय खोजने वाला सरमा (कुत्तिया) स्वान के रूप में है। 
➽इसके अतिरिक्त इन्द्र क कल्पना वृषभ (बैल) के रूप में एवं सूर्य को अश्व के रूप में की गई है। 
➽ऋग्वेद में पशुओं के पूजा प्रचलन नहीं था। 
➽ऋग्वैदिक देवताओं में किसी प्रकार का उँच-नीच का भेदभाव नहीं था। 
➽वैदिक ऋषियों ने सभी देवताओं की महिमा गाई है। 
➽ऋग्वैदिक लोगों ने प्राकृतिक शक्तियों का मानवीकरण किया है।
➽ इस समय 'बहुदेववाद' का प्रचलन था। 
➽ऋग्वैदिक आर्यो की देवमण्डली तीन भागों में विभाजित थी।

आकाश के देवता - सूर्य, द्यौस, वरुण, मित्र, पूषन्, विष्णु, उषा, अपांनपात, सविता, त्रिप, विंवस्वत्, आदिंत्यगग, अश्विनद्वय आदि।
अन्तरिक्ष के देवता- इन्द्र, मरुत, रुद्र, वायु, पर्जन्य, मातरिश्वन्, त्रिप्रआप्त्य, अज एकपाद, आप, अहिर्बुघ्न्य।
पृथ्वी के देवताअग्निसोमपृथ्वीबृहस्पतितथा नदियां।

➽इस देव समूह में सर्वप्रधान देवता कौन था, यह निर्धारित करना कठिन है ऋग्वैदिक ऋषियों ने जिस समय जिस देवता की स्तुति की उसे ही सर्वोच्च मानकर उसमें सम्पूर्ण गुणों का अरोपण कर दिया। 
➽मैक्स मूलर ने इस प्रवृत्ति की 'हीनाथीज्म' कहा है। 
➽सूक्तों की संख्या की दृष्टि यह मानना न्यायसंगत होगा कि इनका सर्वप्रधान देवता इन्द्र था।

इस काल की जानकारी हमे मुख्यत: वेदों से प्राप्त होती है, जिसमे ऋग्वेद सर्वप्राचीन होने के कारण सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। वैदिक काल को ऋग्वैदिक या पूर्व वैदिक काल (1500 -1000 ई.पु.) तथा उत्तर वैदिक काल (1000 - 600 ई.पु.) में बांटा गया है-www.indgk.com
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➽इन्द्र

➽ऋग्वेद में अन्तरिक्ष स्थानीय 'इन्द्र' का वर्णन सर्वाधिक प्रतापी देवता के रूप में किया गया है, ऋग्वेद के क़रीब 250 सूक्तों में इनका वर्णन है। 
➽इन्हे वर्षा का देवता माना जाता था। 
➽उन्होंने वृक्ष राक्षस को मारा था इसीलिए उन्हे वृत्रहन कहा जाता है। 
➽अनेक किलों को नष्ट कर दिया था, इस रूप में वे पुरन्दर कहे जाते हैं। 
➽इन्द्र ने वृत्र की हत्या करके जल का मुक्त करते हैं इसलिए उन्हे पुर्मिद कहा गया। 
➽ऋग्वेद में इन्द्र को समस्त संसार का स्वामी बताया गया है। 
➽उसका प्रिय आयुद्ध बज्र है इसलिए उन्हे ब्रजबाहू भी कहा गया है। 
➽इन्द्र कुशल रथ-योद्धा (रथेष्ठ), महान् विजेता (विजेन्द्र) और सोम का पालन करने वाला (सोमपा) है। 
➽इन्द्र तूफ़ान और मेध के भी देवता है । 
➽एक शक्तिशाली देवता होने के कारण इन्द्र का शतक्रतु (एक सौ शक्ति धारण करने वाला) कहा गया है वृत्र का वध करने का कारण वृत्रहन और मधवन (दानशील) के रूप में जाना जाता है। 
➽उनकी पत्नी इन्द्राणी अथवा शची (ऊर्जा) हैं प्राचीन भारतीय ग्रन्थों में इन्द्र के साथ कृष्ण के विरोध का उल्लेख मिलता है।

➽अग्नि

➽ऋग्वेद में दूसरा महत्त्वपूर्ण देवता 'अग्नि' था, जिसका काम था मनुष्य और देवता के मध्य मध्यस्थ की भूमिका निभाना। 
➽अग्नि के द्वारा ही देवताओं आहुतियाँ दी जाती थीं। 
➽ऋग्वेद में क़रीब 200 सूक्तों में अग्नि का ज़िक्र किया गया है। 
➽वे पुरोहितों के भी देवता थे। 
➽उनका मूल निवास स्वर्ग है।
➽ किन्तु मातरिश्वन (देवता) न उसे पृथ्वी पर लाया। 
➽पृथ्वी पर यज्ञ वेदी में अग्नि की स्थापना भृगुओं एवं अंगीरसों ने की। 
➽इस कार्य के कारण उन्हें 'अथर्वन' कहा गया है। वह प्रत्येक घर में प्रज्वलित होती थी इस कारण उसे प्रत्येक घर का अतिथि माना गया है। 
➽इसकी अन्य उपधियाँ जातदेवस् (चर-अचर का ज्ञात होने के कारण), भुवनचक्षु (सर्वद्रष्टा होने के कारण), हिरन्यदंत (सुरहरे दाँव वाला) अथर्ववेद में इसे प्रातः काल उचित होने वाला मित्र और सांयकाल को वरुण कहा गया है। 

➽वरुण 

➽तीसरा स्थान वरुण का माना जाता है, जिसे समुद्र का देवता, विश्व के नियामक और शासक सत्य का प्रतीक, ऋतु परिवर्तन एवं दिन-रात का कर्ता-धर्ता, आकाश, पृथ्वी एवं सूर्य का निर्माता के रूप में जाना जाता है। 
➽ईरान में इन्हे 'अहुरमज्द' तथा यूनान में 'यूरेनस' के नाम से जाना जाता है। 
➽ये ऋतु के संरक्षक थे इसलिए इन्हे ऋतस्यगोप भी कहा जाता था। 
➽वरुण के साथ मित्र का भी उल्लेख है इन दोनों को मिलाकर मित्र वरूण कहते हैं। 
➽ऋग्वेद के मित्र और वरुण के साथ आप का भी उल्लेख किया गया है। 
➽आप का अर्थ जल होता है।
➽ऋग्वेद के मित्र और वरुण का सहस्र स्तम्भों वाले भवन में निवास करने का उल्लेख मिलता है। 
➽मित्र के अतिरिक्त वरुण के साथ आप का भी उल्लेख मिलता है। 
➽ऋग्वेद मे वरुण को वायु का सांस कहा गया है। 
➽वरुण देव लोक में सभी सितारों का मार्ग निर्धारित करते हैं। 
➽इन्हे असुर भी कहा जाता हैं। 
➽इनकी स्तुति लगभग 30 सूक्तियों में की गयी है। 
➽देवताओं के तीन वर्गो (पृथ्वी स्थान, वायु स्थान और आकाश स्थान) में वरुण का सर्वोच्च स्थान है। 
➽वे देवताओं के देवता है। 
➽ऋग्वेद का 7 वाँ मण्डल वरुण देवता को समर्पित है। 
➽दण्ड के रूप में लोगों को 'जलोदर रोग' से पीड़ित करते थे।
'
                   ऋग्वैदिककालीन देवता

   देवता    -                               संबंध
इंद्र           -         युद्ध का नेता और वर्षा का देवता

अग्नि         -        देवता और मनुष्य् के बीच मध्यदस्थ

वरुण         -        पृथ्वी और सूर्य के निर्माता, समुद्र का देवता, विश्वा के नियामक एवं शासक, सत्य  का प्रतीक,         ऋतुय परिवर्तन एवं दिन-रात का कर्ता

द्यौ         -      आकाश का देवता (सबसे प्राचीन)

सोम         -     वनस्पीति देवता

उषा             -      प्रगति एवं उत्थांन देवता

आश्विन                          विपत्तियों को हरनेवाले देवता

पूषन            -      पशुओं का देवता

विष्णुि                -     विश्वु के संरक्षक और पालनकर्ता

मरुत         -    आंधी-तूफान का

➽उत्तरवैदिक काल(1000–600 BC)


➽ऋग्वैदिक काल में आर्यों का निवास स्थान सिंधु तथा सरस्वती नदियों के बीच में था। 
➽बाद में वे सम्पूर्ण उत्तर भारत में फ़ैल चुके थे। 
➽सभ्यता का मुख्य क्षेत्र गंगा और उसकी सहायक नदियों का मैदान हो गया था। 
➽गंगा को आज भारत की सबसे पवित्र नदी माना जाता है। 
➽इस काल में विश् का विस्तार होता गया और कई जन विलुप्त हो गए। 
➽भरत, त्रित्सु और तुर्वस जैसे जन् राजनीतिक हलकों से ग़ायब हो गए जबकि पुरू पहले से अधिक शक्तिशाली हो गए। 
➽पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में कुछ नए राज्यों का विकास हो गया था, जैसे - काशी, कोसल, विदेह (मिथिला), मगध और अंग।

➽ऋग्वैदिक काल में सरस्वती नदी को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। 
➽ग॓गा का एक बार और यमुना नदी का उल्लेख तीन बार हुआ है। 
➽इस काल मे कौसाम्बी नगर मे॓ पहली बार पक्की ईटो का प्रयोग किया गया। 
➽इस काल मे वर्ण व्यासाय के बजाय जन्म के आधार पे निर्धारित होने लगे।


➽वैदिक साहित्य

➽वैदिक साहित्य में चार वेद एवं उनकी संहिताओं, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषदों एवं वेदांगों को शामिल किया जाता है।
➽वेदों की संख्या चार है- ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद।
➽ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद विश्व के प्रथम प्रमाणिक ग्रन्थ है।
➽वेदों को अपौरुषेय कहा गया है। 
➽गुरु द्वारा शिष्यों को मौखिक रूप से कंठस्त कराने के कारण वेदों को "श्रुति" की संज्ञा दी गई है।

➽ऋग्वेद 

1. ऋग्वेद देवताओं की स्तुति से सम्बंधित रचनाओं का संग्रह है।
2. यह 10 मंडलों में विभक्त है। इसमे 2 से 7 तक के मंडल प्राचीनतम माने जाते हैं। प्रथम एवं दशम मंडल बाद में जोड़े गए हैं। इसमें 1028 सूक्त हैं।
3. इसकी भाषा पद्यात्मक है।
4. ऋग्वेद में 33 प्रकार के देवों (दिव्य गुणो से युक्त पदार्थो) का उल्लेख मिलता है।
5. प्रसिद्ध गायत्री मंत्र जो सूर्य से सम्बंधित देवी गायत्री को संबोधित है, ऋग्वेद में सर्वप्रथम प्राप्त होता है।
6. ' असतो मा सद्गमय ' वाक्य ऋग्वेद से लिया गया है।
7. ऋग्वेद में मंत्र को कंठस्त करने में स्त्रियों के नाम भी मिलते हैं, जिनमें प्रमुख हैं- लोपामुद्रा, घोषा, शाची, पौलोमी एवं काक्षावृती आदि।
8. इसके पुरोहित के नाम होत्री है।


➽यजुर्वेद

➽यजु का अर्थ होता है यज्ञ। 
➽इसमें धनुर्यवीद्या का उल्लेख है।
➽इसके पाठकर्ता को अध्वर्यु कहते हैं।
➽यजुर्वेद वेद में यज्ञ की विधियों का वर्णन किया गया है।
➽इसमे मंत्रों का संकलन आनुष्ठानिक यज्ञ के समय सस्तर पाठ करने के उद्देश्य से किया गया है।
➽इसमे मंत्रों के साथ साथ धार्मिक अनुष्ठानों का भी विवरण है, जिसे मंत्रोच्चारण के साथ संपादित 
किए जाने का विधान सुझाया गया है।
➽यजुर्वेद की भाषा पद्यात्मक एवं गद्यात्मक दोनों है।
➽यजुर्वेद की दो शाखाएं हैं- कृष्ण यजुर्वेद तथा शुक्ल यजुर्वेद।
➽कृष्ण यजुर्वेद की चार शाखाएं हैं- मैत्रायणी संहिता, काठक संहिता, कपिन्थल तथा संहिता। 
➽शुक्ल यजुर्वेद की दो शाखाएं हैं- मध्यान्दीन तथा कण्व संहिता।
➽यह 40 अध्याय में विभाजित है।
➽इसी ग्रन्थ में पहली बार राजसूय तथा वाजपेय जैसे दो राजकीय समारोह का उल्लेख है।

➽सामवेद

➽सामवेद की रचना ऋग्वेद में दिए गए मंत्रों को गाने योग्य बनाने हेतु की गयी थी।

इसमे 1810 छंद हैं जिनमें 75 को छोड़कर शेष सभी ऋग्वेद में उल्लेखित हैं।
सामवेद तीन शाखाओं में विभक्त है- कौथुम, राणायनीय और जैमनीय।
सामवेद को भारत की प्रथम संगीतात्मक पुस्तक होने का गौरव प्राप्त है।

➽ब्राह्मण

➽वैदिक मन्त्रों तथा संहिताओं को ब्रह्म कहा गया है। 
➽वहीं ब्रह्म के विस्तारित रुप को ब्राह्मण कहा गया है। 
➽पुरातन ब्राह्मण में ऐतरेय, शतपथ, पंचविश, तैतरीय आदि विशेष महत्वपूर्ण हैं। 
➽महर्षि याज्ञवल्क्य ने मन्त्र सहित ब्राह्मण ग्रंथों की उपदेश आदित्य से प्राप्त किया है। 
➽संहिताओं के अन्तर्गत कर्मकांड की जो विधि उपदिष्ट है, ब्राह्मण मे उसी की सप्रमाण व्याख्या देखने को मिलता है। 
➽प्राचीन परम्परा में आश्रमानुरुप वेदों का पाठ करने की विधि थी अतः ब्रह्मचारी ऋचाओं ही पाठ करते थे ,गृहस्थ ब्राह्मणों का, वानप्रस्थ आरण्यकों और संन्यासी उपनिषदों का। 
➽गार्हस्थ्यधर्म का मननीय वेदभाग ही ब्राह्मण है।

➽यह मुख्यतः गद्य शैली में उपदिष्ट है।
➽ब्राह्मण ग्रंथों से हमें बिम्बिसार के पूर्व की घटना का ज्ञान प्राप्त होता है।
➽ऐतरेय ब्राह्मण में आठ मंडल हैं और पाँच अध्याय हैं।
➽ इसे पंजिका भी कहा जाता है।
➽ऐतरेय ब्राह्मण में राज्याभिषेक के नियम प्राप्त होते हैं।
➽तैतरीय ब्राह्मण कृष्णयजुर्वेद का ब्राह्मण है।
➽शतपथ ब्राह्मण में 100 अध्याय,14 काण्ड और 737 ब्राह्मण है। 
➽गान्धार, शल्य, कैकय, कुरु, पांचाल, कोसल, विदेह आदि स्थलों का भी उल्लेख होता हैशतपथवर्ती ब्राह्मण गोपथ है।

➽आरण्यक

➽आरण्यक वेदों का वह भाग है जो गृहस्थाश्रम त्याग उपरान्त वानप्रस्थ लोग जंगल में पाठ किया करते थे | इसी कारण आरण्यक नामकरण किया गया।
➽इसका प्रमुख प्रतिपाद्य विषय रहस्यवाद, प्रतीकवाद, यज्ञ और पुरोहित दर्शन है।
➽वर्तमान में सात अरण्यक उपलब्ध हैं।
➽सामवेद और अथर्ववेद का कोई आरण्यक स्पष्ट और भिन्न रूप में उपलब्ध नहीं है।

➽उपनिषद

➽उपनिषद प्राचीनतम दार्शनिक विचारों का संग्रह है। 
➽उपनिषदों में ‘वृहदारण्यक’ तथा ‘छान्दोन्य’, सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं। 
 ➽ इन ग्रन्थों से बिम्बिसार के पूर्व के भारत की अवस्था जानी जा सकती है। 
➽परीक्षित, उनके पुत्र जनमेजय तथा पश्चात कालीन राजाओं का उल्लेख इन्हीं उपनिषदों में किया गया है। 
➽ इन्हीं उपनिषदों से यह स्पष्ट होता है कि आर्यों का दर्शन विश्व के अन्य सभ्य देशों के दर्शन से सर्वोत्तम तथा अधिक आगे था। 
➽आर्यों के आध्यात्मिक विकास, प्राचीनतम धार्मिक अवस्था और चिन्तन के जीते-जागते जीवन्त उदाहरण इन्हीं उपनिषदों में मिलते हैं। 
➽उपनिषदों की रचना संभवतः बुद्ध के काल में हुई, क्योंकि भौतिक इच्छाओं पर सर्वप्रथम आध्यात्मिक उन्नति की महत्ता स्थापित करने का प्रयास बौद्ध और जैन धर्मों के विकास की प्रतिक्रिया के फलस्वरूप हुआ।
➽कुल उपनिषदों की संख्या 108 है।
➽मुख्य रूप से शास्वत आत्मा, ब्रह्म, आत्मा-परमात्मा के बीच सम्बन्ध तथा विश्व की उत्पत्ति से सम्बंधित रहस्यवादी सिधान्तों का विवरण दिया गया है।
➽"सत्यमेव जयते" मुण्डकोपनिषद से लिया गया है।
➽मैत्रायणी उपनिषद् में त्रिमूर्ति और चार्तु आश्रम सिद्धांत का उल्लेख है।

➽वेदांग 

➽युगान्तर में वैदिक अध्ययन के लिए छः विधाओं (शाखाओं) का जन्म हुआ जिन्हें ‘वेदांग’ कहते हैं। 
➽वेदांग का शाब्दिक अर्थ है वेदों का अंग, तथापि इस साहित्य के पौरूषेय होने के कारण श्रुति साहित्य से पृथक ही गिना जाता है। 
➽वेदांग को स्मृति भी कहा जाता है, क्योंकि यह मनुष्यों की कृति मानी जाती है। 
➽वेदांग सूत्र के रूप में हैं इसमें कम शब्दों में अधिक तथ्य रखने का प्रयास किया गया है।

➽वेदांग की संख्या 6 है

शिक्षा- वैदिक वाक्यों के स्पष्ट उच्चारण हेतु इसका निर्माण हुआ। वैदिक शिक्षा सम्बंधी प्राचीनतम साहित्य 'प्रातिशाख्य' है।
व्याकरण- वैदिक कर्मकाण्डों को सम्पन्न करवाने के लिए निश्चित किए गये विधि नियमों का प्रतिपादन 'कल्पसूत्र' में किया गया है।
ज्योतिष- इसके अन्तर्गत समासों एवं सन्धि आदि के नियम, नामों एवं धातुओं की रचना, उपसर्ग एवं प्रत्यय के प्रयोग आदि के नियम बताये गये हैं। पाणिनि की अष्टाध्यायी प्रसिद्ध व्याकरण ग्रंथ है।
निरुक्त- शब्दों की व्युत्पत्ति एवं निर्वचन बतलाने वाले शास्त्र 'निरूक्त' कहलातें है। क्लिष्ट वैदिक शब्दों के संकलन ‘निघण्टु‘ की व्याख्या हेतु यास्क ने 'निरूक्त' की रचना की थी, जो भाषा शास्त्र का प्रथम ग्रंथ माना जाता है।
छंद- वैदिक साहित्य में मुख्य रूप से गायत्री, त्रिष्टुप, जगती, वृहती आदि छन्दों का प्रयोग किया गया है। पिंगल का छन्दशास्त्र प्रसिद्ध है।
कल्प- इसमें ज्योतिष शास्त्र के विकास को दिखाया गया है। इसकें प्राचीनतम आचार्य 'लगध मुनि' है।


➽सूत्र साहित्य

➽सूत्र साहित्य वैदिक साहित्य का अंग है तथा यह उसे समझने में सहायक भी है।

ब्रह्म सूत्र-श्री वेद व्यास ने वेदांत पर यह परमगूढ़ ग्रंथ लिखा है जिसमें परमसत्ता, परमात्मा, परमसत्य, ब्रह्मस्वरूप ईश्वर तथा उनके द्वारा सृष्टि और ब्रह्मतत्त्व वर गूढ़ विवेचना की गई है। इसका भाष्य श्रीमद् आदिशंकराचार्य जी ने भगवान व्यास जी के कहने पर लिखा था।

कल्प सूत्र- ऐतिहासिक दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण। वेदों का हस्त स्थानीय वेदांग।


श्रोत सूत्र- महायज्ञ से सम्बंधित विस्तृत विधि-विधानों की व्याख्या। वेदांग कल्पसूत्र का पहला भाग।

स्मार्तसूत्र - षोडश संस्कारों का विधान करने वाला कल्प का दुसरा भाग।


शुल्बसूत्र- यज्ञ स्थल तथा अग्निवेदी के निर्माण तथा माप से सम्बंधित नियम इसमें हैं। इसमें भारतीय ज्यामिति का प्रारम्भिक रूप दिखाई देता है। कल्प का तीसरा भाग।

धर्म सूत्र- इसमें सामाजिक धार्मिक कानून तथा आचार संहिता है। कल्प का चौथा भाग


गृह्य सूत्र- परुवारिक संस्कारों, उत्सवों तथा वैयक्तिक यज्ञों से सम्बंधित विधि-विधानों की चर्चा है।




➽वैदिककालीन राजनीतिक व्यवस्था


➽सर्वप्रथम जब आर्य भारत में आये तो उनका यहाँ के दास अथवा दस्यु कहे जाने वाले पाँच लोगों से संघर्ष, अन्ततः आर्यो को विजय मिली। 
➽ऋग्वेद में आर्यो के पांच कबीले के होने की वजह से पंचजन्य कहा गया। 
➽ये थे पुरु, यदु, तुर्वश, द्रुह्म और अनु। 
➽भरत, क्रिव एवं त्रित्सु आर्य शासक वंश के थे। 
➽भरत कुल के नाम से ही इस देश का नाम भारतवर्ष पड़ा। 
➽इनके पुरोहित थे वशिष्ठ। 
➽कालान्तर में भरत वंश के राजा सुदास तथा अन्य दस जनों, पुरु, यदु, तुर्वश, अनु, द्रह्म अकिन, पक्थ, भलानस, विषणिन और शिव के मध्य दाशराज्ञ यु़द्ध परुष्णी (रावी) नदी के किनारे लड़ा गया जिसमें सुदास को विजय मिली। 
➽कुछ समय पश्चात् पराजित राजा पुरु और भरत के बीच मैत्री सम्बन्ध स्थापित होने से एक नवीन कुरु वंश की स्थापना की गयी।

ऋग्वैदिक काल मुख्यतः एक कबीलाई व्यवस्था वाला शासन था जिसमें सैनिक भावना प्रमुख थी। राजा को गोमत भी कहा जाता था।

➽वैदिक काल में राजतंत्रात्मक प्रणाली प्रचलित थी।
➽इसमें शासन का प्रमुख राजा होता था।
➽राजा वंशानुगत तो होता था परन्तु जनता उसे हटा सकती थी।
➽वह क्षेत्र विशेष का नहीं बल्कि जन विशेष का प्रधान होता था।
➽राजा युद्ध का नेतृत्वकर्ता था।
➽उसे कर वसूलने का अधिकार नही था।
➽जनता द्वारा स्वेच्छा से दिए गए भाग से उसका खर्च चलता था।
➽सभा, समिति तथा विदथ नामक प्रशासनिक संस्थाएं थीं।
➽अथर्ववेद में सभा एवं समिति को प्रजापति की दो पुत्रियाँ कहा गया है।
➽समिति का महत्वपूर्ण कार्य राजा का चुनाव करना था।
➽समिति का प्रधान ईशान या पति कहलाता था।
➽विदथ में स्त्री एवं पुरूष दोनों सम्मलित होते थे।
➽नववधुओं का स्वागत, धार्मिक अनुष्ठान आदि सामाजिक कार्य विदथ में होते थे।
➽सभा श्रेष्ठ लोंगो की संस्था थी, समिति आम जनप्रतिनिधि सभा थी एवं विदथ सबसे प्राचीन संस्था थी।
➽ ऋग्वेद में सबसे ज्यादा बार उल्लेख विदथ का 122 बार हुआ है।
➽सैन्य संचालन वरात, गण व सर्ध नामक कबीलाई संगठन करते थे।
➽शतपथ ब्रह्मण के अनुसार अभिषेक होने पर राजा महँ बन जाता था।
➽राजसूय यज्ञ करने वाले की उपाधि राजा तथा वाजपेय यज्ञ करने वाले की उपाधि सम्राट थी।
➽स्पर्श, गुप्तचरों को और पुरूप, दुर्गापति को कहा जाता था।
➽राजा का प्रशासनिक सहयोग पुरोहित एवं सेनानी आदि 12 रत्निन करते थे।
➽चारागाह के प्रधान को वाज्रपति एवं लड़ाकू दलों के प्रधान को ग्रामिणी कहा जाता था।


➽12 रत्निन


12 रत्निन
पुरोहित- राजा का प्रमुख परामर्शदाता,
सेनानी- सेना का प्रमुख,
ग्रामीण- ग्राम का सैनिक पदाधिकारी,
महिषी- राजा की पत्नी,
सूत- राजा का सारथी,
क्षत्रि- प्रतिहार,
संग्रहित- कोषाध्यक्ष,
भागदुध- कर एकत्र करने वाला अधिकारी,
अक्षवाप- लेखाधिकारी,
गोविकृत- वन का अधिकारी,
पालागल- राजा का मित्र।

➽विविध क्षेत्रों के विशेषज्ञ

होत्र- ऋग्वेद का पाठ करने वाला।
उदगाता- सामवेद की रचनाओं का गान करने वाला।
अध्वर्यु- यजुर्वेद का पाठ करने
ब्रह्मा- संपूर्ण यज्ञों की देख रेख करने वाला।

➽सामाजिक स्थिति

➽ऋग्वेद के दसवें मंडल में चार वर्णों का उल्लेख मिलता है।
➽वर्ण व्यवस्था कर्म आधारित थी।
➽दसवें मंडल को परवर्ती काल माना जाता है।
➽समाज पितृसत्तात्मक था।
➽संयुक्त परिवार प्रथा प्रचलित थी।
➽परिवार का मुखिया 'कुलप' कहलाता था।
➽परिवार कुल कहलाता था।
➽कई कुल मिलकर ग्राम, कई ग्राम मिलकर विश, कई विश मिलकर जन एवं कई जन मिलकर जनपद बनते थे।
➽अतिथि सत्कार की परम्परा का सबसे ज्यादा महत्व था।
➽एक और वर्ग ' पणियों ' का था जो धनि थे और व्यापार करते थे।
➽भिखारियों और कृषि दासों का अस्तित्व नहीं था।
➽संपत्ति की इकाई गाय थी जो विनिमय का माध्यम भी थी।
➽सारथी और बढई समुदाय को विशेष सम्मान प्राप्त था।
➽अस्पृश्यता, सती प्रथा, परदा प्रथा, बाल विवाह आदि का प्रचलन नहीं था।
➽शिक्षा एवं वर चुनने का अधिकार महिलाओं को था।
➽विधवा विवाह, महिलाओं का उपनयन संस्कार, नियोग, गन्धर्व एवं अंतर्जातीय विवाह प्रचलित था।
➽वस्त्राभूषण स्त्री एवं पुरूष दोनों को प्रिय थे।
➽जौ (यव) मुख्य अनाज था।
➽शाकाहार का प्रचलन था।
➽सोम रस (अम्रित जैसा) का प्रचलन था।
➽नृत्य, संगीत, पासा, घुड़दौड़, मल्लयुद्ध, शुइकर आदि मनोरंजन के प्रमुख साधन थे।
➽अपाला, घोष, मैत्रयी, विश्ववारा, गार्गी आदि विदुषी महिलाएं थीं।
➽ऋग्वेद में अनार्यों (मुर्ख या दस्यु) को मृद्धवाय (अस्पष्ट बोलने वाला), अवृत (नियमों- व्रतों का पालन नहीं करने वाला), बताया गया है।
➽सर्वप्रथम 'जाबालोपनिषद ' में चारों आश्रम ब्रम्हचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा संन्यास आश्रम का उल्लेख मिलता है।
➽ऋग्वैदिक समाज पितृसत्तात्मक समाज था।
➽पिता ही परिवार का मुखिया होता था।
➽ऋग्वेद के कुछ उल्लेखों से पिता के असीमित अधिकारों की पुष्टि होती है।
➽ऋजाश्व के उल्लेख से पता चलता है कि उसके पिता ने एक मादा भेड़ के लिए सौ भेड़ों का वध कर देने के कारण उसे अन्धा बना दिया था।
➽वरूणसूक्त के शुनः शेष के आख्यान से ज्ञात होता है कि पिता अपनी सन्तान को बेच सकता था।
➽किन्तु उद्धरणों से यह तात्पर्य कदापि नहीं निकाला जाना चाहिए कि पिता-पुत्र के संबंध कटुतापूर्ण थे।
➽इसे अपवादस्वरूप ही समझा जाना चाहिए।
➽पुत्र प्राप्ति हेतु देवताओं से कामना की जाती थी और परिवार संयुक्त होता था।

➽आर्थिक स्थिति

➽अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार पशुपालन एवं कृषि था।
➽ज्यादा पाल्तुपशु रखने वाले गोमत कहलाते थे।
➽चारागाह के लिए ' उत्यति ' या ' गव्य ' शब्द का प्रयोग हुआ है।
दूरी को ' गवयुती ', पुत्री को दुहिता (गाय दुहने वाली) तथा युद्धों के लिए ' गविष्टि ' का प्रयोग होता था।
➽राजा को जनता स्वेच्छा से भाग नजराना देती थी।
➽आवास घास-फूस एवं काष्ठ निर्मित होते थे।
➽ऋण लेने एवं देने की प्रथा प्रचलित थी जिसे ' कुसीद ' कहा जाता था।
➽बैलगाड़ी, रथ एवं नाव यातायात के प्रमुख साधन थे।
➽ऋग्वेद में आर्यो के मुख्य व्यवसाय के रूप में पशुपालन एवं कृषि का विवरण मिलता है जबकि पूर्व वैदिक आर्यो ने पशुपालन को ही अपना मुख्य व्यवसाय बनाया था।
➽ऋग्वैदिक सभ्यता ग्रामीण सभ्यता थी।
➽इस वेद में ‘गव्य एवं गव्यति शब्द चारागाह के लिए प्रयुक्त है।
➽ इस काल में गाय का प्रयोग मुद्रा के रूप मे भी होता था।
➽अवि (भेड़), अजा (बकरी) का ऋग्वेद में अनेक बार ज़िक्र हुआ है।
➽हाथी, बाघ, बतख,गिद्ध से आर्य लोग अपरिचित थे।
➽ धनी व्यक्ति को गोपत कहा गया था।
➽राजा को गोपति कहा जाता था युद्ध के लिए गविष्ट, गेसू, गव्य ओर गम्य शब्द प्रचलित थे।
➽समय की माप के लिए गोधुल शब्द का प्रयोग किया जाता था।

➽कृषि

➽सर्वप्रथम शतपथ ब्राम्हण में कृषि की समस्त प्रक्रियाओं का उल्लेख मिलता है।
➽ऋग्वेद के प्रथम और दसम मंडलों में बुआई, जुताई, फसल की गहाई आदि का वर्णन है।
➽ऋग्वेद में केवल यव (जौ) नामक अनाज का उल्लेख मिलता है।
➽ऋग्वेद के चौथे मंडल में कृषि का वर्णन है।
➽परवर्ती वैदिक साहित्यों में ही अन्य अनाजों जैसे- गोधूम(गेंहू), ब्रीही (चावल) आदि की चर्चा की गई है।
➽ काठक संहिता में 24 बैलों द्वारा हल खींचे जाने का, अथर्ववेद में वर्षा, कूप एवं नाहर का तथा यजुर्वेद में हल का ' सीर ' के नाम से उल्लेख है।
➽उस काल में कृत्रिम सिंचाई की व्यवस्था भी थी।
ऋग्वैदिक काल में राजा भूमि का स्वामी नहीं होता था। वह विशेष रूप से युद्धकालीन स्वामी होता था।
ऋग्वेद में दो प्रकार के सिंचाई का उल्लेख है-

खनित्रिमा (खोदकर प्राप्त किया गया जल)
स्वयंजा (प्राकृतिक जल)

➽पशुपालन

➽पशुओं का चारण ही उनकी आजीविका का प्रमुख साधन था।
➽गाय ही विनिमय का प्रमुख साधन थी।
➽ऋग्वैदिक काल में भूमिदान या व्यक्तिगत भू-स्वामित्व की धारणा विकसित नही हुई थी।

➽व्यापार

➽आरम्भ में अत्यन्त सीमित व्यापार प्रथा का प्रचलन था। व्यापार विनिमय पद्धति पर आधारित था।
➽समाज का एक वर्ग 'पाणी' व्यापार किया करते थे।
➽राजा को नियमित कर देने या भू-राजस्व देने की प्रथा नहीं थी।
➽राजा को स्वेच्छा से भाग या नजराना दिया जाता था।
➽पराजित कबीला भी विजयी राजा को भेंट देता था।
➽अपने धन को राजा अपने अन्य साथियों के बीच बांटता था।

➽धातु एवं सिक्के 

धातु एवं सिक्के : ऋग्वेद में उल्लेखित धातुओं में सर्वप्रथम धातू, अयस (ताँबा या कांसा) था। वे सोना (हिरव्य या स्वर्ण) एवं चांदी से भी परिचित थे। लेकिन ऋग्वेद में लोहे का उल्लेख नहीं है। ' निष्क ' संभवतः सोने का आभूषण या मुद्रा था जो विनिमय के काम में भी आता था।

➽उद्योग 

ऋग्वैदिक काल के उद्योग घरेलु जरूरतों के पूर्ति हेतु थे। बढ़ई एवं धूकर का कार्य अत्यन्त महत्वपूर्व था। अन्य प्रमुख उद्योग वस्त्र, बर्तन, लकड़ी एवं चर्म कार्य था। स्त्रियाँ भी चटाई बनने का कार्य करतीं थीं।

➽आर्यो का संघर्ष

➽आर्यो का संघर्ष गैरिक मृदभांण्ड एवं लाल और काले मृदभाण्ड वाले लोगों से हुआ।

➽आर्यो के विजयी होने के कारण

आर्य निम्नलिखित कारणों से विजयी होते रहे।
घोड़े चलित रथ
काँसे के अच्छे उपकरण
कवच (वर्म)


➽आर्य सम्भवतः विशिष्ट प्रकार के दुर्ग का प्रयोग करते थे।
➽इसे पुर कहा जाता था।
➽वे धनुष-वाण का प्रयोग करते थे।
➽प्रायः दो प्रकार के बाणों में एक विषाक्त एवं सींग के सिरा (मुख) वाला तथा दूसरा ताँबा के मुख वाला होता था।
➽ इसके अतिरिक्त बरछी, भाला, फरसा और तलवार का प्रयोग भी करते थे।
➽पुरचष्णि शब्द का अर्थ था- दुर्गों को गिराने वाला।
➽दास एवं दस्यु आर्यो के शस्त्रु थे।
➽दस्यु को अनसा (चपटी नाक वाला), अकर्मन (वैदिक कर्मो में विश्वास न करने वाला) एवं शिश्नदेवा (लिंगपूजक) कहा जाता था।
➽पुरु नामक कबीला त्रास दस्यु के नाम से जाना जाता था।
➽भरत जन को विश्वामित्र का सहयोग प्राप्त था।
➽इसी सहयोग के बल पर उसने व्यास एवं शुतुद्री को जीता।
➽किन्तु शीघ्र ही भरतों ने वशिष्ठ को अपना गुरु मान लिया।
➽अतः क्रुध होकर विश्वामित्र ने भरत जन के विरोधियों को समर्थन दिया।
➽परुष्णी नदी के किनारे 10 राजाओं का युद्ध हुआ।
➽इसमें भरत के विरोध में पाँच आर्य एवं पाँच अनार्य कबीले मिलकर संघर्ष कर रहे थे।
➽आर्यो के पाँच कबीले थे - पुरु, यदु, तुर्वश, द्रुह्म, और अनु।
➽पाँच अनार्य कबीले थे- अलिन, पक्थ, भलानस, विसाणिन और शिव
➽इसमें भरत राजा सुदास की विजय हुई।
➽दश राजाओं का युद्ध पश्चिमोत्तर प्रदेश में बसे हुए पूर्वकालीन जल तथा ब्रह्मवर्त के उत्तर कालीन आर्यो के बीच उत्तराधिकार के प्रश्न पर लड़ा गया था।
➽ऋग्वेद में क़रीब 25 नदियों का उल्लेख मिलता है जिनमे महत्त्वपूर्ण नदी सिंधु का वर्णन कई बार आया है। ➽उनके द्वारा उल्लिखित दूसरी नदी है सरस्वती जो अब राजस्थान के रेगिस्तान में तिरोहित हो गयी है।
➽ इसकी जगह अब घग्घर नदी बहती है।
➽ऋग्वेद में सरस्वती नदी को 'नदीतमा' (नदियों में प्रमुख) कहा गया है।
➽इसके अतिरिक्त गंगा का ऋग्वेद में एक बार एवं यमुना का तीन बार ज़िक्र आया है।
➽ऋग्वेद में केवल हिमालय पर्वत एवं इसकी चोटी मोजवंत का उल्लेख मिलता है।

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