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Veda in Hindi-वेद इन हिंदी

Veda in Hind     - दोस्तों आज indgk आप सब छात्रों के लिए भारतीय इतिहास सामान्य ज्ञान से संबंधित बहुत ही महत्वपूर्ण नोट्स “Veda in Hindi” शेयर कर रहा है. जो छात्र UPSC, IAS, SSC, Civil Services, SBI PO, Banking, Railway RRB, RPF या अन्य Competitive Exams की तैयारी कर रहे है उन्हें ‘Veda in Hindi’ अवश्य पढना चाहिए. 
'वेद' शब्द संस्कृत भाषा के विद् ज्ञाने धातु से बना है। इस तरह वेद का शाब्दिक अर्थ 'ज्ञान' है। इसी धातु से 'विदित' (जाना हुआ), 'विद्या' (ज्ञान), 'विद्वान' (ज्ञानी) जैसे शब्द आए हैं।
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Veda in Hindi- वेद


वेद, प्राचीन भारत के पवित्र साहित्य हैं जो हिन्दुओं के प्राचीनतम और आधारभूत धर्मग्रन्थ भी हैं। 
वेद, विश्व के सबसे प्राचीन साहित्य भी हैं। भारतीय संस्कृति में वेद सनातन वर्णाश्रम धर्म के, मूल और सबसे प्राचीन ग्रन्थ हैं।

'वेद' शब्द संस्कृत भाषा के विद् ज्ञाने धातु से बना है। इस तरह वेद का शाब्दिक अर्थ 'ज्ञान' है। इसी धातु से 'विदित' (जाना हुआ), 'विद्या' (ज्ञान), 'विद्वान' (ज्ञानी) जैसे शब्द आए हैं।



आज 'चतुर्वेद' के रूप में ज्ञात इन ग्रंथों का विवरण इस प्रकार है -

➽भारत का सर्वप्राचीन धर्मग्रंथ वेद है, जिसके संकलनकर्ता महर्षिकृष्ण द्वैपायन वेदव्यास को माना जाता है। 
➽वेद चार है
1. ऋग्वेद यह ऋचाओं का संग्रह है।
2. यजुर्वेद यह ऋचाओं का संग्रह है।
3. सामवेद इसमें यागानुष्ठान के लिए विनियोग वाक्यों का समावेश है।
4. अथर्ववेद यह तंत्र-मंत्रों का संग्रह है


➽वेद परिचय

➽वेदों को अपौरुषेय (जिसे कोई व्यक्ति न कर सकता हो, यानि ईश्वर कृत) माना जाता है। 
➽यह ज्ञान विराटपुरुष से वा कारणब्रह्म से श्रुति परम्परा के माध्यम से सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी ने प्राप्त किया माना जाता है। 
➽यह भी मान्यता है कि परमात्मा ने सबसे पहले चार महर्षियों जिनके अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा नाम थे के आत्माओं में क्रमशः ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद का ज्ञान दिया, उन महर्षियों ने फिर यह ज्ञान ब्रह्मा को दिया। 
➽इन्हें श्रुति भी कहते हैं जिसका अर्थ है 'सुना हुआ ज्ञान'। 
➽अन्य आर्य ग्रंथों को स्मृति कहते हैं, यानि वेदज्ञ मनुष्यों की वेदानुगत बुद्धि या स्मृति पर आधारित ग्रन्थ
➽ वेद मंत्रों की व्याख्या करने के लिए अनेक ग्रंथों जैसे ब्राह्मण-ग्रन्थ, आरण्यक और उपनिषद की रचना की गई। 
➽इनमे प्रयुक्त भाषा वैदिक संस्कृत कहलाती है जो लौकिक संस्कृत से कुछ अलग है। 
➽ऐतिहासिक रूप से प्राचीन भारत और हिन्द-आर्य जाति के बारे में वेदों को एक अच्छा सन्दर्भ श्रोत माना जाता है। 
➽संस्कृत भाषा के प्राचीन रूप को लेकर भी इनका साहित्यिक महत्व बना हुआ है।
➽वेदों को समझना प्राचीन काल में भारतीय और बाद में विश्व भर में एक वार्ता का विषय रहा है। 
➽इसको पढ़ाने के लिए छः अंगों- शिक्षा, कल्प, निरुक्त, व्याकरण, छन्द और ज्योतिष के अध्ययन और उपांगों जिनमें छः शास्त्र- पूर्वमीमांसा, वैशेषिक, न्याय, योग, सांख्य, और वेदांत व दस उपनिषद्- ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, मांडुक्य, ऐतरेय, तैतिरेय, छान्दोग्य और बृहदारण्यक आते हैं, इनके पढ़ने के बाद ही प्राचीन काल में वेदाध्ययन पूर्ण माना जाता था | 
➽प्राचीन काल के , वशिष्ठ, शक्ति, पराशर, वेदव्यास, जैमिनी, याज्ञवल्क्य, कात्यायन इत्यादि ऋषियों को वेदों के अच्छे ज्ञाता माना जाता है। 
➽मध्यकाल में रचित व्याख्याओं में सायण का रचा चतुर्वेदभाष्य "माधवीय वेदार्थदीपिका" बहुत मान्य है। 
➽ यूरोप के विद्वानों का वेदों के बारे में मत हिन्द-आर्य जाति के इतिहास की जिज्ञासा से प्रेरित रही है। 
➽अतः वे इसमें लोगों, जगहों, पहाड़ों, नदियों के नाम ढूँढते रहते हैं - लेकिन ये भारतीय परंपरा और गुरुओं की शिक्षाओं से मेल नहीं खाता। 
➽अठारहवीं सदी उपरांत यूरोपियनों के वेदों और उपनिषदों में रूचि आने के बाद भी इनके अर्थों पर विद्वानों में असहमति बनी रही है।


➽कालक्रम

➽वेद सबसे प्राचीन पवित्र ग्रंथों में से हैं। संहिता की तारीख लगभग 1700-1100 ईसा पूर्व, और "वेदांग" ग्रंथों के साथ-साथ संहिताओं की प्रतिदेयता कुछ विद्वान वैदिक काल की अवधि 1500-600 ईसा पूर्व मानते हैं तो कुछ इससे भी अधिक प्राचीन मानते हैं। 
➽जिसके परिणामस्वरूप एक वैदिक अवधि होती है, जो 1000 ईसा पूर्व से लेकर 200 ई.पूर्व तक है। 
➽कुछ विद्वान इन्हे ताम्र पाषाण काल (4000 ईसा पूर्व) का मनते हैं। 
➽वेदों के बारे में यह मान्यता भी प्रचलित है कि वेद सृष्टि के आरंभ से हैं और परमात्मा द्वारा मानव मात्र के कल्याण के लिए दिए गए हैं। 
➽वेदों में किसी भी मत, पंथ या सम्प्रदाय का उल्लेख न होना यह दर्शाता है कि वेद विश्व में सर्वाधिक प्राचीनतम साहित्य है। 
➽वेदों की प्रकृति विज्ञानवादी होने के कारण पश्चिमी जगत में इनका डंका बज रहा है। 
➽वैदिक काल, वेद ग्रंथों की रचना के बाद ही अपने चरम पर पहुंचता है, पूरे उत्तरी भारत में विभिन्न शाखाओं की स्थापना के साथ, जो कि ब्राह्मण ग्रंथों के अर्थों के साथ मंत्र संहिताओं को उनके अर्थ की चर्चा करता है, बुद्ध और पाणिनी के काल में भी वेदों का बहुत अध्ययन-अध्यापन का प्रचार था यह भी प्रमाणित है। 
➽माइकल विटजेल भी एक समय अवधि देता है 1500 से 500-400 ईसा पूर्व, माइकल विटजेल ने 1400 ईसा पूर्व माना है, उन्होंने विशेष संदर्भ में ऋग्वेद की अवधि के लिए इंडो-आर्यन समकालीन का एकमात्र शिलालेख दिया था। 
➽उन्होंने 150 ईसा पूर्व (पतंजलि) को सभी वैदिक संस्कृत साहित्य के लिए एक टर्मिनस एंटी क्वीन के रूप में, और 1200 ईसा पूर्व (प्रारंभिक आयरन आयु) अथर्ववेद के लिए टर्मिनस पोस्ट क्वीन के रूप में दिया।
➽ मैक्समूलर ऋग्वेद का रचनाकाल 1200 ईसा पूर्व से 200 ईसा पूर्व के काल के मध्य मानता है। 
➽दयानन्द सरस्वती चारों वेदों का काल 1960852976 वर्ष हो चुके हैं यह (1876 ईसवी में) मानता है।

➽वैदिक काल में ग्रंथों का संचरण मौखिक परंपरा द्वारा किया गया था, विस्तृत नैमनिक तकनीकों की सहायता से परिशुद्धता से संरक्षित किया गया था। 
➽मौर्य काल (322-185 ई० पू०) में बौद्ध धर्म (600 ई० पू०) के उदय के बाद वैदिक समय के बाद साहित्यिक परंपरा का पता लगाया जा सकता है। 
➽इसी काल में गृहसूत्र, धर्मसूत्र और वेदांगों की रचना हुई, ऐसा विद्वानों का मत है। 
➽इसी काल में संस्कृत व्याकरण पर पाणिनी ने 'अष्टाध्यायी' नामक ग्रंथ लिखा। 
➽अन्य दो व्याकरणाचार्य कात्यायन और पतञ्जलि उत्तर मौर्य काल में हुए। 
➽चंद्रगुप्त मौर्य के प्रधानमन्त्री चाणक्य ने अर्थशास्त्र नामक ग्रंथ लिखा। 
➽शायद 1 शताब्दी ईसा पूर्व के यजुर्वेद के कन्वा पाठ में सबसे पहले; हालांकि संचरण की मौखिक परंपरा सक्रिय रही। 
➽माइकल विटजेल ने 1 सहस्त्राब्दी ईसा पूर्व में लिखित वैदिक ग्रंथों की संभावना का सुझाव दिया। 
➽कुछ विद्वान जैसे जैक गूडी कहते हैं कि "वेद एक मौखिक समाज के उत्पाद नहीं हैं", इस दृष्टिकोण को ग्रीक, सर्बिया और अन्य संस्कृतियों जैसे विभिन्न मौखिक समाजों से साहित्य के संचरित संस्करणों में विसंगतियों की तुलना करके इस दृष्टिकोण का आधार रखते हुए, उस पर ध्यान देते हुए वैदिक साहित्य बहुत सुसंगत और विशाल है जिसे लिखे बिना, पीढ़ियों में मौखिक रूप से बना दिया गया था। 
➽हालांकि जैक गूडी कहते हैं, वैदिक ग्रंथों कि एक लिखित और मौखिक परंपरा दोनों में शामिल होने की संभावना है, इसे "साक्षरता समाज के समानांतर उत्पाद" कहते हैं।
➽वैदिक काल में पुस्तकों को ताड़ के पेड़ के पत्तों पर लिखा जाता था। 
➽पांडुलिपि सामग्री (बर्च की छाल या ताड़ के पत्तों) की तात्कालिक प्रकृति के कारण, जीवित पांडुलिपियां शायद ही कुछ सौ वर्षों की उम्र को पार करती हैं। 
➽पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय का 14 वीं शताब्दी से ऋग्वेद पांडुलिपि है; हालांकि, नेपाल में कई पुरानी वेद पांडुलिपियां हैं जो 11 वीं शताब्दी के बाद से हैं।
➽वेद, वैदिक अनुष्ठान और उसके सहायक विज्ञान वेदांग कहलाते थे, ये वेदांग प्राचीन विश्वविद्यालयों जैसे तक्षशिला, नालंदा और विक्रमशिला में पाठ्यक्रम का हिस्सा थे।


➽वेदों का काल

➽वेदों का अवतरण काल वर्तमान सृष्टि के आरंभ के समय का माना जाता है। 
➽इसके हिसाब से वेद को अवतरित हुए 2017 (चैत्र शुक्ल प्रतिपदा विक्रमी संवत 2074) को 1,96,08,53,117 वर्ष होंगे। 
➽वेद अवतरण के पश्चात् श्रुति के रूप में रहे और काफी बाद में वेदों को लिपिबद्ध किया गया और वेदों को संरक्षित करने अथवा अच्छी तरह से समझने के लिये वेदों से ही वेदांगों का आविष्कार किया गया। 
➽इसमें उपस्थित खगोलीय विवरणानुसार कई इतिहासकार इसे 5000 से 6000 साल पुराना मानते हैं परंतु आत्मचिंतन से ज्ञात होता है कि जैसे सात दिन बीत जाने पर पुनः रविवार आता है वैसे ही ये खगोलीय घटनाएं बार बार होतीं हैं अतः इनके आधार पर गणना श्रेयसकर नहीं।


वेद हमें ब्रह्मांड के अनोखे, अलौकिक व ब्रह्मांड के अनंत राज बताते हैं जो साधारण समझ से परे हैं। वेद की पुरातन नीतियां व ज्ञान इस दुनिया को न केवल समझाते हैं अपितु इसके अलावा वे इस दुनियां को पुनः सुचारू तरीके से चलाने में मददगार साबित हो सकते

➽वेदो का वर्गीकरण

➽वैदिकौं का यह सर्वस्वग्रन्थ 'वेदत्रयी' के नाम से भी विदित है।
➽पहले यह वेद ग्रन्थ एक ही था जिसका नाम यजुर्वेद था- एकैवासीद् यजुर्वेद चतुर्धाः व्यभजत् पुनः वही यजुर्वेद पुनः ऋक्-यजुस्-सामः के रूप मे प्रसिद्ध हुआ जिससे वह 'त्रयी' कहलाया।
➽बाद में वेद को पढ़ना बहुत कठिन प्रतीत होने लगा, इसलिए उसी एक वेद के तीन या चार विभाग किए गए
 ➽  तब उनको ऋग्यजुसामके रुप में वेदत्रयी अथवा बहुत समय बाद ऋग्यजुसामाथर्व के रूप में चतुर्वेद कहलाने लगे।
➽मंत्रों का प्रकार और आशय यानि अर्थ के आधार पर वर्गीकरण किया गया।
➽इसका आधार इस प्रकार है -


➽वेदत्रयी

➽वैदिक परम्परा दो प्रकार की है - ब्रह्म परम्परा और आदित्य परम्परा।
➽दोनों परम्पराओं में वेदत्रयी परम्परा प्राचीन काल में प्रसिद्ध थी।
➽विश्व में शब्द-प्रयोग की तीन शैलियाँ होती हैं: पद्य (कविता), गद्य और गान।
➽वेदों के मंत्रों के 'पद्य, गद्य और गान' ऐसे तीन विभाग होते हैं -

वेद का पद्य भाग - ऋग्वेद

वेद का गद्य भाग - यजुर्वेद

वेद का गायन भाग - सामवेद

➽पद्य में अक्षर-संख्या तथा पाद एवं विराम का निश्चित नियम होता है।
➽अतः निश्चित अक्षर-संख्या तथा पाद एवं विराम वाले वेद-मन्त्रों की संज्ञा 'ऋक्' है।
➽जिन मन्त्रों में छन्द के नियमानुसार अक्षर-संख्या तथा पाद एवं विराम ऋषिदृष्ट नहीं है, वे गद्यात्मक मन्त्र 'यजुः' कहलाते हैं और जितने मन्त्र गानात्मक हैं, वे मन्त्र ‘'साम'’ कहलाते हैं।
➽इन तीन प्रकार की शब्द-प्रकाशन-शैलियों के आधार पर ही शास्त्र एवं लोक में वेद के लिये ‘त्रयी’ शब्द का भी प्रयोग किया जाता है।
➽यजुर्वेद गद्यसंग्रह है, अत: इस यजुर्वेद में जो ऋग्वेद के छंदोबद्ध मंत्र हैं, उनको भी यजुर्वेद पढ़ने के समय गद्य जैसा ही पढ़ा जाता है।

➽चतुर्वेद

➽द्वापर युग की समाप्ति के पूर्व वेदों के उक्त चार विभाग अलग-अलग नहीं थे।
➽उस समय तो ऋक्, यजुः और साम - इन तीन शब्द-शैलियों मे संग्रहात्मक एक विशिष्ट अध्ययनीय शब्द-राशि ही वेद कहलाती थी।
➽बाद में जब अथर्व भी वेद के समकक्ष हो गया, तब ये 'त्रयी' के स्थान पर 'चतुर्वेद' कहलाने लगे ।
➽गुरु के रुष्ट होने पर जिन्होने सभी वेदों को आदित्य से प्राप्त किया है उन याज्ञवल्क्य ने अपनी स्मृति मे वेदत्रयी के बाद और पुराणों के आगे अथर्व को सम्मिलित कर बोला वेदाsथर्वपुराणानि इति।


➽ऋग्वेद

➽ ऋचाओं के क्रमबद्ध ज्ञान के संग्रह को ऋग्वेद कहा जाता है। इसमें 10 मंडल, 1028 सूक्त (वालखिल्य पाठ के 11 सूक्तों सहित) एवं 10,462 ऋचाएँ हैं। 
➽ इस वेद के ऋचाओं के पढ़ने वाले ऋषि को होतृ कहते हैं। इस वेद से आर्य के राजनीतिक प्रणाली एवं इतिहास के बारे में जानकारी मिलती है।
➽विश्वामित्र द्वारा रचित ऋग्वेद के तीसरे मंडल में सूर्य देवता सावित्री को समर्पित प्रसिद्ध गायत्री मंत्र है। 
➽ इसके 9वें मंडल में देवता सोम का उल्लेख है।
➽ इसके 8वें मंडल की हस्तलिखित ऋचाओं को खिल कहा जाता है।
➽ चातुस्वर्णय समाज की कल्पना का आदि स्रोत ऋग्वेद के 10वेंमंडल में वर्णित पुरुषसूक्त है, जिसके अनुसार चार वर्ण (ब्राह्मण,क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र) आदि पुरुष ब्रह्मा के क्रमशः मुख, भुजाओं,जंघाओं और चरणों से उत्पन्न हुए।
नोट : धर्मसूत्र चार प्रमुख जातियों की स्थितियों, व्यवसायों, दायित्वों,कर्तव्यों तथा विशेषाधिकारों में स्पष्ट विभेद करता है। 
   

➽ विभाग

➽ऋग्वेद में दो प्रकार के विभाग मिलते हैं-
➽अष्टक क्रम - इसमें समस्त ग्रंथ आठ अष्टकों तथा प्रत्येक अष्टक आठ अध्यायों में विभाजित है। 
➽प्रत्येक अध्याय वर्गो में विभक्त है। समस्त वर्गो की संख्या 2006 है। 
➽मण्डलक्रम - इस क्रम में समस्त ग्रन्थ 10 मण्डलों में विभाजित है। 
ऋग्वेद के मण्डल एवं उसके रचयिता
ऋग्वेद के मण्डल
रचयिता
1- प्रथम मण्डल
अनेक ऋषि
2- द्वितीय मण्डल
गृत्समय
3- तृतीय मण्डल
विश्वासमित्र
4- चतुर्थ मण्डल
वामदेव
5- पंचम मण्डल
अत्रि
6- षष्ठम् मण्डल
भारद्वाज
7- सप्तम मण्डल
वसिष्ठ
8- अष्ठम मण्डल
कण्व  अंगिरा
9- नवम् मण्डल (पावमान मण्डल
अनेक ऋषि
10- दशम मण्डल
अनेक ऋषि
➽मण्डल अनुवाक, अनुवाक सूक्त तथा सूक्त मंत्र या ॠचाओं में विभाजित है। 
➽दशों मण्डलों में 85 अनुवाक, 1028 सूक्त हैं। इनके अतिरिक्त 11 बालखिल्य सूक्त हैं। 
➽ऋग्वेद के समस्य सूक्तों के ऋचाओं (मंत्रों) की संख्या 10600 है। 
➽सूक्तों के पुरुष रचयिताओं में गृत्समद, विश्वामित्र, वामदेव, अत्रि, भारद्वाज और वसिष्ठ तथा स्त्री 
रचयिताओं में लोपामुद्रा, घोषा, अपाला, विश्वरा, सिकता, शचीपौलोमी और कक्षावृत्ति प्रमुख है। 
➽इनमें लोपामुद्रा प्रमुख थी। 
➽वह क्षत्रीय वर्ण की थी किन्तु उनकी शादी अगस्त्य ऋषि से हुई थी। 
➽ऋग्वेद के दूसरे एवं सातवें मण्डल की ऋचायें सर्वाधिक प्राचीन हैं, जबकि पहला एवं दसवां मण्डल अन्त में जोड़ा गया है। 
➽ऋग्वेद के आठवें मण्डल में मिली हस्तलिखित प्रतियों के परिशिष्ट को ‘खिल‘ कहा गया है। 
➽शाखाएँ
➽इस वेद की 5 प्रमुख शाखाएं हैं:- शाकल्प, वास्कल, अश्वलायन, शांखायन, मंडूकायन। वैसे इसकी 21 शाखाएं हैं।
➽ऋग्वेद के उपवेद
➽ ऋग्वेद का उपवेद आयुर्वेद है। 
➽आयुर्वेद के कर्ता धन्वंतरि देव हैं।
➽ऋग्वेद के उपनिषद
➽ वर्तमान में ऋग्वेद के 10 उपनिषद पाए जाते हैं। 
➽संभवत: इनके नाम ये हैं- ऐतरेय, आत्मबोध, कौषीतकि, मूद्गल, निर्वाण, नादबिंदू, अक्षमाया, त्रिपुरा, बह्वरुका और सौभाग्यलक्ष्मी। 

➽ऋग्वेद के ब्रह्मण ग्रंथ 
➽ब्राह्मण ग्रंथों की संख्या 13 है, जिसमें ऋग्वेद के 2 ब्रह्मण ग्रंथ हैं। 
➽1. ऐतरेयब्राह्मण-(शैशिरीयशाकलशाखा) और 2. कौषीतकि- (या शांखायन) ब्राह्मण (बाष्कल शाखा)। 
➽वेद के मंत्र विभाग को 'संहिता' भी कहते हैं। 
➽संहितापरक विवेचन को 'आरण्यक' एवं संहितापरक भाष्य को 'ब्राह्मण ग्रंथ' कहते हैं। 
➽अरण्यक ग्रंथ 
➽ऐतरेय और सांख्य।
➽ऋग्वेद के कुल मंत्रों की संख्या लगभग 10600 है। 
➽बाद में जोड़ गये दशम मंडल, जिसे ‘पुरुषसूक्त‘ के नाम से जाना जाता है, में सर्वप्रथम शूद्रों का उल्लेख मिलता है। 
➽इसके अतिरिक्त नासदीय सूक्त (सृष्टि विषयक जानकारी, निर्गुण ब्रह्म की जानकारी), विवाह सूक्त (ऋषि दीर्घमाह द्वारा रचित), नदि सूक्त (वर्णित सबसे अन्तिम नदी गोमल), देवी सूक्त आदि का वर्णन इसी मण्डल में है। 
➽इसी सूक्त में दर्शन की अद्वैत धारा के प्रस्फुटन का भी आभास होता है। 
➽सोम का उल्लेख नवें मण्डल में है। 
➽'मैं कवि हूं, मेरे पिता वैद्य हैं, माता अन्नी पीसनें वाली है। 
➽यह कथन इसी मण्डल में है। 
➽लोकप्रिय 'गायत्री मंत्र' (सावित्री) का उल्लेख भी ऋग्वेद के 7वें मण्डल में किया गया है। 
➽इस मण्डल के रचयिता वसिष्ठ थे। यह मण्डल वरुण देवता को समर्पित है

 ➽ईसा पूर्व एंव ईसवी
➽वर्तमान में प्रचलित ग्रेगोरियन कैलेंडर (ईसाई कैलेंडर/जूलियनकैलेंडर) ईसाई धर्मगुरु ईसा मसीह के जन्म-वर्ष (कल्पित) पर आधारितहै।
 ➽ईसा मसीह के जन्म के पहले के समय को ईसा पूर्व (B.C.-Before the birth of Jesus Chirst) कहा जाता है। 
➽ईसा पूर्व में वर्षों कीगिनती उल्टी दिशा में होती है, 
➽जैसे महात्मा बुद्ध का जन्म 563 ईसाईसा पूर्व एवं ईसवीपूर्व में एवं मृत्यु 483 ईसा पूर्व में हुआ। 
➽यानी ईसा मसीह के जन्म के563 वर्ष पूर्व महात्मा बुद्ध का जन्म एवं 483 वर्ष पूर्व मृत्यु हुई।
➽ईसा मसीह की जन्म-तिथि से आरंभ हुआ सन्, ईसवी सन् कहलाताहै, इसके लिए संक्षेप में ई. लिखा जाता है। 
➽ई. को लैटिन भाषा केशब्द A.D. में भी लिखा जाता है। A.D. यानी Anno Domini का STM S -In the year of lord Jesus Chirst)
➽वामनावतार के तीन पगों के आख्यान का प्राचीनतम स्रोत ऋग्वेद है ।
➽ऋग्वेद में इन्द्र के लिए 250 तथा अग्नि के लिए 200 ऋचाओं कीरचना की गयी है।
नोट: प्राचीन इतिहास के साधन के रूप में वैदिक साहित्य में ऋग्वेद केबाद शतपथ ब्राह्मण का स्थान है।


➽यजुर्वेद

➽संस्वर पाठ के लिए मंत्रों तथा बलि के समय अनुपालन के लिए नियमों का संकलन यजुर्वेद कहलाता है।
➽इसके पाठकर्ता कोअध्वर्यु कहते हैं।
➽यह एक ऐसा वेद है जो गद्य एवं पद्य दोनों में है।
➽'यजुष' शब्द का अर्थ है- 'यज्ञ'।
➽यर्जुवेद मूलतः कर्मकाण्ड ग्रन्थ है।
➽इसकी रचना कुरुक्षेत्र में मानी जाती है।
➽यजुर्वेद में आर्यो की धार्मिक एवं सामाजिक जीवन की झांकी मिलती है।
➽इस ग्रन्थ से पता चलता है कि आर्य 'सप्त सैंधव' से आगे बढ़ गए थे और वे प्राकृतिक पूजा के प्रति उदासीन होने लगे थे।
➽यर्जुवेद के मंत्रों का उच्चारण 'अध्वुर्य' नामक पुरोहित करता था।
➽इस वेद में अनेक प्रकार के यज्ञों को सम्पन्न करने की विधियों का उल्लेख है।
➽यह गद्य तथा पद्य दोनों में लिखा गया है।
➽गद्य को 'यजुष' कहा गया है।
➽यजुर्वेद का अन्तिम अध्याय ईशावास्य उपनिषयद है, जिसका सम्बन्ध आध्यात्मिक चिन्तन से है।
निम्नलिखित उपनिषद् भी यजुर्वेद से सम्बद्ध हैं:-
श्वेताश्वतर
बृहदारण्यक
ईश
प्रश्न
मुण्डक
माण्डूक्य।
➽उपनिषदों में यह लघु उपनिषद आदिम माना जाता है क्योंकि इसे छोड़कर कोई भी अन्य उपनिषद संहिता का भाग नहीं है।
➽यजुर्वेद के दो मुख्य भाग है-
शुक्ल यजुर्वेद
कृष्ण यजुर्वेद
➽शुक्ल यजुर्वेद
➽याज्ञवल्क्य ऋषि का सम्बन्ध शुक्ल से है। 
➽शुक्ल की दो शाखाएं हैं। 
माध्यन्दिन
काण्व
➽इसमें 40 अध्याय हैं। 
➽यजुर्वेद के एक मंत्र में च्ब्रीहिधान्यों का वर्णन प्राप्त होता है। 
➽इसके अलावा, दिव्य वैद्य और कृषि विज्ञान का भी विषय इसमें मौजूद है।
➽इसमें केवल 'दर्शपौर्मासादि' अनुष्ठानों के लिए आवश्यक मंत्रों का संकलन है
➽कृष्ण यजुर्वेद
➽इसमें मंत्रों के साथ-साथ 'तन्त्रियोजक ब्राह्मणों' का भी सम्मिश्रण है। 
➽कृष्ण :वैशम्पायन ऋषि का सम्बन्ध कृष्ण से है। 
➽वास्तव में मंत्र तथा ब्राह्मण का एकत्र मिश्रण ही 'कृष्ण यजुः' के कृष्णत्त्व का कारण है तथा मंत्रों का विशुद्ध एवं अमिश्रित रूप ही 'शुक्त यजुष्' के शुक्लत्व का कारण है। इसकी मुख्य शाखायें हैं-
➽कृष्ण की चार शाखाएं हैं।
1.तैत्तिरीय,
2.मैत्रायणी,
3.कठ और
4.कपिष्ठल
तैत्तरीय संहिता (कृष्ण यजुर्वेद की शाखाको 'आपस्तम्ब संहिताभी कहते हैं।
महर्षि पंतजलि द्वारा उल्लिखित यजुर्वेद की 101 शाखाओं में इस समय केवल उपरोक्त पाँच वाजसनेयतैत्तिरीयकठकपिष्ठल और मैत्रायणी ही उपलब्ध हैं।
यजुर्वेद से उत्तरवैदिक युग की राजनीतिकसामाजिक एवं धार्मिक जीवन की जानकारी मिलती हैं।
इन दोनों शाखाओं में अंतर यह है कि शुक्ल यजुर्वेद पद्य (संहिताओंको विवेचनात्मक सामग्री (ब्राह्मणसे अलग करता हैजबकि कृष्ण यजुर्वेद में दोनों ही उपस्थित हैं।
यजुर्वेद में वैदिक अनुष्ठान की प्रकृति पर विस्तृत चिंतन है और इसमें यज्ञ संपन्न कराने वाले प्राथमिक ब्राह्मण  आहुति देने के दौरान प्रयुक्त मंत्रों पर गीति पुस्तिका भी शामिल है। 
इस प्रकार यजुर्वेद यज्ञों के आधारभूत तत्त्वों से सर्वाधिक निकटता रखने वाला वेद है।
यजुर्वेद संहिताएँ संभवतः अंतिम रचित संहिताएँ थींजो पूदूसरी सहस्त्राब्दी के अंत से लेकर पहली सहस्त्राब्दी की आरंभिक शताब्दियों के बीच की हैं।


सामवेद

यह गायी जा सकने वाली ऋचाओं का संकलन है इसके पाठकर्ताको उद्रातृ कहते हैं।
इसे भारतीय संगीत का जनक कहा जाता है।
साम का अर्थ रूपांतरण और संगीत।
सौम्यता और उपासना।
इस वेद में ऋग्वेद की ऋचाओं का संगीतमय रूप है।
सामवेद गीतात्मक यानी गीत के रूप में है।
इस वेद को संगीत शास्त्र का मूल माना जाता है।
1824 मंत्रों के इस वेद में 75 मंत्रों को छोड़कर शेष सब मंत्र ऋग्वेद से ही लिए गए हैं।
इसमें सविताअग्नि और इंद्र देवताओं के बारे में जिक्र मिलता है।
इसमें मुख्य रूप से 3 शाखाएं हैं, 75 ऋचाएं हैं।
शाखाएं हैं
कौथुमीय
जैमिनीय एवं
राणायनीय।
➽देवता विषयक विवेचन की दृष्ठि से सामवेद का प्रमुख देवता ‘सविता‘ या ‘सूर्य‘ है, इसमें मुख्यतः सूर्य की स्तुति के मंत्र हैं किन्तु इंद्र सोम का भी इसमें पर्याप्त वर्णन है। 
➽भारतीय संगीत के इतिहास के क्षेत्र में सामवेद का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। 
➽इसे भारतीय संगीत का मूल कहा जा सकता है। 
➽सामवेद का प्रथम द्रष्टा वेदव्यास के शिष्य जैमिनि को माना जाता है।
➽इसके अधिकांश मन्त्र ॠग्वेद में उपलब्ध होते हैं, कुछ मन्त्र स्वतन्त्र भी हैं। 
➽सामवेद में मूल रूप से 75 मन्त्र हैं और शेष ॠग्वेद से लिये गये हैं।
➽वेद के उद्गाता, गायन करने वाले जो कि सामग (साम गान करने वाले) कहलाते थे। 
➽उन्होंने वेदगान में केवल तीन स्वरों के प्रयोग का उल्लेख किया है जो उदात्त, अनुदात्त तथा स्वरित कहलाते हैं।
➽सामगान व्यावहारिक संगीत था। 
➽उसका विस्तृत विवरण उपलब्ध नहीं हैं।
➽वैदिक काल में बहुविध वाद्य यंत्रों का उल्लेख मिलता है जिनमें से
➽तंतु वाद्यों में कन्नड़ वीणा, कर्करी और वीणा,
➽घन वाद्य यंत्र के अंतर्गत दुंदुभि, आडंबर,
➽वनस्पति तथा सुषिर यंत्र के अंतर्गतः तुरभ, नादी तथा
➽बंकुरा आदि यंत्र विशेष उल्लेखनीय हैं
➽विषय

➽सामवेद में ऐसे मन्त्र मिलते हैं जिनसे यह प्रमाणित होता है कि वैदिक ऋषियों को एसे वैज्ञानिक सत्यों का ज्ञान था जिनकी जानकारी आधुनिक वैज्ञानिकों को सहस्त्राब्दियों बाद प्राप्त हो सकी है।
➽उदाहरणतः- इन्द्र ने पृथ्वी को घुमाते हुए रखा है।
➽चन्द्र के मंडल में सूर्य की किरणे विलीन हो कर उसे प्रकाशित करती हैं।।
➽साम मन्त्र क्रमांक 24 का भाषार्थ है- यह अग्नि द्यूलोक से पृथ्वी तक संव्याप्त जीवों तक का पालन कर्ता है। ➽यह जल को रूप एवं गति देने में समर्थ है।
➽संगीत स्वर
नारदीय शिक्षा ग्रंथ में सामवेद की गायन पद्धति का वर्णन मिलता है, जिसको आधुनिक हिन्दुस्तानी और कर्नाटक संगीत में स्वरों के क्रम में सा-रे-गा-मा-पा-धा-नि-साके नाम से जाना जाता है।
षडज् - सा
ऋषभ - रे
गांधार - गा
मध्यम - 
पंचम - 
धैवत - 
निषाद - नि

➽अथर्ववेद

अथर्ववेद संहिता हिन्दू धर्म के पवित्रतम और सर्वोच्च धर्मग्रन्थ वेदों में से चौथे वेद अथर्ववेद की संहिता अर्थात मन्त्र भाग है। इसमें देवताओं की स्तुति के साथ जादू, चमत्कार, चिकित्सा, विज्ञान और दर्शन के भी मन्त्र हैं। अथर्ववेद संहिता के बारे में कहा गया है कि जिस राजा के रज्य में अथर्ववेद जानने वाला विद्वान् शान्तिस्थापन के कर्म में निरत रहता है, वह राष्ट्र उपद्रवरहित होकर निरन्तर उन्नति करता जाता हैः अथर्ववेद के रचियता श्री ऋषि अथर्व हैं और उनके इस वेद को प्रमाणिकता स्वंम महादेव शिव की है, ऋषि अथर्व पिछले जन्म मैं एक असुर हरिन्य थे और उन्होंने प्रलय काल मैं जब ब्रह्मा निद्रा मैं थे तो उनके मुख से वेद निकल रहे थे तो असुर हरिन्य ने ब्रम्ह लोक जाकर वेदपान कर लिया था, यह देखकर देवताओं ने हरिन्य की हत्या करने की सोची| हरिन्य ने डरकर भगवान् महादेव की शरण ली, भगवन महादेव ने उसे अगले अगले जन्म मैं ऋषि अथर्व बनकर एक नए वेद लिखने का वरदान दिया था इसी कारण अथर्ववेद के रचियता श्री ऋषि अथर्व हुए| .
➽अथर्वा ऋषि द्वारा रचित इस वेद में रोग, निवारण, तंत्र-मत्र, जादू-टोना, शाप , वशीकरण ,आशीर्वाद, स्तुति, प्रायश्चित, औषधि, अनुसंधान, विवाह, प्रेम,
➽राजकर्म, मातृभूमि-महात्मय आदि विविध विषयों से संबद्ध मंत्र तथा सामान्य मनुष्यों के विचारों, विश्वासों, अंधविश्वासों इत्यादि का वर्णन है। 
➽अथर्ववेद कन्याओं के जन्म की निन्दा करता है।
➽इसमें सभा एवं समिति को प्रजापति की दो पुत्रियाँ कहा गया है।
➽ यज्ञों व देवों को अनदेखा करने के कारण वैदिक पुरोहित वर्ग इसे अन्य तीन वेदों के बराबर नहीं मानता था। 
➽इसे यह दर्जा बहुत बाद में मिला। 
➽इसकी भाषा ऋग्वेद की भाषा की तुलना में स्पष्टतः बाद की है और कई स्थानों पर ब्राह्मण ग्रंथों से मिलती है। 
➽अतः इसे लगभग 1000 ई.पू. का माना जा सकता है।
➽ इसमें ऋग्वेद और सामवेद से भी मन्त्र लिये गये हैं।
➽ जादू से सम्बन्धित मन्त्र-तन्त्र, राक्षस, पिशाच, आदि भयानक शक्तियाँ अथर्ववेद के महत्त्वपूर्ण विषय हैं।
➽ इसमें भूत-प्रेत, जादू-टोने आदि के मन्त्र हैं।
➽ ऋग्वेद के उच्च कोटि के देवताओं को इस वेद में गौण स्थान प्राप्त हुआ है।
➽ धर्म के इतिहास की दृष्टि से ऋग्वेद और अथर्ववेद दोनों का बड़ा ही मूल्य है।
➽ अथर्ववेद से स्पष्ट है कि कालान्तर में आर्यों में प्रकृति की पूजा की उपेक्षा हो गयी थी और प्रेत-आत्माओं व तन्त्र-मन्त्र में विश्वास किया जाने लगा था।
➽ इसकी रचना 'अथवर्ण' तथा 'आंगिरस' ऋषियों द्वारा की गयी है।
➽ इसीलिए अथर्ववेद को 'अथर्वांगिरस वेद' भी कहा जाता है।
➽ इसके अतिरिक्त अथर्ववेद को अन्य नामों से भी जाना जाता है-
➽ गोपथ ब्राह्मण में इसे 'अथर्वांगिरस' वेद कहा गया है।
➽ ब्रह्म विषय होने के कारण इसे 'ब्रह्मवेद' भी कहा गया है।
➽ आयुर्वेद, चिकित्सा, औषधियों आदि के वर्णन होने के कारण 'भैषज्य वेद' भी कहा जाता है ।
➽ 'पृथ्वीसूक्त' इस वेद का अति महत्त्वपूर्ण सूक्त है। इस कारण इसे 'महीवेद' भी कहते हैं।
विषय
अथर्ववेद में कुल 20 काण्ड, 730 सूक्त एवं 5987 मंत्र हैं। इस वेद के महत्त्वपूर्ण विषय हैं-
ब्रह्मज्ञान
औषधि प्रयोग
रोग निवारण
जन्त्र-तन्त्र
टोना-टोटका आदि।
➽अथर्ववेद में परीक्षित को कुरुओं का राजा कहा गया है तथा इसमें कुरू देश की समृद्धि का अच्छा विवरण मिलता है।
➽ इस वेद में आर्य एवं अनार्य विचार-धाराओं का समन्वय है।
➽उत्तर वैदिक काल में इस वेद का विशेष महत्त्व है।
➽ऋग्वेद के दार्शनिक विचारों का प्रौढ़रूप इसी वेद से प्राप्त हुआ है।
➽शान्ति और पौष्टिक कर्मा का सम्पादन भी इसी वेद में मिलता है।
➽अथर्ववेद में सर्वाधिक उल्लेखनीय विषय 'आयुर्विज्ञान' है।
➽इसके अतिरिक्त 'जीवाणु विज्ञान' तथा 'औषधियों' आदि के विषय में जानकारी इसी वेद से होती है।
➽भूमि सूक्त के द्वारा राष्ट्रीय भावना का सुदृढ़ प्रतिपादन सर्वप्रथम इसी वेद में हुआ है।
➽इस वेद की दो अन्य शाखायें हैं-
पिप्पलाद
शौनक
➽अथर्ववेद में 20 कांड हैं, जिनमें 598 सूक्त और गद्य परिच्छेद हैं। जिनका विवरण निम्न हैः-
➽पहले से लेकर सातवें कांड में विशिष्ट उद्देश्यों के लिए तंत्र-मंत्र संबंधी प्राथनाएं हैं- लंबे जीवन के लिए मंत्र, उपचार, श्राप, प्रेम मंत्र, समृद्धि के लिए प्रार्थना, ब्राह्मण के ज्ञाताओं से घनिष्ठता, वेद अध्ययन में सफलता, राजा बनने के लिए मंत्र और पाप का प्रायश्चित।
➽आठवें से बारहवें कांड में इसी तरह के पाठ हैं, लेकिन इसमें ब्रह्मांडीय सूक्त भी शामिल हैं, जो ऋग्वेद के सूक्तों को ही जारी रखते हैं और उपनिषदों के अधिक जटिल चिंतन की ओर ले जाते हैं। 
➽उदाहरण के लिए, उपनिषदों के लिए अत्यंत अर्थवान श्वास या प्राणवायु के महत्त्व की संकल्पना और सार्वभौम अस्तित्व से जुड़े आत्म पर चिंतन सबसे पहले अथर्ववेद में ही पाए गए थे।
➽13 से 20 तक कांड में ब्रह्मांडीय सिद्धांत (13 कांड), विवाह प्राथनाएं (कांड 14), अंतिम संस्कार के मंत्र (कांड 18) और अन्य जादुई व अनुष्ठानिक मंत्र हैं।
➽15 वां कांड रोचक है, जिसमें व्रत्य का महिमामंडन किया गया है, जो वेदपाठ न करने वाला एक अरूढ़िबद्ध आर्य समूह था, लेकिन इसके बावजूद सम्मानजनक आनुष्ठानिक व चिंतन परंपराएं रखता था। 
➽यही नहीं, व्रत्य स्वामिस्वरूप हैं और एक राजा का आतिथ्य ग्रहण करने की स्थति में उन्हें राजा को आशीर्वाद देने योग्य माना गया है। 
➽अथर्ववेद के इस भाग के साथ-साथ अन्य यजुर्वेद परिच्छेदों में वैदिक रचना के प्राथमिक संगठनात्मक सिद्धांतों और बाद के भारतीय अनुष्ठानों में से एक, अतिथि सत्कार के मह्त्व का वर्णन किया गया है।
नोट : सबसे प्राचीन वेद ऋग्वेद एवं सबसे बाद का वेद अथर्ववेद है।


➽वेदों के विषय

➽वैदिक ऋषियौ ने वेदों को जनकल्याणमे प्रवृत्त पाया। 

निस्संदेह जैसा कि -

:यथेमां वाचं कल्याणिमावदानि जनेभ्यः वैसा ही वेदा हि यज्ञार्थमभिप्रवृत्ता कालानुपूर्व्याभिहिताश्च यज्ञाः तस्मादिदं कालविधानशास्त्रं यो ज्योतिषं वेद वेद यज्ञम्
➽ वेद यज्ञम् वेदौं की प्रवृत्तिः जनकल्यण के कार्य मे है। 
➽वेद शब्द विद् धातु में घं प्रत्यय लगने से बना है। 
➽संस्कृत ग्रथों में विद् ज्ञाने और विद्‌ लाभे जैसे विशेषणों से विद् धातु से ज्ञान और लाभ के अर्थ का बोध
होता है।
➽वेदों के विषय उनकी व्याख्या पर निर्भर करते हैं - अग्नि, यज्ञ, सूर्य, इंद्र (आत्मा तथा बिजली के अर्थ
में), सोम, ब्रह्म, मन-आत्मा, जगत्-उत्पत्ति, पदार्थों के गुण, धर्म (उचित-अनुचित), दाम्पत्य, ध्यान
योग, प्राण (श्वास की शक्ति) जैसे विषय इसमें बारंबार आते हैं। 
➽यज्ञ में देवता, द्रव्य, उद्देश्य,और विधि आदि विनियुक्त होते हैं। 
➽ग्रंथों के हिसाब से इनका विवरण इस प्रकार है -


➽उपवेद, उपांग

➽प्रतिपदसूत्र, अनुपद, छन्दोभाषा (प्रातिशाख्य), धर्मशास्त्र, न्याय तथा वैशेषिक- ये 4 दर्शऩ उपांग ग्रन्थ
भी उपलब्ध है।
➽आयुर्वेद, धनुर्वेद, गान्धर्ववेद तथा स्थापत्यवेद- ये क्रमशः चारों वेदों के उपवेद कात्यायन ने बतलाये हैं।
➽स्थापत्यवेद - स्थापत्यकला के विषय, जिसे वास्तु शास्त्र या वास्तुकला भी कहा जाता है, इसके
अन्तर्गत आता है।
➽धनुर्वेद - युद्ध कला का विवरण। इसके ग्रंथ विलुप्त प्राय हैं।
➽गन्धर्वेद - गायन कला।

➽आयुर्वेद - वैदिक ज्ञान पर आधारित स्वास्थ्य विज्ञान।
➽वेदों को भली-भाँति समझने के लिए छह वेदांगों की रचना हुई।
ये हैं- 
शिक्षा - वैदिक वाक्यों के स्पष्ट उच्चारण हेतु इसका निर्माण हुआ। 
वैदिक शिक्षा सम्बंधी प्राचीनतम साहित्य 'प्रातिशाख्य' है।
ज्योतिष - इसके अन्तर्गत समासों एवं सन्धि आदि के नियमनामों एवं धातुओं की रचना
उपसर्ग एवं प्रत्यय के प्रयोग आदि के नियम बताये गये हैं। 
पाणिनि की अष्टाध्यायी प्रसिद्ध व्याकरण ग्रंथ है।
 कल्प, - इसमें ज्योतिष शास्त्र के विकास को दिखाया गया है। 
इसकें प्राचीनतम आचार्य 'लगध मुनिहै।
व्याकरण,- वैदिक कर्मकाण्डों को सम्पन्न करवाने के लिए निश्चित किए गये विधि नियमों
 का प्रतिपादन 'कल्पसूत्रमें किया गया है।
निरूक्त - शब्दों की व्युत्पत्ति एवं निर्वचन बतलाने वाले शास्त्र 'निरूक्तकहलातें है। क्लिष्ट वैदिक शब्दों के संकलन ‘निघण्टु‘ की व्याख्या हेतु यास्क ने 'निरूक्त
की रचना की थीजो भाषा शास्त्र का प्रथम ग्रंथ माना जाता है।
छंद - वैदिक साहित्य में मुख्य रूप से गायत्रीत्रिष्टुपजगतीवृहती आदि छन्दों का प्रयोग 
किया गया है। पिंगल का छन्दशास्त्र प्रसिद्ध है।


➽वेद की शाखाएँ

➽इसके अनुसार वेदोक्त यज्ञों का अनुष्ठान ही वेद के शब्दों का मुख्य उपयोग माना गया है। 
➽सृष्टि के आरम्भ से ही यज्ञ करने में साधारणतया मन्त्रोच्चारण की शैली, मन्त्राक्षर एवं कर्म-विधि में
विविधता रही है। 
➽इस विविधता के कारण ही वेदों की शाखाओं का विस्तार हुआ है। यथा-ऋग्वेद की 21 शाखा, यजुर्वेद की
101 शाखा, सामवेद की 1000 शाखा और अथर्ववेद की 4 शाखा- इस प्रकार कुल 1131 शाखाएँ हैं। 
➽इस संख्या का उल्लेख महर्षि पतंजलि ने अपने महाभाष्य में भी किया है। 
➽उपर्युक्त 1131शाखाओं में से वर्तमान में केवल 12 शाखाएँ ही मूल ग्रन्थों में उपलब्ध हैः-
➽ऋग्वेद की 21 शाखाओं में से केवल 2 शाखाओं के ही ग्रन्थ प्राप्त हैं- शाकल-शाखा और शांखायन
शाखा।
➽यजुर्वेद में कृष्णयजुर्वेद की 86 शाखाओं में से केवल 6 शाखाओं के ग्रन्थ ही प्राप्त है- तैत्तिरीय-शाखा,
मैत्रायणीय शाखा, कठ-शाखा और कपिष्ठल-शाखा
➽शुक्लयजुर्वेद की 15 शाखाओं में से केवल 2 शाखाओं के ग्रन्थ ही प्राप्त है- माध्यन्दिनीय-शाखा और
काण्व-शाखा।
➽सामवेद की 1000 शाखाओं में से केवल 2 शाखाओं के ही ग्रन्थ प्राप्त है- कौथुम-शाखा और जैमिनीय
शाखा।
➽अथर्ववेद की 6 शाखाओं में से केवल 2 शाखाओं के ही ग्रन्थ प्राप्त हैं- शौनक-शाखा और पैप्पलाद
शाखा।
➽उपर्युक्त 12 शाखाओं में से केवल 6 शाखाओं की अध्ययन-शैली प्राप्त है-शाकल, तैत्तरीय,
माध्यन्दिनी, काण्व, कौथुम तथा शौनक शाखा। 
➽यह कहना भी अनुपयुक्त नहीं होगा कि अन्य शाखाओं के कुछ और भी ग्रन्थ उपलब्ध हैं, किन्तु उनसे
शाखा का पूरा परिचय नहीं मिल सकता एवं बहुत-सी शाखाओं के तो नाम भी उपलब्ध नहीं हैं।


➽अन्य मतों की दृष्टि में वेद


जैन - 

➽इनको मूर्ति पूजा के प्रवर्तक माना जाता है। ये वेदों को श्रेष्ठ नहीं मानते पर अहिंसा के मार्ग पर ज़ोर देते हैं।

बौद्ध -

➽ इस मत में महात्मा बुद्ध के प्रवर्तित ध्यान और तृष्णा को दुःखों का कारण बताया है। 
➽वेदों में लिखे ध्यान के महत्व को ये तो मानते हैं पर ईश्वर की सत्ता से नास्तिक हैं। 
➽➽ये भी वेद नही मानते |

शैव -

 ➽वेदों में वर्णित रूद्र के रूप शिव को सर्वोपरि समझने वाले। 
➽अपनेको वैदिक धर्म के मानने वाले शिव को एकमात्र ईश्वर का कल्याणकारी रूप मानते हैं, लेकिन शैव
लोग शंकर देव के रूप (जिसमें नंदी बैल, जटा, बाघंबर इत्यादि हैं) को विश्व का कर्ता मानते हैं।

वैष्णव -

➽विष्णु और उनके अवतारों को ईश्वर मानने वाले। 
➽वैदिक ग्रन्थौं से अधिक अपना आगम मत को सर्वोपरी मानते है। 
➽विष्णु को ही एक ईश्वर बताते हैं और जिसके अनुसार सर्वत्र फैला हुआ ईश्वर विष्णु कहलाता है।

शाक्त

➽शाक्त अपनेको वेदोक्त मानते तो है लेकिन् पूर्वोक्त शैव,वैष्णवसे श्रेष्ठ समझते है, महाकाली,महालक्ष्मी
➽और महासरस्वतीके रुपमे नवकोटी दुर्गाको इष्टदेवता मानते है वे ही सृष्टिकारिणी है ऐसा मानते है।

सौर

➽सौर जगतसाक्षी सूर्य को और उनके विभिन्न अवतारों को ईश्वर मानते हैं। 
➽वे स्थावर और जंगमके
➽आत्मा सूर्य ही है ऐसा मानते है।

गाणपत्य

➽गाणपत्य गणेश को ईश्वर समझते है। 
➽साक्षात् शिवादि देवों ने भी उनकी उपासना करके सिद्धि प्राप्त किया है, ऐसा मानते हैं।

सिख 

सिख - इनका विश्वास एकमात्र ईश्वर में तो है, लेकिन वेदों को ईश्वर की वाणी नहीं समझते हैं।

आर्य समाज

➽आर्य समाज - ये निराकार ईश्वर के उपासक हैं। ये वेद को ईश्वरीय ज्ञान मानते हैं। 
➽ये मानते हैं कि वेद आदि सृष्टि में अग्नि, वायु, आदित्य तथा अङ्गिरा आदि ऋषियों के अन्तस् में
उत्पन्न हुआ। 
➽वेदों को अंतिम प्रमाण स्वीकार करते हैं। 
➽और वेदों के अनन्तर जिन पुराण आदि की रचना हुई इनको वेद विरुद्ध मानते हुए अस्वीकार करते हैं
➽रामायण तथा महाभारत के इतिहास को स्वीकार करते हैं। 
➽इस समाज के संस्थापक महर्षि दयानन्द हैं जिन्होंने वेदों की ओर लौटने का संदेश दिया। 
➽ये अर्वाचीन वैदिक है।


वेदों को अपौरुषेय (जिसे कोई व्यक्ति कर सकता हो, यानि ईश्वर कृत) माना जाता है। 
यह ज्ञान विराटपुरुष से वा कारणब्रह्म से श्रुति परम्परा के माध्यम से सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी ने प्राप्त किया
माना जाता है। 
यह भी मान्यता है कि परमात्मा ने सबसे पहले चार महर्षियों जिनके अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा
नाम थे के आत्माओं में क्रमशः ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद का ज्ञान दिया, उन महर्षियों ने
फिर यह ज्ञान ब्रह्मा को दिया।
इन्हें श्रुति भी कहते हैं जिसका अर्थ है 'सुना हुआ ज्ञान' 
अन्य आर्य ग्रंथों को स्मृति कहते हैं, यानि वेदज्ञ मनुष्यों की वेदानुगत बुद्धि या स्मृति पर आधारित
ग्रन्थ। 
वेद मंत्रों की व्याख्या करने के लिए अनेक ग्रंथों जैसे ब्राह्मण-ग्रन्थ, आरण्यक और उपनिषद की रचना
की गई। 
इनमे प्रयुक्त भाषा वैदिक संस्कृत कहलाती है जो लौकिक संस्कृत से कुछ अलग है। 
ऐतिहासिक रूप से प्राचीन भारत और हिन्द-आर्य जाति के बारे में वेदों को एक अच्छा सन्दर्भ श्रोत माना
जाता है। 
संस्कृत भाषा के प्राचीन रूप को लेकर भी इनका साहित्यिक महत्व बना हुआ है।


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